Skip to main content

मैं कौन हूँ मुझे नहीं पता

मैं कौन हूँ मुझे नहीं पता
कोई तो मुझे मेरी पहचान बता दो
दर दर ठोकरें खाते हुए अब मैं तुम्हारे सामने हूँ
लेकिन यह क्या
तुम भी मेरी तरह बिना पहचान के हो
आह! मैं फिर ग़लत राहों पर हूँ
जहाँ से चला था, वहीं आ गया हूँ
आखिर क्यों भटक रहा हूँ
मैं अपनी पहचान के लिए
कौन सी पहचान ?
जो मुझे तुम दोगे नहीं
मुझे नहीं चाहिए अपनी पहचान
हाँ मुझे नहीं चाहिए अपनी पहचान
हाँ मैं किसी एक पहचान में
नहीं बंधना चाहता हूँ
जैसे तुम बंध चुके हो.

Comments

ghughutibasuti said…
बहुत अच्छी कविता है । पहचान चाहिये भी और नहीं भी । हाँ पहचान भी एक बंधन ही है ।
घुघूती बासूती
भावपूर्ण कविता ... अपनी पहचान , अपने वजूद की तलाश --मानव के जीवन मे यह मृग तृष्णा रहती ही है
तुम्हारी बात से सहमत हूँ......पहचान भी बंधक बनाती है
Udan Tashtari said…
बहुत अच्छा. मुक्त और स्वछंद रहो. पहचान अपने साथ सीमायें लाती है जो अक्सर बाधक का ही कार्य करती हैं. अच्छी रचना.
36solutions said…
स्‍वागत है उन्‍मुक्‍त आकाश में

'आरंभ' छत्‍तीसगढ की धडकन

Popular posts from this blog

मै जरुर वापस आऊंगा

समझ में नहीं आ रहा कि शुरुआत क्‍हां से और कैसे करुं। लेकिन शुरुआत तो करनी होगी। मुंबई में दो साल हो गए हैं और अब इस श‍हर को छोड़कर जाना पड़ रहा है। यह मेरी सबसे बड़ी कमजोरी है कि मैं जहां भी रहता हूं उसके मोह में बंध जाता हूं। बनारस से राजस्‍थान आते भी ऐसा ही कुछ महसूस हुआ था। फिर जयपुर से भोपाल जाते हुए दिल को तकलीफ हुई थी। इसके बाद भोपाल से मुंबई आते हुए भोपाल और दोस्‍तों को छोड़ते हुए डर लग रहा था। और आज मुंबई छोड़ते हुए अच्‍छा नहीं लग रहा है। मैं बार बार लिखता रहा हूं कि मुंबई मेरा दूसरा प्‍यार है। और किसी भी प्‍यार को छोडते हुए विरह की अग्नि में जलना बड़ा कष्‍टदायक होता है। इस शहर ने मुझे बहुत कुछ दिया। इस शहर से मुझे एक अस्तिव मिला। कुछ वक्‍त उसके साथ गुजारने का मौका मिला, जिसके साथ मैने सोचा भी नहीं था। मुंबई पर कई लेख लिखते वक्‍त इस शहरों को पूरी तरह मैने जिया है। लेकिन अब छोड़कर जाना पड़ रहा है। बचपन से लेकर अब तक कई शहरों में जिंदगी बसर करने का मौका मिला। लेकिन बनारस और मुंबई ही दो ऐसे शहर हैं जो मेरे मिजाज से मेल खाते हैं। बाकी शहरों में थोड़ी सी बोरियत होती है लेकिन यहां ऐसा ...

अजी एक नजर इधर भी

पिछले दिनों हमारी एक मित्र ने हमें एक ईमेल भेजा। इसमें किसी ब्‍लॉग का लिंक था लेकिन जब लिंक खोला तो इसमें कुछ शानदार देखने को मिला। बस आपको करना यह है कि नीचे जो चित्र है उसे बड़े ध्‍यान से देखें। बस देखते रहिए। चाहे तो आप कमेंट भी कर सकते हैं।

मीडिया - मैसेज - सेक्स

उन दोनों की मुलाकात हुए कुछेक ही महीने हुए थे। लेकिन इन कुछेक महीनों में वे कुछ अधिक करीब आ गए थे। लड़की यूनिवर्सिटी में पढ़ती थी तो लड़का वहां ग्रेड टू का कर्मचारी था। उसकी डच्यूटी यूनिवर्सिटी की लायब्रेरी में थी। जहां वह अक्सर किताबों के बहाने उसे देखने के लिए आती रहती थी। लायब्रेरी की रैक से किताबें निकलती थीं। पन्ने पलटे जाए जाते थे। लेकिन नजरे सामने बैठे उस ग्रेेड टू के कर्मचारी पर होती थी। वह कर्मचारी भी उसके आने के बाद कुछ अधिक ही सक्रिय हो जाता था। स्टूडेंट्स को लेकर चपरासी पर रौब झाड़ने का कोई मौका वह नहीं छोड़ता था। वे दोनों एक दूसरे की जरूरतों को पूरा कर रहे थे। बसंत के बाद यूनिवर्सिटी में नया बैच आया। वह अब सीनियर्स बन गई थी। लेकिन वह लड़का अभी सेकेंड ग्रेड का ही कर्मचारी था। नए बैच में कुछ खूबसूरत लड़कियों के साथ कुछ पैसे वाले लड़के तो कुछ गांव से पहली बार निकले लड़के भी आए थे। बंसत के साथ अब सबकुछ बदल गया था। अब सेकेंड ग्रेड का कर्मचारी और उस लड़की में कुछ भी पहले जैसा नहीं था। स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही थी। कल तक जिस लड़की को वह अपनी सेकेंड हैंड स्कूटर पर बैठाकर उसके घ...