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एक नजर यारा दा ठर्रापना पर

हिंदी में इस वक्त इतने ब्लॉग हो गए हैं कि कुछ समझ में ही नहीं आता है कि कौन से ब्लॉग को पढ़ा जाए और कौन सा छोड़ा जाए। कुछ ऐसे ब्लॉग हैं जिन्हें चौबीस घंटे में एक बार देखना ही पढ़ता है। मजबूरी सी हो गई है। तो कुछ ऐसे ब्लॉग भी हैं जहां कभी कभी नजर पढ़ती है। कुछ ब्लॉग जिन पर कभी कभी जाना होता है, उन्हें पढ़कर यही लगता है कि इनकी गलियों में कभी कभी क्यों जाया जाए। रोज क्यों नहीं?

मसलन एक नजर शब्द योग पर। शब्द योग ब्लॉग पर जहां कुछ अच्छे व्यंग्य हैं तो कुछ दिल को छूती कविता। शब्द योग ब्लॉग के लेखक अनुज खरे भोपाल में रहते हैं और दैनिक भास्कर में कार्यरत्त हैं। इनकी व्यंग्य की शैली कमाल है। यकीन नहीं आता तो एक नजर यारा दा ठर्रापना पर। इसे पढ़ने पर आप बिना कमेंट के रही नहीं सकते हैं। तो देर किस बात की। जरा जल्दी से पढ़कर मुझे बताएं।

Comments

Anonymous said…
यार ब्लॉग तो शानदार है। खैर सुना है तुम्हारी पाखी की शादी है।

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मै जरुर वापस आऊंगा

समझ में नहीं आ रहा कि शुरुआत क्‍हां से और कैसे करुं। लेकिन शुरुआत तो करनी होगी। मुंबई में दो साल हो गए हैं और अब इस श‍हर को छोड़कर जाना पड़ रहा है। यह मेरी सबसे बड़ी कमजोरी है कि मैं जहां भी रहता हूं उसके मोह में बंध जाता हूं। बनारस से राजस्‍थान आते भी ऐसा ही कुछ महसूस हुआ था। फिर जयपुर से भोपाल जाते हुए दिल को तकलीफ हुई थी। इसके बाद भोपाल से मुंबई आते हुए भोपाल और दोस्‍तों को छोड़ते हुए डर लग रहा था। और आज मुंबई छोड़ते हुए अच्‍छा नहीं लग रहा है। मैं बार बार लिखता रहा हूं कि मुंबई मेरा दूसरा प्‍यार है। और किसी भी प्‍यार को छोडते हुए विरह की अग्नि में जलना बड़ा कष्‍टदायक होता है। इस शहर ने मुझे बहुत कुछ दिया। इस शहर से मुझे एक अस्तिव मिला। कुछ वक्‍त उसके साथ गुजारने का मौका मिला, जिसके साथ मैने सोचा भी नहीं था। मुंबई पर कई लेख लिखते वक्‍त इस शहरों को पूरी तरह मैने जिया है। लेकिन अब छोड़कर जाना पड़ रहा है। बचपन से लेकर अब तक कई शहरों में जिंदगी बसर करने का मौका मिला। लेकिन बनारस और मुंबई ही दो ऐसे शहर हैं जो मेरे मिजाज से मेल खाते हैं। बाकी शहरों में थोड़ी सी बोरियत होती है लेकिन यहां ऐसा ...

अजी एक नजर इधर भी

पिछले दिनों हमारी एक मित्र ने हमें एक ईमेल भेजा। इसमें किसी ब्‍लॉग का लिंक था लेकिन जब लिंक खोला तो इसमें कुछ शानदार देखने को मिला। बस आपको करना यह है कि नीचे जो चित्र है उसे बड़े ध्‍यान से देखें। बस देखते रहिए। चाहे तो आप कमेंट भी कर सकते हैं।

मीडिया - मैसेज - सेक्स

उन दोनों की मुलाकात हुए कुछेक ही महीने हुए थे। लेकिन इन कुछेक महीनों में वे कुछ अधिक करीब आ गए थे। लड़की यूनिवर्सिटी में पढ़ती थी तो लड़का वहां ग्रेड टू का कर्मचारी था। उसकी डच्यूटी यूनिवर्सिटी की लायब्रेरी में थी। जहां वह अक्सर किताबों के बहाने उसे देखने के लिए आती रहती थी। लायब्रेरी की रैक से किताबें निकलती थीं। पन्ने पलटे जाए जाते थे। लेकिन नजरे सामने बैठे उस ग्रेेड टू के कर्मचारी पर होती थी। वह कर्मचारी भी उसके आने के बाद कुछ अधिक ही सक्रिय हो जाता था। स्टूडेंट्स को लेकर चपरासी पर रौब झाड़ने का कोई मौका वह नहीं छोड़ता था। वे दोनों एक दूसरे की जरूरतों को पूरा कर रहे थे। बसंत के बाद यूनिवर्सिटी में नया बैच आया। वह अब सीनियर्स बन गई थी। लेकिन वह लड़का अभी सेकेंड ग्रेड का ही कर्मचारी था। नए बैच में कुछ खूबसूरत लड़कियों के साथ कुछ पैसे वाले लड़के तो कुछ गांव से पहली बार निकले लड़के भी आए थे। बंसत के साथ अब सबकुछ बदल गया था। अब सेकेंड ग्रेड का कर्मचारी और उस लड़की में कुछ भी पहले जैसा नहीं था। स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही थी। कल तक जिस लड़की को वह अपनी सेकेंड हैंड स्कूटर पर बैठाकर उसके घ...