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Showing posts from December, 2008

मैं तुम्हें आज भी चाहता हूं

मैंजबभीउससेबातकरताथातोएकबातजोमुझेहमेशाऔरआजभीसतातीहै, वोहैउसकीखामोशी।मैंकितनाबोलताथालेकिनवोकुछभीनहींबोलतीथी।उसकखामोशीसागरकीतरहहै।उसकीखामोशीकीहीताकतहैकिपूरीरातजागनेकेबावजूदमैंउसकेबारेंमेंलिखपारहाहूं।सुबहकेसाढ़ेपांचबजेहैंऔरमैंउसेशिद्दतसेमहसूसकरनाचाहरहाहूं।लेकिनमुझेइसबातकाइल्महैकिवोकरीबनहींहै।मैंइमरोजभीनहींबनसकताजिसेअमृताप्रीतमसेअलगकियाजासके।मैंसिर्फमैंहूं।लेकिनउसेमैंक्याकहूं? उसकीमासूमियतहीजोआजभी बांधेरखीहुईहै।वरनाहमलड़कोंकीजाततोऐसीहोतीहैकितूनहींतोऔरकोई।लेकिनमैंआजभीउसकीकमीमहसूसकरसकताहूं।उसकेसाथमैंनेजिंदगीकेसबसेबेहतरदिनगुजारेहीनहींबल्किजिएहैं।
चाहे वे भोपाल के दिन हो या फिर मुंबई के। पिछले कुछ सालों से वे काफी नाराज हैं। उनकी जगह मैं होता तो शायद मैं भी यही करता जो वे कर रही हैं। कभी कभी सोचता हूं कि आज के कुछ सालों बाद मैं अपने रिश्ते को उनके साथ कैसे देखूंगा। मुझे जवाब नहीं मालूम है। वो खुश हैं। लेकिन मैं? इसका जवाब भी मुझे नहीं पता। लेकिन फिर भी इस बात का इल्म है कि मेरी किसी भी हरकत से उन्हें तकलीफ न हो।

एक बार फिर भोपाल

लिजिए एक बार फिर भोपाल आ गया हूं। भोपाल में फिर तीसरी बार वापसी हुई है। शुरुआती दौर में लगा कि भोपाल वापसी किस दिशा में जाएगी, पता नहीं था। खैर अब पूरे दो सप्ताह बाद एक बार फिर से भोपाल का मौसम हसीन सा लगने लगा है। रहने के लिए घर का इंतजाम भी हो गया है। जहां मैं अपने पुराने दोस्त के साथ हूं। डच्यूटी रात की है तो दिक्कत की कोई बात नहीं है। दिन में हमारे दोस्त अपनी गाड़ी से आफिस छोड़ देते थे। बस से १क् मिनट में आफिस और फिर खाना-पीना कर रात के नौ बजे से लेकर सुबह के सात बजे तक न्यूज के साथ खेलना। सुबह टहलते हुए सबसे पहले पोहा और चाय का नाश्ता फिर बस पकड़ कर घर की ओर वापसी। जब पूरा देश सोता है तो मेरे जैसे हजारों लोग जागते हैं और जब लोग जागते हैं तो हमारे जैसे लोगों की रात होती है। यही है जिदंगी मेरे भाई।

खैर अभी तो ठंड का मजा ले रहा हूं जनाब। दो दिनों में ठंड बढ़ी है और इसी के साथ मौसम भी दमदार हो गया है। शुरू से ही ठंड का मौसम मेरे लिए सबसे प्रिय मौसम रहा है। और जब बात भोपाल की ठंड की हो तो ये सोने पर सुहागा जैसा है। भोपाल की बात की जाए तो आप झीलों की बात न करें? यह कैसे हो सकता है? कल्प…

पत्रकारिता विभाग की भटकती यादें

चार महीने इंदौर में रिपरेटिंग करने के बाद अब मैं फिर से झीलों की नगरी भोपाल में आ चुका है। नई जिम्मेदारियों के साथ नई चुनौतियां भी हैं। जो कि मेरे जैसे लोगों के लिए बहुत जरूरी है। क्योंकि यदि हमारे जैसे लोगों को नया काम, नई चुनौती नहीं दी जाए तो हमारे अंदर कुछ दम तोड़ने लगता है। सात महीने में दो ट्रांसफर के बाद भोपाल आकर अच्छा तो लग रहा है लेकिन यहां की गलियों में भटकते हुए वे पुरानी यादें भटकती आत्मा की तरह मेरा पीछा कर रही हैं। वे मुझे दबोचना चाह रही हैं और मैं बच रहा हूं। यहां के माखन लाल विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में बिताते दो साल मेरे लिए किसी जन्नत के अनुभव से कम नहीं थे। मस्ती की पाठशाला था यह विभाग। समय बदला तो बदल गया विश्वविद्यालय का भवन और बदल गए यहां के स्टूडेंट्स। लेकिन मेरे लिए आज भी कुछ नहीं बदला है। आज भी मैं पूरे अधिकार के साथ नए भवन में जाता हूं और पूरी गर्मजोशी के साथ नए ख्वाब लेकर आए लोगों से मिलता हूं। अच्छा लगता उन लोगों से मिलकर जिनकी आंखों में ख्वाब होता है। कुछ पाने, करने की ललक होती है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि पत्रकारिता विभाग में जो न…