Skip to main content

दोस्ती और विश्वासघात में अन्तर होता है

दोस्ती और विश्वासघात में अन्तर होता है
यह तो सब जानते हैं
मैं भी और आप भी
लेकिन इसे क्या कहेंगे आप
जब आपका सबसे प्यारा दोस्त
आपके साथ वो करे
जो दुश्मन भी नहीं करता है
जी हाँ मैं अपने सबसे प्यारे दोस्त की बात कर रहा हूँ
मैंने उसकी दोस्ती को इबारत समझा
और उसने हर मोड़ पर मुझे ठगा
मैं आज भी उसपर विश्वास करना चाहता हूँ
लेकिन करूँ या नहीं करूँ
अजीब सी उलझन है

Comments

Rajesh Roshan said…
मर्म थोड़ा जुदा है. वैसे विश्वासघात की वर्तनी पर ध्यान दे
-राजेश रोशन
Anonymous said…
ऐसे लोग दोस्ती के नाम पर कलंक है
Udan Tashtari said…
आप अभी भी दोस्त कह रहे हैं??
आलोक said…
विश्वासघात तो वही करेगा न जिसपर विश्वास हो।
Anonymous said…
dosti jaise lafj aur ashish mahrshi/jaipuriya/banarasi/bhopali/..... ke munh se?????????????????????????
करलो....करने से ही यह दुनिया है....
विश्वास को टूटने न देना ही अपने आप मे विश्वास को ज़िन्दा रखना है. उलझन को झटक दीजिए और विश्वास पर अटल रहिए. आपका प्यारा दोस्त एक दिन आपके प्यार की इबारत को ज़रूर समझेगा. (कविता की व्याख्या या सत्य नही मालूम)

Popular posts from this blog

मै जरुर वापस आऊंगा

समझ में नहीं आ रहा कि शुरुआत क्‍हां से और कैसे करुं। लेकिन शुरुआत तो करनी होगी। मुंबई में दो साल हो गए हैं और अब इस श‍हर को छोड़कर जाना पड़ रहा है। यह मेरी सबसे बड़ी कमजोरी है कि मैं जहां भी रहता हूं उसके मोह में बंध जाता हूं। बनारस से राजस्‍थान आते भी ऐसा ही कुछ महसूस हुआ था। फिर जयपुर से भोपाल जाते हुए दिल को तकलीफ हुई थी। इसके बाद भोपाल से मुंबई आते हुए भोपाल और दोस्‍तों को छोड़ते हुए डर लग रहा था। और आज मुंबई छोड़ते हुए अच्‍छा नहीं लग रहा है। मैं बार बार लिखता रहा हूं कि मुंबई मेरा दूसरा प्‍यार है। और किसी भी प्‍यार को छोडते हुए विरह की अग्नि में जलना बड़ा कष्‍टदायक होता है। इस शहर ने मुझे बहुत कुछ दिया। इस शहर से मुझे एक अस्तिव मिला। कुछ वक्‍त उसके साथ गुजारने का मौका मिला, जिसके साथ मैने सोचा भी नहीं था। मुंबई पर कई लेख लिखते वक्‍त इस शहरों को पूरी तरह मैने जिया है। लेकिन अब छोड़कर जाना पड़ रहा है। बचपन से लेकर अब तक कई शहरों में जिंदगी बसर करने का मौका मिला। लेकिन बनारस और मुंबई ही दो ऐसे शहर हैं जो मेरे मिजाज से मेल खाते हैं। बाकी शहरों में थोड़ी सी बोरियत होती है लेकिन यहां ऐसा ...

अजी एक नजर इधर भी

पिछले दिनों हमारी एक मित्र ने हमें एक ईमेल भेजा। इसमें किसी ब्‍लॉग का लिंक था लेकिन जब लिंक खोला तो इसमें कुछ शानदार देखने को मिला। बस आपको करना यह है कि नीचे जो चित्र है उसे बड़े ध्‍यान से देखें। बस देखते रहिए। चाहे तो आप कमेंट भी कर सकते हैं।

मीडिया - मैसेज - सेक्स

उन दोनों की मुलाकात हुए कुछेक ही महीने हुए थे। लेकिन इन कुछेक महीनों में वे कुछ अधिक करीब आ गए थे। लड़की यूनिवर्सिटी में पढ़ती थी तो लड़का वहां ग्रेड टू का कर्मचारी था। उसकी डच्यूटी यूनिवर्सिटी की लायब्रेरी में थी। जहां वह अक्सर किताबों के बहाने उसे देखने के लिए आती रहती थी। लायब्रेरी की रैक से किताबें निकलती थीं। पन्ने पलटे जाए जाते थे। लेकिन नजरे सामने बैठे उस ग्रेेड टू के कर्मचारी पर होती थी। वह कर्मचारी भी उसके आने के बाद कुछ अधिक ही सक्रिय हो जाता था। स्टूडेंट्स को लेकर चपरासी पर रौब झाड़ने का कोई मौका वह नहीं छोड़ता था। वे दोनों एक दूसरे की जरूरतों को पूरा कर रहे थे। बसंत के बाद यूनिवर्सिटी में नया बैच आया। वह अब सीनियर्स बन गई थी। लेकिन वह लड़का अभी सेकेंड ग्रेड का ही कर्मचारी था। नए बैच में कुछ खूबसूरत लड़कियों के साथ कुछ पैसे वाले लड़के तो कुछ गांव से पहली बार निकले लड़के भी आए थे। बंसत के साथ अब सबकुछ बदल गया था। अब सेकेंड ग्रेड का कर्मचारी और उस लड़की में कुछ भी पहले जैसा नहीं था। स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही थी। कल तक जिस लड़की को वह अपनी सेकेंड हैंड स्कूटर पर बैठाकर उसके घ...