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एक अधूरा प्रेम पत्र

उसने एक बार फिर से कोशिश की कि वह आपस आ जाए। उसने अपना लैपटॉप ऑन किया और कुछ लिखने लगा। वह क्या लिख रहा है, उसे भी नहीं पता। शुरूआत कुछ यूं की.. प्रिय गीत, तुम जा चुकी थी। तुम चली गई आखिरकार। कितनी कोशिश की थी तुम्हें रोकने की मैंने। सबकुछ बेकार रहा। तुम नहीं रूकी। तुमने तय कर लिया कि अब जो भी हो जाए, मेरे जैसे शख्स के साथ कोई संबंध नहीं रखोगी। तुम लगातार मुझसे दूर होती जा रही थी। और मैं सिर्फ देखता ही रह गया। जिस शहर में हम पहली बार मिले थे, उसी शहर में हम जुदा भी हुए। शुरूआत के कुछ महीने तुम कितना दुखी थी। ऑफिस हो, मुंबई हो या फिर खुद का घर, हर जगह तुम्हारे जाने के बाद की उदासी छाई हुई थी। तुम जा चुकी थी। मैं तो बहुत पहले ही जा चुका था। बाद में लौटकर भी आया मैं। लेकिन तुम नहीं लौट पाई। नहीं चाहते हुए भी मुझे एक फैसला लेना पड़ा। हर बार कि तरह इस बार भी मैंने ही फैसला लिया। इस बार तो तुम्हें इसके बारे में बताया भी नहीं। लेकिन मेरी जिंदगी में आने का और मुझे अपनी जिंदगी में लेना का फैसला तुमने ही किया था। मैं तुम्हारा पहला प्यार था। ऐसा तुमने बताया था लेकिन फिर भी तुम वापस नहीं आ पाई। तु...

कॉफी हाउस

कई दिनों बाद आज उसका न्यू मॉर्केट वाले कॉफी हाउस में जाना हुआ। उसने अंदर घुसते ही वेटर को एक ब्लैक कॉफी लाने का आर्डर दिया और सीट पर दोनों हाथ रखकर बैठ गया। वह कुछ सोच रहा था लेकिन कॉफी की खुशबू ने उसका ध्यान भंग किया। गर्मागम कॉफी का पहला घूंट गले में उतरने से पहले ही अटक गया। सामने से गीत और दुष्यंत आते हुए दिखे। दोनों एक दूसरे का हाथ थामें अंदर चले आ रहे थे। एक दूजे में खोए हुए से वे सीधे कॉफी हाउस के फैमिली वाले हिस्से में चले गए। उनकी नजर अमित पर नहीं पड़ी थी क्योंकि वो नीचे वाले हिस्से में बैठा हुआ था। शहर का यह कॉफी हाउस किसी जमाने में पत्रकारों, साहित्यकारों, नेताओं, स्टूडेंट्स और बुद्धिजीवियों की सैरगाह हुआ करता था। अब इसे दो भागों में बांट दिया गया है। एक हिस्सा पूरी तरह आधुनिक रेस्टोरेंट की शक्ल अख्यिातर कर चुका है तो दूसरा हिस्सा आज भी अतीत में ही उलझा हुआ है। उन दोनों को देखकर पहले तो अमित ने उन्हें नजरअंदाज करने की कोशिश की लेकिन फिर उन्हें उस वक्त तक देखता रहा, जब तक वे आंखों से ओझल नहीं हो गए। अमित, दुष्यंत और गीत एक ही ऑफिस में काम करते थे। अमित ने जब पहली बार गीत को द...

दिल्ली की बारिश ने इस बार रूला दिया...

एक बार फिर उसका दिल्ली जाना हुआ। शहर में झमाझम बारिश हो रही थी। एयरपोर्ट से घर पहुंचने के लिए उसने टैक्सी ली। टैक्सी में जैसे ही वह बैठा, एफएम के गाने ने उसे अतीत में ले जाकर पटक दिया। गाने के बोल कुछ यूं थे.चलते-चलते क्यूं ये फासले हो गए..इस गाने में वह खुद को खोजने लगा। शीशे से बाहर झांकते हुए उसकी निगाह किसी को खोज रही थी। वह जा चुकी थी। उनके बीच फासले बहुत बढ़ चुके थे। उसने कार को रुकवाया और खुद को भिगोने के लिए बाहर निकला। बरखा पूरे शबाब पर थी। एक-एक बूंदे उसे जला रही थी। वह लगातार भीग रहा था। वह लगातार जल रहा था। भीगते-भीगते जब वह थक गया तो राजपथ के किनारे फुटपाथ पर दोनों हाथों से माथे को पकड़ कर बैठ गया। वक्त का पहिया उलटा चल चुका था। वह पिछले साल में था। वह बारिश की एक खूबसूरत रात थी। जब वह दोनों पहली बार दिलवालों के शहर दिल्ली में मिले थे। दोनों बहुत खुश थे। बारिश की पहली बूंदों की तरह उनकी जिंदगी भी महक रही थी। सबकुछ सामान्य था। दोनों एक दूसरे के प्यार में डूबे हुए थे। बालकनी में बूंदे पूरे शबाब के साथ बरस रही थीं। उसी बालकनी से वह दोनों बारिश की उन मासूम बूंदों के साथ खेल र...

ए लव स्टोरी एट फेसबुक - 1

देर रात जैसे ही उसे फेसबुक खोला, इनबॉक्स में एक मैसेज था किसी अमित का। अमित ने उसे एड करने की रिक्वेस्ट भेजी थी। उसने पहले उसे इगनोर करने की कोशिश की फिर उसकी प्रोफाइल में जाकर और डिटेल खोजने लगी। अमित के एबाउट मी को पढ़कर वह खुद को उसे एड करने से नहीं रोक पाई। एबाउट मी में लिखा था.मेरे आसपास हर पल बहुत कुछ घटता है लेकिन मैं बिखरता नहीं हूं। बल्कि आसमां की तरह मेरा और विस्तार होता जाता है और सागर की तरह और गहरा। रात गई, बात गई। अगली सुबह जब वह ऑफिस पहुंची तो अचानक उसके मोबाइल ने बीप किया। फेसबुक पर कोई मैसेज था। यह मैसेज अमित का था। उसने थैक यूं लिखा था। वह तुंरत अपने केबिन की ओर मुड़ी और लैपटॉप ऑन करने के साथ ही फेसबुक लॉग किया। वह ऑनलाइन का। बातों का सिलसिला निकल पड़ा। ऐसे ही कई दिन और रात बीत गई। अब अमित और वह अच्छे दोस्त बन चुके थे। दोनों ने अपने-अपने नंबर भी शेयर कर चुके थे एक दूसरे से। लेकिन अब तक फोन पर बात नहीं हुई थी। वह बरसात की शाम की। शहर को पहली बार बारिश ने भिगोया था। कार ड्राइव करते हुए वह घर की ओर लौट रही थी। अचानक उसका मोबाइल बजा। यह अमित का कॉल था। वह उससे मिलना चाहता...

वह सोना चाहता है लेकिन नींद उसकी नीली आंखों से काफी दूर है...

वह लगातार कई दिनों से सोना चाह रहा था। लेकिन नींद थी, जो आने का नाम ही नहीं ले रही थी। उसकी आंखे तो भारी होती पर हो सो नहीं पाता था। हाथ-पांव के नाखून भी बढ़ चुके थे। इससे नहाने की उम्मीद करना रेत में पानी ढूंढने के समान था। फिर भी कुछ लोग उससे उम्मीद करते थे अच्छा बनने की। वह जी रहा था। क्यों जी रहा था, यह न उसे पता था और न उसके आसपास के लोगों को। यह अलग बात थी कि उसके आसपास ऐसा कोई नहीं बचा था जिससे वह अपने दिल की बात कर सके। लेकिन आज से कुछ शताब्दी पहले तक ऐसा नहीं था। बात उस समय की है जब उस शहर में मॉल नहीं आए थे। शॉपिंग साप्ताहिक हॉट में हुआ करती थी। महिलाएं तो सड़क पर ना के बराबर निकलती थीं और सड़कों पर, जहां आज मर्सिडिज और नैनो दौड़ती हैं, वहां सिर्फ ऊंट, हाथी और घोड़े ही थे। शताब्दी बदली तो सबकुछ बदला। उस जमाने में लोग एक-दूसरे के लिए जीते और मरते थे। आज भी जीते और मरते हैं पर किसके लिए। वह भी किसी के लिए जीना और मरना चाहता था लेकिन यह लंबी दास्तान बन गई। सुना था वह भी किसी के लिए जीती और मरती थी। लेकिन यह क्या अब वह उसके लिए नहीं और किसी के लिए जीने-मरने की बात करने लगी है। शह...

वह पुराने दिनों में लौट चुका था...

अमित के सेल फोन पर रिंग बजती है। अचानक बजे इस फोन ने उसकी नींद को बुरी तरह तोड़ दिया था। बाएं हाथ से उसने फोन उठाया तो दाएं हाथ से लाइट का स्विच खोजना शुरु किया। फोन जयपुर से ही था। इस फोन कॉल ने अमित की आधी रात को तपती दोपहरी में बदल दिया था। अभी-अभी अमित को पता चला - पाखी की शादी है। बारात राजस्थान के कोटा शहर से आएगी। इस खबर पर वह कैसे रिएक्ट करे ? वह सोच नहीं पा रहा था लेकिन वह बैचेन हो चुका था। उसने आसपास की पूरी दुनिया को तहस नहस कर दिया था। इस दुनिया में वह अकेला बचा था। लेकिन यह सब ख्वाबों में था। लेकिन सच्चई यही थी कि वह पूरी दुनिया को तबाह करना चाहता था। वह पाखी और अपने पुराने रकीब से पूछना चाहता था कि वह दोनों क्यों अलग हो गए। पाखी अमित को नहीं मिल पाई पर वह इस बात से खुश था कि उसके जीवन में शुभ है। लेकिन आज पाखी और शुभ भी अलग हो चुके थे। अमित से शुभ को फोन लगाया। घंटी लगातार बज रही थी लेकिन कोई अमित का फोन उठाया नहीं गया। अमित और अधिक बैचेन हो चुका था। उसने पाखी से बात करनी चाही पर न जाने क्यूं उसने उसे कॉल नहीं किया। घड़ी रात के दो बजा रही थी। इसी के साथ वह पाखी के साथ बित...

वह फिर उसके साथ होली नहीं मना पाया

उसे अचानक एक भूली बिसरी याद आती है। कई साल पहले जब वह कॉलेज में पढ़ता था तो वहां वह भी साथ ही पढ़ती थी। नजर मिलने के साथ ही वह उसके प्रेम में रंग चुका था। पहली होली पर वह घर चली गई थी जो उत्तर प्रदेश में कहीं था। लेकिन दूसरी होली में वह इसी शहर में थी। स्थिति अब बदल चुकी थी। वह अब उसके साथ होली नहीं खेल सकता था। देखते-देखते वह परायी हो गई थी। वह किस रिश्ते से उससे होली खेलता। वह अब तक चाहता रहा कि उसे वह रंगे अपने रंग से। शुभ के साथ पाखी होली खेल रही थी। कॉलेज के अन्य साथी भी उससे होली खेल रहे थे। अमित को कुछ हो रहा था। शायद वह अंदर ही अंदर जल रहा था। वह उसके साथ होली खेलना चाहता था। वह सोचता रहा। सबने उसके साथ होली खेली। वह नहीं खेला। संकोच में नहीं खेल पाया। होली फिर आई और उससे मुलाकात भी हुई। कोई फायदा नहीं था। अमित और वो एक ही ऑफिस में थे। लेकिन होली के ऐन पहले वह घर जा चुकी थी। इस बार भी अमित की अधूरी आस अधूरी रह गई। आज फिर रंगों का त्यौहार है। वह आज भी उसके साथ रंगों का त्यौहार मनाना चाहता है। इस शहर में पानी बचाने के लिए आंदोलन चल रहे हैं। हर कोई सूखी होली की बात कर रहा है। ताकि...

मीडिया - मैसेज - सेक्स

उन दोनों की मुलाकात हुए कुछेक ही महीने हुए थे। लेकिन इन कुछेक महीनों में वे कुछ अधिक करीब आ गए थे। लड़की यूनिवर्सिटी में पढ़ती थी तो लड़का वहां ग्रेड टू का कर्मचारी था। उसकी डच्यूटी यूनिवर्सिटी की लायब्रेरी में थी। जहां वह अक्सर किताबों के बहाने उसे देखने के लिए आती रहती थी। लायब्रेरी की रैक से किताबें निकलती थीं। पन्ने पलटे जाए जाते थे। लेकिन नजरे सामने बैठे उस ग्रेेड टू के कर्मचारी पर होती थी। वह कर्मचारी भी उसके आने के बाद कुछ अधिक ही सक्रिय हो जाता था। स्टूडेंट्स को लेकर चपरासी पर रौब झाड़ने का कोई मौका वह नहीं छोड़ता था। वे दोनों एक दूसरे की जरूरतों को पूरा कर रहे थे। बसंत के बाद यूनिवर्सिटी में नया बैच आया। वह अब सीनियर्स बन गई थी। लेकिन वह लड़का अभी सेकेंड ग्रेड का ही कर्मचारी था। नए बैच में कुछ खूबसूरत लड़कियों के साथ कुछ पैसे वाले लड़के तो कुछ गांव से पहली बार निकले लड़के भी आए थे। बंसत के साथ अब सबकुछ बदल गया था। अब सेकेंड ग्रेड का कर्मचारी और उस लड़की में कुछ भी पहले जैसा नहीं था। स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही थी। कल तक जिस लड़की को वह अपनी सेकेंड हैंड स्कूटर पर बैठाकर उसके घ...

प्यार, मोहब्बत और वो

आप यकिन कीजिए मुझे प्यार हो गया है. दिक्कत बस इतनी सी है कि उनकी उमर मुझसे थोडी सी ज्यादा है. मैं २५ बरस का हूँ और उन्होंने ४५ वा बसंत पार किया है. पेशे से वो डाक्टर हैं. इसी शहर में रहती हैं. सोचता हूँ अपनी मोहब्बत का इज़हार कर ही दूँ. लेकिन डर भी सता रहा है. यदि उन्होंने ना कर दिया तो. खैर यह उनका विशेषाधिकार भी है. उनसे पहली मुलाकात एक स्टोरी के चक्कर में हुई थी. शहर में किसी डाक्टर का कमेन्ट चाहिए था. सामने एक अस्पताल दिखा और धुस गया मैं अन्दर. बस वहीं उनसे पहली बार मुलाकात हुई. इसके बाद आए दिन मुलाकातें बढती गई. यकीं मानिये उनका साथ उनकी बातें मुझे शानदार लगती हैं. मैं उनसे मिलने का कोई बहाना नहीं छोड़ता हूँ. अब आप ही बताएं मैं क्या करूँ..

वो चौराहे के किसी न किसी रास्‍ते से वापस जरुर आएगी

वो चली गई। उसने एक बार भी उसे पीछे मुड़कर नहीं देखा। जबकि वो काफी देर तक उसी चौराहे पर खड़ा देखता रहा। उसे आस थी, वो मुड़ेगी और उसे हल्‍की नजर से देखेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वो उसे भरपूर नजर से देखना चाह रहा था। कई दिन, कई महीने, कई बरस और कई सदिया बीत गई। लेकिन वो आज भी वहीं खड़ा है और उसका इंतजार कर रहा है। बस इसी आस में, कि वो चौराहे के किसी न किसी रास्‍ते से वापस जरुर आएगी। वो आज भी इंतजार कर रहा है।

परुनिशा−एक अधूरी प्रेम कथा−हर रोज मुंबई के स्‍टेशन पर वो उसका इंतजार करता है

वो हर साल की तरह इस बार भी होली पर घर जा रही है। पिछले कई सालों से अमित उसे होली पर स्‍टेशन छोडने जाता रहा है लेकिन इस बार नहीं जा पाएगा। वो गंगा किनारे एक छोटे से गांव से आती है। अमित रेतीले रेगिस्‍तान से। जैसे कभी गंगा और रेगिस्‍तान का मिलाप नहीं हो सकता है। ठीक वैसे ही वो दोनों कभी नहीं मिल सकते हैं। हुआ भी यही। अमित उसे भूलना चाहता है लेकिन शहर की फिजाओं में फैला उसका अहसास उसे भूलने नहीं देता है। या कहें कि वो उसे भूलना ही नहीं चाहता था। उसे याद है कि वो कब पहली बार उससे कहां और किस हालात में मिला था और देखते देखते उसे अपना दिल दे दिया। उनकी मोहब्‍बत का गवाह मुंबई शहर बना। यह वही मुंबई है जहां लोग प्‍यार करने के बहाने ढूंढ़ते हैं। लोकल ट्रेन से लेकर नरीमन प्‍वाइंट तक अन्‍य प्रेमियों की तरह उन दोनों की भी प्रिय जगह थी। जहां वो सकून से कुछ पल साथ गुजार सकते थे। लेकिन जूहू चौपाटी की याद आज भी उसे सबसे अधिक सताती है। जूहू की रेत पर दोनों कई बार अकेले बैठकर एक साथ कई ख्‍वाब बुनते थे। शहर की जिस गली से वो गुजरता है, उसे अचानक उसकी याद आ जाती है। चाहे वह अंधेरी की गलियां हो या फिर दादर ...

गुलाबी नगर का वो कॉफी हाउस

शहर के उस नामचीन कॉफी हाऊस में आज थोड़ी खामोशी फैली हुई थी। ठंड के दिनों में गरमा गरम कॉफी के साथ नई किताबों को खोजते कई जोड़े दिन में कम से कम एक बार तो उधर से गुजर ही जाते थे। लेकिन आज माहौल थोड़ा बदला बदला था। आज पूरे कॉफी हाऊस में एक केवल दो ही लोग थे। एक उस कॉफी हाऊस का मालिक अमित और दूसरा एक कस्‍टमर, जो कि सबसे कोने वाले सीट पर बैठ कर गरमा गरम कॉफी के साथ कोई किताब पढ़ रहा था। आज शाम कुछ अधिक ही ठंड़ी थी। लेकिन अंदर का माहौल पूरी तरह शांत और बड़ा सकून देने वाला था। गुलाबी नगर में आज से करीब बारह साल पहले यह कॉफी हाऊस खुला था। कॉफी हाऊस का मालिक अमित एक बड़े समाचार पत्र में स्‍थानीय संपादक है। दिन में एक बार अमित अपनी बेटी के संग जरुर अपने कॉफी हाऊस को देखने आ जाया करता है। बाकी समय कॉफी हाऊस का मैनेजर जॉन ही इसे संभालता है। दूसरी ओर, आज न जाने क्‍यों अमित का मन अपने ऑफिस में नहीं लग रहा था और उसने कॉफी हाऊस की ओर ही जाना बेहतर समझा। ऑफिस से निकलते हुए आज कई सालों बाद वो पुरानी बातें याद आ रही थी कि अब उसके दिमाग में पहली बार इस कॉफी हाऊस को बनाने का प्‍लान दिमाग में आया था। गाड़...

बेटी का जन्‍मदिन

उसके चले जाने के बाद मैं थोड़ा निराश था। मुझे इस बात का सपने में भी कभी ख्‍याल नहीं आया कि वो ऐसे अचानक मुझे छोड़कर चली जाएगी। शादी के केवल चार साल ही तो हुए थे। लेकिन वो मुझे और हमारी दो साल की बच्‍ची को हमेशा के लिए छोड़कर जा चुकी थी। बहुत तनाव और पीड़ा के दिन थे वो। शुरुआत में मुझे लगा कि वो वापस आ जाएगी। दूसरे पतियों की तरह मैं भी पत्नियों को अपनी जायदाद समझता था। बात सिर्फ जायदाद तक सीमित नहीं थी। मैंने उसका विश्‍वास भी तोड़ा था। शादी के बाद भी मेरा परुनिशा से मिलना जारी रहा। जिसकी भनक मिलते ही वो मुझे हमेशा के लिए छोड़कर चली गई। मैने कई बार उससे बात भी करनी चाही लेकिन कोई फायदा नहीं। वो बहुत नाराज थी। उसके जाने के बाद मैने भी परुनिशा से मिलना छोड़ दिया और परुनिशा ने भी कहीं और निकाह कर लिया था। अब मैं बिल्‍कुल तन्‍हा और अकेला था। मेरे पास अब सिर्फ मेरी बेटी थी। जिसे मुझे पालना था। मेरी बेटी एकदम अपनी मां पर गई थी। वैसे ही नाक नक्‍शे, वहीं आंखे और वैसे ही मुस्‍कुराना। आज मेरी बेटी के साथ मेरी बीवी का भी जन्‍मदिन है। मेरी बेटी आज पंद्रह साल की हो गई है। देर तक सोने वाला मैं आज सबसे...

अधूरी दास्‍तां-अमित और वो

अमित ने सोचा था कि उसके जाने के बाद उसकी यादें भूली बिसरी यादों की तरह किसी कोने में दम तोड़ देगी। उसकी यादें भी उस नई नवेली दुल्‍हन की पहली सुबह की उसके माथे की बिदिंया की तरह होगी, जो कि बेतरकीब ढंग से माथे पर फिसलती रहती है। और वह काफी हद तक सही था। वो उसे लगातार भूलता जा रहा था, लेकिन दिन न जाने बेमौसम बारिश की तरह उसकी यादें उसे सताती लगती है और वो भीगता रहता है। शायद भीगना चाहता भी है । आज उसे लग रहा था कि उसे उसकी याद नहीं आ रही है। क्‍योंकि यादें तो उनकी आती हैं जिन्‍हें हम भुला देते हैं और उसे तो उसने कभी नहीं भुलाया था। आज वह बस यही सोच र‍हा था कि जब भी वो उससे पहली बार मिलेगा तो उसकी मांग में सुर्ख लाल सिंदूर की हल्‍की लकीर होगी जो कि उसे बार बार इस बात का अहसास कराएगी कि वो अब शादीशुदा है। किसी की बहू तो किसी की पत्‍नी है। ऐसे में उससे मिलना सही होगा। शायद नहीं। यह सोचते सोचते न जाने कब अमित की आंख लग गई। पता ही नहीं चला। सुबह जब नींद टूटी तो घड़ी सुबह के नौ बजने का इशारा कर रही थी। वो आज फिर ऑफिस जाने के लिए लेट हो गया। उसे याद है कि जब से वो उसे छोडकर इस शहर से गई है तब ...

वो नहीं आई

वो हर रोज सुबह के पहली पहल गंगा मईया के दर्शन को आती थी। सुंदर मुख, भरा हुआ शरीर और गहरी आंखों में बहुत कुछ खोया हुआ था उसकी। लेकिन इसके बावजूद वह सफेद साड़ी में लिपड़ी बस जिंदा लाश थी, जो इस शहर की एक धर्मशाला के एक अंधेरे कमरे में रह कर अपनी मौत का इंतजार करती रहती थी। पच्‍चीस साल की थी बिमला बस। रोजाना की तरह वह वहां उसका इंतजार कर रहा था लेकिन आज बिमला नहीं आई। माहौल में अजीब सी खामोशी थी। धर्मशाला के बाहर जब वह पहुंचा तो कुछ लोग एक लाश को बांधकर गंगा मईया के हवाले करने जा रहे थे। आज बिमला हमेशा के लिए गंगा मईया में जा रही थी। अब सिर्फ वह और गंगा मईया होंगी। मोहल्‍ले में चर्चा है कि बिमला ने खुदखुशी कर ली। अब वह उसे कभी नहीं देख पाएगा। वह उससे बात करना चाहता था लेकिन आज तक उसने केवल उसे देखा ही था, बात करने की कभी हिम्‍मत नहीं हुआ और अब तो वह हमेशा के लिए ही चली गई है। कुछ दिनों बाद उस धर्मशाला में एक दूसरी विधवा आ गई।

उसका यूं चला जाना

कुछ रिश्‍ते ऐसे होते हैं जो हमें सबसे प्रिय होते हैं। उन रिश्‍तों के आगे और पीछे हमें कुछ भी नहीं सूझता है और खास तौर पर ये रिश्‍तों उस दौर में बनते हैं जब आप या तो स्‍कूल में होते हैं या कॉलेज में। यानि उस उम्र में जब आप धीरे धीरे दुनिया को समझने लगते हैं। ऐसा सबके साथ होता है। लेकिन एक वक्‍त ऐसा भी आता है कि आप अपना साया आपका साथ छोड़ने लगता है, दूसरों से क्‍या गिला की जाए। कॉलेज के शुरुआती दौर में की वह उसकी तरफ खींचा चला जा रहा था। कुछ था उस लड़की में। शायद वह उससे प्‍यार करने लगा था। शायद इसलिए क्‍योंकि वह एकतरफा प्‍यार था। और फिल्‍मों की तरह यहां भी एक तरफा प्‍यार सफल हो नहीं सकता। लेकिन कई सालों की दोस्‍ती में उनके बीच एक ऐसा संबंध बन गया था कि उसे विश्‍वास था कि वह उसे कभी छोड़कर नहीं जाएगा। एक दोस्‍त के रुप में वह हमेशा उसके साथ रहेगी। लेकिन नहीं ऐसा नहीं हुआ। मुंबई में एक साल साथ रहने के बाद वह चली गई। स्‍टेशन पर दोनों रोए भी लेकिन वहां जाने के बाद न जाने ऐसा क्‍या हुआ कि वह उससे बात ही करना छोड़ दी। आखिर ऐसा क्‍यूं किया उसने। आज भी वह बस एक ही प्रश्‍न उससे करना चाहता है। लेक...

एक प्रेम कथा --वह खूबसूरत शाम उसके जीवन की सबसे भयावह शाम में बदल चुकी थी

उम्र बढ़ने के साथ कुछ पुराने रिश्‍तें कमजोर पड़ते जाते हैं और इसके साथ नए रिश्‍तों की नींव पड़ती जाती है। उसके साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था। वह जीवन के उस पड़ाव पर खड़ा था जहां से वह अपनी खुद की नजरों से दुनिया देखना चाहता था। अब वह जवान हो रहा था। या कहें हो चुका था। इन्‍हीं नए रिश्‍तों में उसका पहला रिश्‍ता पाखी से बना और शायद यह अंतिम भी था। दोनों एक ही मीडिया संस्‍थान में काम करते थे। घर से दूर। दोनों के अरमान एक थे बस रास्‍ते जुदा। वह समय के साथ चलना चाहता था और पाखी समय से आगे। लेकिन मंजिल एक थी। शहर की सबसे खूबसूरत शाम थी वह लेकिन उसे नहीं मालूम था कि वह आज के बाद कभी भी उससे नहीं मिलने वाली थी। पाखी-अमित मैं यह शहर छोड़कर जा रही हूं। लेकिन क्‍यूं और यह अचानक कैसे ? बस मुझे जाना पड़ रहा है। और प्‍लीज कुछ पूछना मत। यह अंतिम लाईने थी पाखी थी। और वह खूबसूरत शाम उसके जीवन की सबसे भयावह शाम में बदल चुकी थी। लेकिन कहते हैं ना कि समय का मरहम बड़े से बड़े रोग को मिटा देता है। उसके साथ भी ऐसा ही हुआ। वह पाखी को भूल चुका था। समय बीतता गया और पुराने घाव खत्‍म होते गए। अचानक एक दिन उसे एक कॉ...

एक अधूरी प्रेम कथा

शहर का पुराना चौक आज कुछ ज्यादा ही व्यस्त था। शहर की सभी मोटर गाडियाँ दिन में एक बार इधर से जरुर गुजरती थीं. आज भी गुजर रही थीं. पास में ही टाउन हाल का खाली भवन, जहाँ कभी कभी कोई भटकता हुआ राहगीर आ जाता है. इसी भवन में वो दोनों कुछ ऐसे फैसले ले रहे थे जो कि उनकी ज़िंदगी के साथ कई और लोगों का जीवन बदलने वाला था. 'मुझे नहीं पता कि मैं जो बोलने जा रहा हूँ उसके बाद तुम्हारा क्या रि-एक्शन होने वाला है। लेकिन यदि मैंने और कुछ दिनों यह बात अपने दिल में दबाई तो शायद मैं इसका बोझ सह नहीं सकूं. मैं जीना चाहता हूँ. एक भरपूर ज़िंदगी चाहता हूँ. मुझे पता कि मेरी बात सुनने के बाद या तो तुम यहाँ से उठकर चल दोगी या फिर मुझे कभी माफ़ नहीं करोगी. लेकिन मेरे लिए तुम्हारी खुशी के संग अपनी खुशी भी चाहिए.' 'अब तुम बोलोगे क्या हुआ है तुम्हे?' ' कुछ नहीं' 'फिर मुझे यहाँ क्यों बुलाया है? अब जल्दी बोल दो' 'तुम नाराज़ तो नहीं होगी?' ' अरे नहीं महाराज जी' उसने हँसते हुए कहा। ' मैं तुमसे प्यार करता हूँ और तुम्हारे बिना नहीं रह सकता हूँ' उसे कुछ नहीं कहा। अब दोनों...

एक तरफा प्यार और नायक की मौत

अन्य कहानियो की तरह इसमें भी एक प्रेमी है और एक प्रेमिका है। कहानी की शुरुआत यह है कि एक लड़के को एक लड़की से प्यार हो जाता है. एक तरफा प्यार...दोनों एक ही कालेज में एक साथ पांच सालों का सफर तय करते हैं. लेकिन कभी भी लड़के ने लड़की से कहा कि वो लड़की से कितना प्यार करता है. दोनों में गहरी दोस्ती थी. जैसे दो जिस्म एक जान हों. दोनो ही छोटे छोटे कस्बे से आए थे। दोनों के अपने अपने सपने थे. और दोनों किसी भी किम्मत पर अपने अपने सपने को पाने में लगे हुए थे. उस लड़की के प्यार में पड़कर वो लड़का पहले अपने सच्चे दोस्तों को खोता है और फिर अपने कैरियर को भी दांव पर लगा देता है. वो उस लड़की का कहा कभी भी नहीं टालता था. घर के काम से लेकर नोट बनाने तक के मामले में वो एक ही पाँव पर खड़ा दिखता था. कहते हैं ना प्यार अँधा होता है. यहाँ सिर्फ अँधा ही नहीं बहरा और लंगडा दोनों ही था. देखते देखते कई साल बीत गए। धीरे धीरे उस लड़की ने लड़के से मिलना छोड़ दिया और एक दिन लड़के के घर पर शादी का कार्ड आया. यह उसी लड़की की शादी का कार्ड था. उसकी आँखों में अब गंगा जमुना बह रही थी. उसने तुरंत उस लड़की को फोन किया॥ और बस इ...

रेगिस्तान और वो : बंजर जमीं इंतजार की- भाग चार

हवा हल्की सी सर्द हो चुकी थी और इसी के साथ इस शहर का मौसम और मिजाज दोनों बदलने लगा था. लेकिन आज से करीब बारह साल पहले इस शहर का मिजाज थोड़ा अलग सा था. जब इस शहर की हवाओं में दोनों के प्यार की खुशबू हुआ करती थी. लेकिन आज नहीं हैं, परुनिशा की जिंदगी में अब अमित की जगह शुभ आ चुका है..या कहें की शुरू से ही शुभ रहा है उसके मन में. खैर लोगों आते और जातें हैं..जिंदगी कभी नहीं थमती हैं...इसीलिए इसे जिंदगी कहते हैं.. शहर में पिछले दिनों एक नया काफ़ी हाऊस खुला था. लेकिन आज यहाँ कुछ अजीब सा कुछ था..जैसे जैसे शाम ढल रही थी वैसे वैसे इस काफ़ी हाउस में भीड़ जुटना शुरू हो जाती थी. लेकिन आज सप्ताह का अन्तिम दिन होने के कारण यहाँ भीड़ कुछ ज्यादा ही है. शहर का यह इकलोता काफी हाउस है.... ''क्या मुझे एक गरमा गर्म काफी मिलेगी'' यह आवाज उसकी की जो अभी अभी भीगते भीगते अन्दर आई है ''बिल्कुल'' इस बार काफी हाउस के वेटर ने कहा. वो काफी पीते पीते कोने में बैठी उस महिला को निहारती रही जो कि यहाँ की मालकिन हैं. वो उसकी आंखों में कुछ खोजना चाह रही थी.अचानक कोने में बैठी उस महिला की नजर ...