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Showing posts from April, 2008

मुंबई डायरी

कई महीनों पहले एक अंग्रेजी के अखबार में पढ़ा था कि न्‍यूयार्क और लंदन के बाद मुंबई ही एक मात्र ऐसा शहर है जो आपको जीरो से हीरो बना सकता है। बस कूबत आपमें होनी चाहिए। ऐसा मुझे भी लगता है। आज ही लग रहा है, ऐसा नहीं है। मुंबई में जब पहली बार कदम रखा था तो यहां की आसमान छूती इमारतों को देख कर मन में एक अजीब सा भाव उठ रहा था। दिल्‍ली की तुलना में यह शहर कुछ अधिक बेहतर है। यहां दिखावा उतना नहीं है, जितना की दिल्‍ली में देखने को मिलता है। दिल्‍ली में जब आप प्रवेश करते हैं तो चारों ओर खुलापन दिख है। मुंबई में ऐसा नहीं है। जब आप यहां के वीटी या दादर जैसे प्रमुख रेलवे स्‍टेशन में प्रवेश करते हैं तो चारों ओर जनसैलाब के साथ बड़ी बड़ी इमारतें आपका स्‍वागत करती हैं। सब भागे जा रहे हैं। वक्‍त की कमी है।

एक के बाद एक लोकल ट्रेन अपने अंदर से भीड़ को उगलती हैं और निगलती हैं। पहली पहली बार सब कुछ अजीब सा लगता है। यदि आपका दिल कमजोर है तो बस आप यही चाहेंगे कि दूसरी ट्रेन पकड़ कर गांव या उस शहर को लौट जाएं जहां से आएं है। लेकिन एक बार जब आप इस शहर में कदम रख देते हैं तो अपने आप हमारों ख्‍वाब आपके अंदर उमड़…

मै जरुर वापस आऊंगा

समझ में नहीं आ रहा कि शुरुआत क्‍हां से और कैसे करुं। लेकिन शुरुआत तो करनी होगी। मुंबई में दो साल हो गए हैं और अब इस श‍हर को छोड़कर जाना पड़ रहा है। यह मेरी सबसे बड़ी कमजोरी है कि मैं जहां भी रहता हूं उसके मोह में बंध जाता हूं। बनारस से राजस्‍थान आते भी ऐसा ही कुछ महसूस हुआ था। फिर जयपुर से भोपाल जाते हुए दिल को तकलीफ हुई थी। इसके बाद भोपाल से मुंबई आते हुए भोपाल और दोस्‍तों को छोड़ते हुए डर लग रहा था। और आज मुंबई छोड़ते हुए अच्‍छा नहीं लग रहा है। मैं बार बार लिखता रहा हूं कि मुंबई मेरा दूसरा प्‍यार है। और किसी भी प्‍यार को छोडते हुए विरह की अग्नि में जलना बड़ा कष्‍टदायक होता है।

इस शहर ने मुझे बहुत कुछ दिया। इस शहर से मुझे एक अस्तिव मिला। कुछ वक्‍त उसके साथ गुजारने का मौका मिला, जिसके साथ मैने सोचा भी नहीं था। मुंबई पर कई लेख लिखते वक्‍त इस शहरों को पूरी तरह मैने जिया है। लेकिन अब छोड़कर जाना पड़ रहा है। बचपन से लेकर अब तक कई शहरों में जिंदगी बसर करने का मौका मिला। लेकिन बनारस और मुंबई ही दो ऐसे शहर हैं जो मेरे मिजाज से मेल खाते हैं। बाकी शहरों में थोड़ी सी बोरियत होती है लेकिन यहां ऐसा …

बस में तुम्‍हारा इंतजार

हर रोज की तरह मुझे आज भी पकड़नी थी बेस्‍ट की बस।
हर रोज की तरह मैंने किया आज भी तुम्‍हारा इंतजार
अंधेरी के उसी बस स्‍टॉप पर
जहां कभी हम साथ मिला करते थे
अक्‍सर बसों को मैं बस इसलिए छोड़ देता था
ताकि तुम्‍हारा साथ पा सकूं
ऑफिस के रास्‍ते में

कई बार हम साथ साथ गए थे ऑफिस
लेकिन अब वो बाते हो गई हैं यादें

आज भी मैं बेस्‍ट की बस में तुम्‍हारा इंतजार करता हूं
और मुंबई की खाक छानता हूं
अंतर बस इतना है अब बस में तन्‍हा हूं
फिर भी तुम्‍हारा इंतजार करता हूं

वो चौराहे के किसी न किसी रास्‍ते से वापस जरुर आएगी

वो चली गई। उसने एक बार भी उसे पीछे मुड़कर नहीं देखा। जबकि वो काफी देर तक उसी चौराहे पर खड़ा देखता रहा। उसे आस थी, वो मुड़ेगी और उसे हल्‍की नजर से देखेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वो उसे भरपूर नजर से देखना चाह रहा था। कई दिन, कई महीने, कई बरस और कई सदिया बीत गई। लेकिन वो आज भी वहीं खड़ा है और उसका इंतजार कर रहा है। बस इसी आस में, कि वो चौराहे के किसी न किसी रास्‍ते से वापस जरुर आएगी। वो आज भी इंतजार कर रहा है।

साधारण आंखों में असाधारण सपने

महात्‍मा गांधी के सपनों का हिंदुस्‍तान भले ही हम न बना पाएं लेकिन बापू की प्रयोगधर्मिता देशके उन तमाम युवाओं को जाने अनजाने में जरुर प्रेरित करती है, जिसके कारण आज सैकड़ों की तादाद में युवक-युवतियां जमीन से उठकर सफलता के नए मापदंड तय कर रहे हैं। वो कोई भी हो सकता है। बशर्ते उन्‍हें जोखिम उठाने का सा‍हस हो। वो एक पेट्रोल पंप पर काम करने वाले युवक से औद्यगिक साम्राज्य खड़ा करने वाले धीरूभाई अंबानी भी हो सकते हैं और साधारण सी नौकरी करने वाले एक पत्रकार से अपना मीडिया साम्राज्‍य खड़ा करने वाले राघव बहल भी।

आप इस बात को माने या नहीं मानें लेकिन जमीन के नीचे काफी कुछ बड़ी तेजी से बदल रहा है। इस बदलाव का आमतौर पर सतही नजर से देखने या अनुभव करने से कोई अहसास नहीं होता लेकिन चीजों में बदलाव तो ही रहा है। यह बदलाव हिंदुस्‍तान में तेजी से उभरते मध्‍य वर्ग में हो रहा है। कल के लखपति या फिर कुछ रुपए तक कमाने वाला आज मध्‍यवर्ग की पहचान बन चुका है। इसमें आप चाहें तो अंबानी साम्राज्‍य के जनक धीरुभाई को या फिर मुंबई के उन हजारों डिब्‍बों वालों को शामिल कर सकते हैं, जिनकी समाज में एक अलग पहचान है। कोई भ…