18 January 2009

ये बातें झूठी बातें हैं

उसे देर रात सिगरेट की तलब ने बैचेन कर दिया था। घड़ी रात के दो बजा रही थी। उसे पता था कि ऑफिस के पास के मॉल के पास में जो गुमटी हैं, वहां सिगरेट मिल सकती है। बस दुकानदार को जगाना पड़ेगा जो कि काफी बुगरुज हैं। लेकिन उसके पास कोई विकल्प नहीं था। जैकेट और मोबाइल लेकर जैसे ही बाहर निकला तो खाली सड़कें डरावनी लग रही थीं लेकिन उसे पता है कि कभी इन्हीं सड़कों पर वह भी धूमा करती थी।

अरे यह क्या? उसने तय किया था कि वह कभी भी उसे याद नहीं करेगा। लेकिन अचानक उसे एक बिसरी हुई याद आती है। देखते देखते ये यादंे वीरान सड़कों पर उतर आती हैं। वह उसे देख सकता था। उसके होंठों के तिल को भी। जबकि चारों ओर स्याह अंधेरा था। लेकिन फिर भी वह उसे देख सकता था। वह उसे पुकारना चाहता है लेकिन आवाज नहीं निकलती है।

अचानक हवा के झोंके के साथ वह वापस लौट आता है। सामने ही गुमटी थी जहां से उसे सिगरेट लेना था। शुक्र है उसे सिगरेट मिल भी गई। सिगरेट लेने के बाद वह उसे मुंह में लगाकर जलाता है। और फिर वह तीन साल पहले उसी शहर में लौट आता है जहां से उसने पढ़ाई की थी। वह उसे आज भी बहुत याद करता है। याद ही नहीं बल्कि चाहता भी बहुत है।

अचानक उसके मोबाइल पर एक मैसेज आता है। अगले महीने कॉलेज का दीक्षांत समारोह का मैसेज था। खुशी की बात है लेकिन फिर भी एक बात जो उसे अभी से परेशान कर रही थी वह यह है कि उनसे वह सामना कैसे करेगा। वह एक बात जो आज तक उसे नहीं कह पाया, क्या अब कह देगा। वह उससे माफी मांग कर सफाई देना चाहता है। वह कहना चाहता है कि ये बातें झूठी बातें हैं। जो उसने नहीं फैलाईं। उसे न जाने क्यूं लगता है कि वे नहीं मानेंगी।

27 December 2008

मैं तुम्हें आज भी चाहता हूं

मैं जब भी उससे बात करता था तो एक बात जो मुझे हमेशा और आज भी सताती है, वो है उसकी खामोशी। मैं कितना बोलता था लेकिन वो कुछ भी नहीं बोलती थी। उसक खामोशी सागर की तरह है। उसकी खामोशी की ही ताकत है कि पूरी रात जागने के बावजूद मैं उसके बारें में लिख पा रहा हूं। सुबह के साढ़े पांच बजे हैं और मैं उसे शिद्दत से महसूस करना चाह रहा हूं। लेकिन मुझे इस बात का इल्म है कि वो करीब नहीं है। मैं इमरोज भी नहीं बन सकता जिसे अमृता प्रीतम से अलग किया जा सके। मैं सिर्फ मैं हूं। लेकिन उसे मैं क्या कहूं? उसकी मासूमियत ही जो आज भी बांधे रखी हुई है। वरना हम लड़कों की जात तो ऐसी होती है कि तू नहीं तो और कोई। लेकिन मैं आज भी उसकी कमी महसूस कर सकता हूं। उसके साथ मैंने जिंदगी के सबसे बेहतर दिन गुजारे ही नहीं बल्कि जिए हैं।
चाहे वे भोपाल के दिन हो या फिर मुंबई के। पिछले कुछ सालों से वे काफी नाराज हैं। उनकी जगह मैं होता तो शायद मैं भी यही करता जो वे कर रही हैं। कभी कभी सोचता हूं कि आज के कुछ सालों बाद मैं अपने रिश्ते को उनके साथ कैसे देखूंगा। मुझे जवाब नहीं मालूम है। वो खुश हैं। लेकिन मैं? इसका जवाब भी मुझे नहीं पता। लेकिन फिर भी इस बात का इल्म है कि मेरी किसी भी हरकत से उन्हें तकलीफ न हो।