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बड़ी अजीब सी सुबह थी आज की

सुबह जब रोजाना की तरह ऑफिस के लिए निकला तो मन ही मैं तय कर लिया था कि आज समय से कुछ पहले ऑफिस पहुचना है लेकिन बुरा हो मीडिया की नौकरी का. नालासोपारा से लोकल पकड़ कर किसी तरह बांद्रा पंहुचा. बांद्रा से ही मुझे माटुंगा रोड के लिए धीमी लोकल पकड़नी थी. प्लेटफार्म तीन पर आया तो सामने शाहिद-करीना वाली लोकल आ रही थी. यह उन दो लोकल ट्रेन में से एक थी जिसे शाहिद-करीना अभिनीत फिल्म ‘जब वी मेट’ के प्रचार प्रसार के लिए काम में लाया जा रहा था, पूरी ट्रेन जब वी मेट के पोस्टरों से अटी पड़ी थी. जल्द बाजी में मैं इसी मैं चढ़ गया. लेकिन कम्बख्त यह मेरी धीमी लोकल ना होकर फास्ट लोकल थी. मन ही मन गुस्सा भी खूब आया और हँसी भी. लेकिन किया क्या जा सकता था. गलती की थी तो सज़ा भुगतनी ही थी. कई दिनों बाद गेट पर लटकने का मौका मिला. लेकिन बाहर के दृश्य को देखकर थोडी निराशा भी हुई. बड़ी तादाद में मुम्बई जैसे शहर में लोग पटरियों के किनारे निपटने के लिए बैठे हुए थे. एक एक नल के नीचे कई लोग नहाने पर विवश थे. बड़ी तादाद में पटरियों के किनारे झुग्गी झोपडी और उसके बाहर निराश और लटके चेहरों के साथ बैठे लोग. क्या आप विश्वास मानेंगे कि मुम्बई की करीब ६० फीसदी आबादी झुग्गी झोपडी या ऐसी ही जगह पर रहती है. जिसे अधिकतर मुम्बई के अमीर लोग मुम्बई पर बोझ मानते हैं.

बड़ी अजीब सी सुबह थी आज की. ऐसा नहीं है कि यह सब मैंने पहली बार देखा हूँ. देखता तो कमोबेश हमेशा ही हूँ. लेकिन आज सोच इस रहा हूँ कि एक और जब वी मेट की काफी चर्चा है। इस फिल्म में शाहिद-करीना प्रमुख भूमिका में हैं. चारों और उनके रोमांच और उसके बाद अलगाव का बाजार गर्म है. लेकिन कहीं भी ट्रेन की पटरियों के किनारे के लोगों की चर्चा नहीं हैं. आख़िर ऐसा क्यों है. शायद इसके लिए हम ही जिम्मेदार है. हम अखबारों में यहाँ चैनलों में ऐसी न्यूज़ आते ही पन्ना या फिर चैनल बदल देते हैं. कम से कम मैं तो अपने आसपास यही देखता हूँ. हो सकता है आप इसे देखते हों.
पिछले दिनों जब ‘जब वी मेट’ के पोस्टरों से सजी-धजी इस ट्रेन में कोई और नहीं खुद शाहिद कपूर ने यात्रा की थी तो शायद उनका ध्यान भी पटरियों के आसपास रहने वालों पर भी गया होगा.

Comments

manglam said…
चिंता जायज है। विकास का ढिंढोरा पीटने वाले मंत्री जब आजादी के ६० साल बाद भी इस ओर से आंख मूंदे हुए हैं तो इस देश के हम निरीह नागरिक चाहकर भी क्या कर सकते हैं। हां, चिंता जताने की संवेदनशीलत भी बची है, यह कम संतोष का विषय नहीं है।
Anonymous said…
अच्छा है भाई.......ऐसे ही लिखते रहें....

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