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एक बार फिर भोपाल

लिजिए एक बार फिर भोपाल आ गया हूं। भोपाल में फिर तीसरी बार वापसी हुई है। शुरुआती दौर में लगा कि भोपाल वापसी किस दिशा में जाएगी, पता नहीं था। खैर अब पूरे दो सप्ताह बाद एक बार फिर से भोपाल का मौसम हसीन सा लगने लगा है। रहने के लिए घर का इंतजाम भी हो गया है। जहां मैं अपने पुराने दोस्त के साथ हूं। डच्यूटी रात की है तो दिक्कत की कोई बात नहीं है। दिन में हमारे दोस्त अपनी गाड़ी से आफिस छोड़ देते थे। बस से १क् मिनट में आफिस और फिर खाना-पीना कर रात के नौ बजे से लेकर सुबह के सात बजे तक न्यूज के साथ खेलना। सुबह टहलते हुए सबसे पहले पोहा और चाय का नाश्ता फिर बस पकड़ कर घर की ओर वापसी। जब पूरा देश सोता है तो मेरे जैसे हजारों लोग जागते हैं और जब लोग जागते हैं तो हमारे जैसे लोगों की रात होती है। यही है जिदंगी मेरे भाई।

खैर अभी तो ठंड का मजा ले रहा हूं जनाब। दो दिनों में ठंड बढ़ी है और इसी के साथ मौसम भी दमदार हो गया है। शुरू से ही ठंड का मौसम मेरे लिए सबसे प्रिय मौसम रहा है। और जब बात भोपाल की ठंड की हो तो ये सोने पर सुहागा जैसा है। भोपाल की बात की जाए तो आप झीलों की बात न करें? यह कैसे हो सकता है? कल्पना किजिए..भोपाल की बड़ी झील और पास में ही बना भारत भवन। जहां हर शाम आपकी कोई न कोई नाटक देखकर बीत रही हो। यह संभव है और सिर्फ भोपाल में ही। यदि आप नए साल में कहीं जाने की योजना बना रहे हैं तो जनाब आप भोपाल का रुख कर सकते हैं। यकीन मानिए भोपाल आकर आप निराश नहीं होंगे। शांत और सुरक्षित शहर की तलाश आपकी भोपाल ही आकर खत्म होगी।

जय-जय

Comments

Anonymous said…
जन्नत में हो दोस्त,

और हरे चने खाना नहीं भूलना!!
भोपाल में दोबारा स्वागत है. और रंजन दा, ये हरे चने कहाँ मिलते हैं? कोई विशेष किस्म का है?
बंधु बिल्कुल आऐगे। जिस दिन समय और मनी दोनो साथ होगे दोडे चले आऐगे।
Mahi S said…
:)

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