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Showing posts from November, 2008

सपनों को तोड़ने के लिए

कई दिनों बाद कुछ लिखने बैठ रहा हूं। दोस्तों ने कहा कि तेरे मुंबई को फिर से निषाना बनाया गया हूं, कुछ तो लिख। सबसे पहले मैं यह बता दूं कि आंतकवादियों ने नरीमन प्वाइंट के जिस होटल को निषाना बनाया है, उसके आसपास और उससे मेरी जिंदगी में बहुत अहम स्िाान है। खासतौर पर मेरे जैसे हजारों ऐसे लोगों को जिन्हें मुंबई पनाह देता है। घर परिवार से दूर, ऑफिस को तनाव को कम करने के लिए नरीमन प्वाइंट सबसे अहम स्थान है। नरीमन प्वाइंट से मेरी पहली मुलाकात हिंदी फिल्मों से हुई थी। मुंबई जाने से पहले ही मैने तय कर लिया था कि सबसे पहले इसी स्थान पर जाना है। और मैं गया भी। इस जगह से मेरी जो पहली याद जुड़ी है, वह यह है कि तीन साल पहले दीवाली की बात है। घर जा नहीं पाया था। बस फिर क्या था रात के दो तीन बजे तक यहीं आकाष और सागर को देखकर घर की याद से लड़ता रहा। कल जब मुंबई ब्लास्ट के फुटेज देखा तो अचानक मुंबई के उन सभी स्थानों पर बिताए एक एक पल याद आ गए, जहां विस्फोट हुआ था। यह विस्फोट मुंबई या हिंदुस्तान को तबाह करने के लिए नहीं बल्कि मेरे जैसे आम आदमी के सपनों को तोड़ने के लिए किया गया। आम आदमी सपने देखता था, देख रह…

भोपाल टू जयपुर वाया मुंबई

अक्सर मैं सोचता हूं कि कुछ वक्त निकाल कर कुछ न कुछ लिखा जाए अखबार के अलावा। कई दिनों बाद आज मौका मिल ही गया है। आज पुरानी कहानी को फिर से नए अंदाज में लिखने को दिल कह रहा है। कुछ इस कहानी से बुरी तरह पक जाएंगे तो कुछ कहेंगे आषीष भाई बहुत हुआ। अब तो बंद करो। सभी को बस यही कहना चाहूंगा कि दिल है कि मानता नहीं। खैर अधिक नहीं झेलाते हुए शुरूआत करता हूं। यह कहानी भोपाल में शुरू हुई और शायद जयपुर जाकर खत्म हो चुकी है। शायद। कहते हैं कि प्यार में बड़ी ताकत होती है। सच्चा प्यार आपको जीना सिखाता है और एक तरफा प्यार आपको बर्बाद कर देता है। खैर मुझे नहीं पता कि मैं बर्बाद हुआ या आबाद। मुझे आज भी उसके होंठो का वो तिल बार बार परेषान करता है जो उसके मुस्कुराने के साथ दिखता था। कई साल बीत गए और मैं उसकी मुस्कुराहट को तरस गया हूं। भोपाल से मुंबई हम साथ गए थे। लेकिन मुंबई से हम दोनों का रास्ता अलग हो चुका था। उसने राजस्थान की राजधानी में एक अखबार को ज्वाइन कर लिया था। और मैं भी मुंबई की नौकरी छोड़कर भोपाल का वापस रूख कर लिया था। जितने दिन भी हम साथ थे, वे कम से कम मेरे जीवन के सबसे अच्छे दिनों में से …

कुछ खूबसूरत लम्हें

मुंबई लोकल एक प्रेम कथा

यदि आप सोच रहे हैं कि मैं आज कुछ बहुत अधिक लिखने जा लिखने जा रहा हूं तो पूरी तरह गलत हैं। जी हां पूरी तरह गलत। चलिए अब बिना अधिक पकाए हुए कहानी की शुरूआत करता हूं। आप इसे कहानी मान भी सकते हैं और नहीं भी। वह शाम भी अन्य शामों की तरह एक सामान्य शाम थी। लेकिन मुंबई की शाम होने के नाते इसमें थोड़ी सी गरमाहट थी। वो अंधेरी रेलवे स्टेषन के प्लेटफार्म नंबर 4 पर खड़ा बैचेनी से विरार की ओर जाने वाली तेज लोकल का इंतजार कर रहा था। रह रहकर उसकी आंखे महिलाओं के फस्र्ट क्लास डिब्बे के सामने वाली भीड़ पर जा कर जम जा रही थी। वह उसका इंतजार कर रहा था। उसे आप कोई भी नाम दे सकते हैं। इससे न मुझे कोई फर्क पड़ने वाला है और न ही इस कहानी को।

अचानक उसकी नजर उस लड़की से मिली और इतने में जोरदार हार्न बजाते हुए 12 डिब्बे वाली लोकल भी आ चुकी थी। उसे घर पहुंचने की जल्दी थी और मुझे भी। मेरा घर उसके स्टेषन से चार स्टेषन आगे था। वह मीरा रोड में रहती थी। उसने किसी तरह अपने बैग को संभालते हुए लोकल में चढ़ने वाली भीड़ का एक हिस्सा बन चुकी थी और मैं भी। लोकल अपनी पूरी गति से भागी जा रही थी। मेरे और उसके डिब्बे को एक जाली जोड़ती…