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Showing posts from March, 2008

मैं, मच्‍छर और सेक्‍स अपील

आज मैं खुश हूं। पहली बार इस बात पर खुश हूं कि मुझे मच्‍छर खूब सताते हैं। खुशी की वजह पेरिस और फिनलैंड के शोधकर्ताओं की दो अलग-अलग समूह की वो रिपोर्ट भी है, जिसमें कहा गया है कि मच्छर उनकी तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं, जिनकी सेक्स अपील अच्छी होती है और जो सुंदर होते हैं। यह रिपोर्ट एक जर्मन पत्रिका में प्रकाशित हुई है।

फिनलैंड के यूनिवर्सिटी ऑफ टुरकू के प्रोफेसर पावो टिकनेन ने कुछ विवाहित जोड़ों व कुछ अकेले लोगों को मच्छरों से भरी प्रयोगशाला में कुछ समय बिताने के लिए कहा। उन पर किए गए तकरीबन सात परीक्षणों के बाद वे इस नतीजे पर पहुंचे कि मच्छर उनकी तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं, जिनके शरीर से फेरामोंस नामक मादक हार्मोन का रिसाव होता है। यहां एक बात और बताना चाहूंगा कि यह पहले से भी प्रमाणित है कि जिन व्यक्तियों के पसीने से ज्यादा मादक गंध आती है, उन्हें मच्छर काफी परेशान करते हैं। अब आगें मैं क्‍या कहूं। मैं खुश हूं। बस आपसे इतना निवेदन है कि अर्थ का अनर्थ मत निकालिएगा। लेकिन कमेंट देकर अपनी राय जरुर देकर मेरा उत्‍साहवर्धन कर सकते हैं।

क्‍या वाकई दोस्‍ती प्‍यार है

सबसे पहले मैं यह बात दूं कि यह कविता मेरी नहीं है। मेरे एक दोस्‍त ने मुझे भेजी है जिसे मैं बस आप सबके लिए लगा रहा हूं। पढि़ए और बताइए क्‍या वाकई दोस्‍ती ऐसी ही होती है जैसा इस कविता में कहा गया है।

दोस्ती पहली बारिश की बूंदों मैं है..
दोस्ती खिलते फूलों की खुशबू मैं है ..
दोस्ती ढलते सूरज की किरणों मैं है ..
दोस्ती हर नए दिन की उम्मीद है..
दोस्ती ख्वाब है, दोस्ती जीत है..
दोस्ती प्यार है, दोस्ती गीत है..
दोस्ती दो दिलों का संगीत है..
दोस्ती सांग चलती हवाओं मैं है..
दोस्ती इन बरसती घटाओं मैं है..
दोस्ती दोस्तों की वफाओं मैं है..

तीसरे बिहारी को मुंबई भेज दो

हम दो, हमारे दो, तीसरा हो तो मुंबई भेज दो। हां यही मैसेज बिहारी नेता लालू यादव ने अपने राज्‍य की जनता को दिया है। सुबह जब अपना ई मेल चेक कर रहा था तो यह मेल देख कर थोड़ा सोच में पड़ गया। क्‍या इस मैसेज पर रोया जाए या फिर बस हल्‍का सा मुस्‍कुराने से काम चल जाएगा। ऐसा भी हो सकता है कि किसी ने लालू का बदनाम करने के लिए लालू के नाम से यह मैसेज फैलाया है। खैर बात जो भी, आप तो बस यह बताएं कि इस मेल पर आपकी क्‍या प्रतिक्रिया है। आपकी प्रतिक्रिया को हम लालू यादव, बाल ठाकरे व राज ठाकरे तक पहुंचाने का प्रयास करेंगें।

क्‍यूं भईए पैंटी देख रहे हो ना !

चलिए आज मिलवाते हैं उन क्रिकेटरों से, जिन पर पूरे भारत वर्ष को गर्व है। आज गरीबी, भूखमरी जैसे मुद्वों के लिए न तो मीडिया में जगह है और न ब्‍लॉग पर। हर जगह तो बस क्रिकेट का ही जलवा है। लोग भूख से मरते हैं तो मरने दिजीए। देश की 33 फीसदी से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे है, रहने दिजीए। हम सब बस बैठकर किक्रेट देखते हैं और हमारे क्रिकेटर कुछ और।

परुनिशा−एक अधूरी प्रेम कथा−हर रोज मुंबई के स्‍टेशन पर वो उसका इंतजार करता है

वो हर साल की तरह इस बार भी होली पर घर जा रही है। पिछले कई सालों से अमित उसे होली पर स्‍टेशन छोडने जाता रहा है लेकिन इस बार नहीं जा पाएगा। वो गंगा किनारे एक छोटे से गांव से आती है। अमित रेतीले रेगिस्‍तान से। जैसे कभी गंगा और रेगिस्‍तान का मिलाप नहीं हो सकता है। ठीक वैसे ही वो दोनों कभी नहीं मिल सकते हैं। हुआ भी यही।

अमित उसे भूलना चाहता है लेकिन शहर की फिजाओं में फैला उसका अहसास उसे भूलने नहीं देता है। या कहें कि वो उसे भूलना ही नहीं चाहता था। उसे याद है कि वो कब पहली बार उससे कहां और किस हालात में मिला था और देखते देखते उसे अपना दिल दे दिया। उनकी मोहब्‍बत का गवाह मुंबई शहर बना। यह वही मुंबई है जहां लोग प्‍यार करने के बहाने ढूंढ़ते हैं। लोकल ट्रेन से लेकर नरीमन प्‍वाइंट तक अन्‍य प्रेमियों की तरह उन दोनों की भी प्रिय जगह थी। जहां वो सकून से कुछ पल साथ गुजार सकते थे। लेकिन जूहू चौपाटी की याद आज भी उसे सबसे अधिक सताती है। जूहू की रेत पर दोनों कई बार अकेले बैठकर एक साथ कई ख्‍वाब बुनते थे। शहर की जिस गली से वो गुजरता है, उसे अचानक उसकी याद आ जाती है। चाहे वह अंधेरी की गलियां हो या फिर दादर …

बुढि़या और मैं

मैं उसे हर रोज तिल तिल कर मरते देखता हूं लेकिन कुछ नहीं करता हूं। या कहूं करना ही नहीं चाहता हूं। मुझे लग रहा है मैं अपनी संवेदना खो रहा हूं इस शहर में। मैं ऐसा तो नहीं था। लेकिन अब हो गया शायद। उसे देखकर दिल दुखता है लेकिन मैं कुछ नहीं करता हूं। वसई स्‍टेशन के पास हर रोज मैं जो देखता हूं, उसके बाद मुझे सोचना पड़ता है। मैं भी बाकियों की तरह उसके बगल से निकल जाता हूं, जैसे बाकी निकल जाते हैं। लेकिन वो पिछले कई सालों से वहीं सड़क किनारें अपनी एक गठरी के साथ टिकी हुई है। वो एक बुर्जुग महिला है। जो कि आसपास वाले दुकानदारों के रहमो करम पर जिंदा है। उसे जब भी देखता हूं तो अपनी नानी की याद आ जाती है। मेरी नानी भी इतनी ही बूढ़ी थी। लेकिन वो अब नहीं हैं। खैर वापस चलते हैं वसई। हर रोज उस बुढि़या को देखकर मन में एक टीस सी उबरती है। लेकिन मैं कुछ नहीं कर पाता हूं। उसे हर रोज जिंदा देखकर मुझे अच्‍छा लगता है। वरना जिस हालत में वो है, ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि वो कब तक जिएगी। बरसात हो या फिर कड़ाते की ठंड। वो वहीं सड़क किनारे पड़ी रहती है। कभी पाव खाकर जिंदा रहती है तो कभी आस पास वाले रोटी दे दे…

बाबा की एक कविता -- अकाल और उसके बाद

नागार्जुन मेरे प्रिय कवियों में से एक हैं। जब कभी मैं सोचता हूं बाबा नागार्जुन कि कविताएं मुझे क्‍यों पसंद हैं तो जवाब भी उन्‍हीं की कविताएं दे देती हैं। नागार्जुन की कविता आम आदमी की कविता है। जिसे समझने के लिए आपको संवेदनशील होना जरुरी है। यदि आप आम आदमी का दर्द महसूस नहीं कर सकते हो तो उनकी कविता आपके किसी के काम की नहीं है। पेश है उन्‍हीं की प्रसिद्व कविता अकाल और उसके बाद ।

कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।

भड़ास, मोहल्‍ला और एक कविता

कल से हिंदी ब्‍लॉग पर मारामारी मची हुई है। जिसे देखो वही कमर के नीचे वार कर रहा है। सब मिलाकर नंगई चरम पर है। कई महीनों पहले कहीं यह कविता पढ़ी थी, शायद ऐसे माहौल में यह कविता हिंदी ब्‍लॉग के महारथियों को कोई दिशा दे पाए। और जनाब ब्‍लॉग के आगे भी जहां है। बस यह कविता गुनगुनाएं और खुदा से दुआ करें कि देश में, मोहल्‍ले में, यहां तक की अपनी भड़ास में भी हम किसी का दिल न दुखाएं।

परिवर्तन में ही है नींव
क्रांति की,
पर क्रांति अलसायी सी नहीं आती,
उसके प्रवाह में स्‍थापित मूल्‍यों के घरौंदे ढह जाते हैं,
उन्‍मूलन तो हो जाता है खंडहरों की परंपरा का
पर, यदि नव निर्माण न हो तो,
क्रांति का च्रकवात नूतनता की रेत
उछालता रह जाता है
परिवर्तन की उस मरीचिका में,
क्रांति को परिवर्तन के पड़ाव के लिए चाहिए
किसी युग पुरुष का समर्थन
और जन जन की कोटि कोटि
भुजाओं का पौरुष