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वाकई मुंबई हादसों का शहर है

वाकई यह शहर हादसों का शहर है। यहां कब क्‍या हो जाए, कुछ भी कहना मुश्किल है। जैसे आज सुबह मेरे ऑफिस के करीब वाले मॉल में एक आदमी को चाकू घोपकर मारने का प्रयास किया जाता है और कुछ ही देर में यहां पुलिस के साथ प्रेस वालों का जमावड़ा खड़ा हो जाता है और यह जमावड़ा इस पोस्‍ट को लिखने तक वहीं पर खड़ा है। इसमें आईबीएन7, आज तक, स्‍टॉर न्‍यूज से लेकर स्‍थानीय चैनल वाले तक शामिल हैं। कुछ अखबार वाले भी हैं लेकिन उन्‍हें पहचाना थोड़ा मुश्किल है। सब अपने अपने ढ़ंग से स्‍टोरी बनाने में जुटे पड़े हैं।

मामला यह है कि मैग्‍नेट मॉल के सुपरवाइजर की हत्‍या का प्रयास किया जाता है और कारण यह था कि उसने अपने एक पूर्व कर्मचारी को वेतन नहीं दिया था। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर इतनी छोटी सी वजह से हत्‍या कैसे की जा सकती है लेकिन यह प्रयास हुआ है। बात देखने में भले ही छोटी लगे लेकिन यहां हमें यह देखना होगा कि तीन हजार रुपए की पगार पर काम करने वाले उस व्‍यक्ति के घर की माली हालत कैसी होगी। उसका एक परिवार होगा, जिसमें उसकी पत्‍नी, मां बाप और बच्‍चे होंगे। ऐसे में यदि तीन हजार रुपए यानि उसे पगार नहीं मिले तो उसके घर में कई दिनों तक चूल्‍हा नहीं जला होगा। तभी तो उसे इतना बड़ा कदम उठाना पड़ा होगा। मैं उस व्‍यक्ति के अपराध को सही नहीं ठहरा रहा हूं लेकिन मुंबई में लाखों की तादाद में ऐसे लोग हैं जो कि हर रोज दो जून की रोटी के लिए लड़ते हैं। इनके सामने जिंदा रहने का सकंट है। हजारों की तादाद में हर रोज इस शहर में आते हैं। कुछ यहीं अपने अस्तिव के लिए लड़ते हैं तो कुछ वापस अपने गांव या शहर चले जाते हैं। ऐसा है यह शहर। वाकई मुंबई हादसों का शहर है।

Comments

मेग्‍नेट हाइपर मार्केट मॉल वालों ने उस कर्मचारी को वेतन न देकर अपराध किया है। मुंबई ही नहीं अपने देश में कई कं‍पनियां, फर्मे और सेठ लोग अपने कर्मचारियों का मामूली पैसा इसी तरह खा जाते हैं और शायद इसी बल पर अमीर बने हैं। शर्म आनी चाहिए इतने बड़े स्‍टोर चलाने वालों को कि उस कर्मचारी के तीन हजार रुपए रोक लिए। हालांकि, यह सही है कि जिस कर्मचारी ने चाकू से हमला किया वह सही नहीं है लेकिन उसने किसी पीडा में ही यह कदम उठाया होगा और इस कदम को उठाने से पहले उसने इस सुपरवाइजर से कई बार बात की होगी और उसने प्‍यार या डांटकर उसे हडकाया होगा। वेतन दे देता तो यह नौबत ही नहीं आती लेकिन लगता है सुपरवाइजर इस स्‍टोर के मालिक को खुश करने में लगा होगा कि सेठजी मैंने आपके तीन हजार रुपए बचा दिए। लेकिन अमीरों की आवाज में गरीब का दर्द किसी को महसूस नहीं होगा।

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