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परी को प्यार हो गया.

आप यकीन मानिये या मत मानिये लेकिन यह सोलह आने सच बात है. बात क्या जनाब किस्सा ही है. आप परी को नहीं जानते हैं. चलिए मैं बता देता हूँ. यह न तो आसमान से आई कोई परी है और ना ही किस्से कहानी वाली परी. यह परी है उत्तर प्रदेश के एक कस्बे की. नाम कुछ भी हो सकता है. जैसे सपना, मीना या फिर टीना लेकिन मेरे लिए बस वो परी है. इस परी से हमारी पहली मुलाकात झीलों की नगरी में ही हुई थी. इसे आप पहली नज़र का प्यार कहें या और कुछ. कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन उसमे कुछ ऐसा था या कहूँ है, जो मुझे आज भी उसकी ओर खींचता है. उसकी आंखों में जब भी मैंने आंसू देखा तो मेरी आँखें गीली हो गई. कई महीनो के साथ में उसने मुझे जीना सिखा दिया था. मैं आज जो भी हूँ, उसी के कारण हूँ. लेकिन उसे प्यार हो गया. ओर परी को यदि किसी से प्यार हो जाए तो वो बन्दा कितना नसीब वाला होगा. यह वही समझ सकता है जिसने परी से प्यार किया हो. परी आज खुश है. इसलिए मैं भी खुश हूँ.

वो परी थी

भोपाल आए पूरे दो महीने हो गए. कितनी जल्दी ये समय कटा पता ही नहीं चला. काम और बस काम. बाकी चीजों के लिए समय ही नहीं निकाल पाया. काफी मजा आ रहा है. खासतौर पर उस वकत जब सुबह उठकर अख़बार में अपना नाम पढ़ता हूँ. बायलाइन का अलग नशा है. दिन भर दीमाग खास ख़बर खोजता है किसी भी कीमत पर. कई बार ऐसा भी हुआ है कि जब भी उन सडकों या मोहल्लों से गुजरता हूँ जहाँ कभी उसे देखा था या दो कदम साथ चले थे.तो पुरानी यादें तजा हो जाती हैं. आज भी यहाँ की फिजा में उसे मैं महसूस करता हूँ. वो आसमान से उतरी एक परी थी मेरे लिए. और मैं उसका महाराज.

हम मिलेंगे

कई दिनों बाद आज लिखने बैठा हूँ. सोच रहा हूँ उसके बारे में लिखूं जिसकी जिंदगी में अब मैं नहीं हूँ, आज भी उसकी एक झलक पाने के लिए दिल बेकरार रहता है. लेकिन मुझे पता है अब मैं उसे कभी नहीं देख पाउँगा. फिर भी वो मेरे दिल के सबसे करीब है. उसकी सांसों को आज भी मैं महसूस कर सकता हूँ. वो अब मेरी जिंदगी में नहीं है. वो अब मेरे शहर में है और मैं उस शहर में जहाँ हम मिले थे. उसके जाने के बाद मेरी जिंदगी अब थम सी गई है लेकिन फिर भी मैं चल रहा हूँ और उमीद है की हम एक दिन मिलेंगे और एक अच्छे दोस्त की तरह.

मुंबई डायरी

कई महीनों पहले एक अंग्रेजी के अखबार में पढ़ा था कि न्‍यूयार्क और लंदन के बाद मुंबई ही एक मात्र ऐसा शहर है जो आपको जीरो से हीरो बना सकता है। बस कूबत आपमें होनी चाहिए। ऐसा मुझे भी लगता है। आज ही लग रहा है, ऐसा नहीं है। मुंबई में जब पहली बार कदम रखा था तो यहां की आसमान छूती इमारतों को देख कर मन में एक अजीब सा भाव उठ रहा था। दिल्‍ली की तुलना में यह शहर कुछ अधिक बेहतर है। यहां दिखावा उतना नहीं है, जितना की दिल्‍ली में देखने को मिलता है। दिल्‍ली में जब आप प्रवेश करते हैं तो चारों ओर खुलापन दिख है। मुंबई में ऐसा नहीं है। जब आप यहां के वीटी या दादर जैसे प्रमुख रेलवे स्‍टेशन में प्रवेश करते हैं तो चारों ओर जनसैलाब के साथ बड़ी बड़ी इमारतें आपका स्‍वागत करती हैं। सब भागे जा रहे हैं। वक्‍त की कमी है। एक के बाद एक लोकल ट्रेन अपने अंदर से भीड़ को उगलती हैं और निगलती हैं। पहली पहली बार सब कुछ अजीब सा लगता है। यदि आपका दिल कमजोर है तो बस आप यही चाहेंगे कि दूसरी ट्रेन पकड़ कर गांव या उस शहर को लौट जाएं जहां से आएं है। लेकिन एक बार जब आप इस शहर में कदम रख देते हैं तो अपने आप हमारों ख्‍वाब आपके अंदर उमड़...

मै जरुर वापस आऊंगा

समझ में नहीं आ रहा कि शुरुआत क्‍हां से और कैसे करुं। लेकिन शुरुआत तो करनी होगी। मुंबई में दो साल हो गए हैं और अब इस श‍हर को छोड़कर जाना पड़ रहा है। यह मेरी सबसे बड़ी कमजोरी है कि मैं जहां भी रहता हूं उसके मोह में बंध जाता हूं। बनारस से राजस्‍थान आते भी ऐसा ही कुछ महसूस हुआ था। फिर जयपुर से भोपाल जाते हुए दिल को तकलीफ हुई थी। इसके बाद भोपाल से मुंबई आते हुए भोपाल और दोस्‍तों को छोड़ते हुए डर लग रहा था। और आज मुंबई छोड़ते हुए अच्‍छा नहीं लग रहा है। मैं बार बार लिखता रहा हूं कि मुंबई मेरा दूसरा प्‍यार है। और किसी भी प्‍यार को छोडते हुए विरह की अग्नि में जलना बड़ा कष्‍टदायक होता है। इस शहर ने मुझे बहुत कुछ दिया। इस शहर से मुझे एक अस्तिव मिला। कुछ वक्‍त उसके साथ गुजारने का मौका मिला, जिसके साथ मैने सोचा भी नहीं था। मुंबई पर कई लेख लिखते वक्‍त इस शहरों को पूरी तरह मैने जिया है। लेकिन अब छोड़कर जाना पड़ रहा है। बचपन से लेकर अब तक कई शहरों में जिंदगी बसर करने का मौका मिला। लेकिन बनारस और मुंबई ही दो ऐसे शहर हैं जो मेरे मिजाज से मेल खाते हैं। बाकी शहरों में थोड़ी सी बोरियत होती है लेकिन यहां ऐसा ...

बस में तुम्‍हारा इंतजार

हर रोज की तरह मुझे आज भी पकड़नी थी बेस्‍ट की बस। हर रोज की तरह मैंने किया आज भी तुम्‍हारा इंतजार अंधेरी के उसी बस स्‍टॉप पर जहां कभी हम साथ मिला करते थे अक्‍सर बसों को मैं बस इसलिए छोड़ देता था ताकि तुम्‍हारा साथ पा सकूं ऑफिस के रास्‍ते में कई बार हम साथ साथ गए थे ऑफिस लेकिन अब वो बाते हो गई हैं यादें आज भी मैं बेस्‍ट की बस में तुम्‍हारा इंतजार करता हूं और मुंबई की खाक छानता हूं अंतर बस इतना है अब बस में तन्‍हा हूं फिर भी तुम्‍हारा इंतजार करता हूं

वो चौराहे के किसी न किसी रास्‍ते से वापस जरुर आएगी

वो चली गई। उसने एक बार भी उसे पीछे मुड़कर नहीं देखा। जबकि वो काफी देर तक उसी चौराहे पर खड़ा देखता रहा। उसे आस थी, वो मुड़ेगी और उसे हल्‍की नजर से देखेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वो उसे भरपूर नजर से देखना चाह रहा था। कई दिन, कई महीने, कई बरस और कई सदिया बीत गई। लेकिन वो आज भी वहीं खड़ा है और उसका इंतजार कर रहा है। बस इसी आस में, कि वो चौराहे के किसी न किसी रास्‍ते से वापस जरुर आएगी। वो आज भी इंतजार कर रहा है।