Skip to main content

Posts

Showing posts with the label मेरी कविता

हक

तुम लड़ोगे तो मारे जाओगे क्‍योंकि व्‍यवस्‍था को पसंद नहीं  ऊंची आवाज, बराबरी, लोकतंत्र लेकिन बिना लड़े जीना भी क्‍या कोई जीना है आओ साथियों लड़ा जाए हक के लिए, हवा के लिए, आजादी के लिए हक खैरात में नहीं, लड़ने से मिलते हैं भूख झूठे आश्‍वासन से नहीं रोटी से मिटती है तो अब कब तक झूठे आश्‍वासन, गैरबरारी सहेंगे उठो, लड़ो, मरो लेकिन झुको मत क्‍यों हक मांगना हमारा अधिकार है लड़ेंगे, जीतेंगे 
...लोग कहते हैं कि दूरियों से प्यार बढ़ता है आखिर ऐसी दूरियां किस काम की जहां प्यार बढ़ाने के लिए फासलों का सहारा लेना पड़े सोचा था तुमसे दूर जाऊंगा तो तुम मेरे और करीब आओगी मैं दूर जाता रहा, तुम दूर जाती रही एक दिन प्यार दूरियों में ऐसा बदला कि मैं चाह कर भी तुम्हें वापस ना पा सके सोचा था कि मैं तुम्हें मना लूंगा, घर ले आऊंगा मैं गलत था, तुम जा चुकी थी बहुत दूर

अब सबसे खतरनाक होता है सपनों का अधूरे रह जाना

कल रात पाश मेरे सपने में आए मुझे जगाया और फिर जोर-जोर से चिल्लाए सबसे खतरनाक होता है हमारे सपना का मर जाना सबसे खतरनाक होता है हमारे सपना का मर जाना मैंने सोती आंखों से उन्हें चुप कराया कहा, बंद कीजिए अपनी बकवास अब जमाना बदल चुका है, सपनों का कोई मोल नहीं अब सबसे खतरनाक होता है सपनों का अधूरा रह जाना पाश फिर भी नहीं झुके, मैं भी झुकने को तैयार नहीं बहस पूरे शबाब पर थी उन्होंने मेरी कालर पकड़ी और कहा सपनों को मत मरने दो. मैंने भी कहा, कैसे सपने जो अधूरे रह जाते हैं जो हकीकत बनने से पहले टूट-टूट कर बिखर जाते हैं

काले कौवे

अब काले कौवे नहीं दिखते हैं साख पर संसद में उनकी आवाजाही बढ़ गई है खादी की टोपी से लेकर नेकर तक कौवे कांव कांव कर रहे हैं संसद में किसी के लिए राम जरुरी है किसी के लिए जरुरी है गरीबों का हाथ फिर भी कौवे कांव कांव कर रहे हैं कोई कहता है कि वे गायब हो रहे हैं तो कोई कहता है कि संसद निगल रही है उनको गली से लेकर संसद के गलियारों तक में कौवे कांव कांव कर रहे हैं मुंबई, 18 जनवरी 2008