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Showing posts from November, 2007

यदि आप मुम्बई में रहते हैं तो जरुर पधारें..

राजनीति में युवाओं का महत्व विषय पर यदि आप प्रधानमंत्री की राष्ट्रीय सलाह समिति के सदस्य और लोक सत्ता मूवमेंट के सदस्य डॉ जयप्रकाश नरायण को सुनना चाहते हैं तो सोमवार यानि तीन दिसम्बर को सुबह १०.४५ बजे मुम्बई यूनिवर्सिटी के कलीना कैम्पस के मराठी भाषा एवं साहित्य भवन में जरुर पधारें..


Dr Jayaprakash Narayan Ex IAS, till recently member of National advisory Council to the Prime Minister and the five-member second Administrative Reforms Commission . Leader of Lok Satta Movement, a leading civil society movement for political and governance reforms. Recently Lok Satta Movement has launched Lok Satta Political Party in Andhra Pradesh with the aim of bringing in a new political culture.


Speaks on

"Importance of Youth in Politics"

3rd, December 2007
Day: Monday
Time: 10:45 AM
Venue: Marathi Bhasha & Sahitya Bhavan, Kalina Campus, Mumbai University.
Presided by: Dr. Vijay Khole – Vice Chancellor, Mumbai University

एक अधूरी प्रेम कथा

शहर का पुराना चौक आज कुछ ज्यादा ही व्यस्त था। शहर की सभी मोटर गाडियाँ दिन में एक बार इधर से जरुर गुजरती थीं. आज भी गुजर रही थीं. पास में ही टाउन हाल का खाली भवन, जहाँ कभी कभी कोई भटकता हुआ राहगीर आ जाता है. इसी भवन में वो दोनों कुछ ऐसे फैसले ले रहे थे जो कि उनकी ज़िंदगी के साथ कई और लोगों का जीवन बदलने वाला था.

'मुझे नहीं पता कि मैं जो बोलने जा रहा हूँ उसके बाद तुम्हारा क्या रि-एक्शन होने वाला है। लेकिन यदि मैंने और कुछ दिनों यह बात अपने दिल में दबाई तो शायद मैं इसका बोझ सह नहीं सकूं. मैं जीना चाहता हूँ. एक भरपूर ज़िंदगी चाहता हूँ. मुझे पता कि मेरी बात सुनने के बाद या तो तुम यहाँ से उठकर चल दोगी या फिर मुझे कभी माफ़ नहीं करोगी. लेकिन मेरे लिए तुम्हारी खुशी के संग अपनी खुशी भी चाहिए.'

'अब तुम बोलोगे क्या हुआ है तुम्हे?'
' कुछ नहीं'
'फिर मुझे यहाँ क्यों बुलाया है? अब जल्दी बोल दो'
'तुम नाराज़ तो नहीं होगी?'
' अरे नहीं महाराज जी' उसने हँसते हुए कहा।
' मैं तुमसे प्यार करता हूँ और तुम्हारे बिना नहीं रह सकता हूँ'

उसे कुछ नहीं कहा। अब दोनों खामोश …

एक तरफा प्यार और नायक की मौत

अन्य कहानियो की तरह इसमें भी एक प्रेमी है और एक प्रेमिका है। कहानी की शुरुआत यह है कि एक लड़के को एक लड़की से प्यार हो जाता है. एक तरफा प्यार...दोनों एक ही कालेज में एक साथ पांच सालों का सफर तय करते हैं. लेकिन कभी भी लड़के ने लड़की से कहा कि वो लड़की से कितना प्यार करता है. दोनों में गहरी दोस्ती थी. जैसे दो जिस्म एक जान हों.

दोनो ही छोटे छोटे कस्बे से आए थे। दोनों के अपने अपने सपने थे. और दोनों किसी भी किम्मत पर अपने अपने सपने को पाने में लगे हुए थे. उस लड़की के प्यार में पड़कर वो लड़का पहले अपने सच्चे दोस्तों को खोता है और फिर अपने कैरियर को भी दांव पर लगा देता है. वो उस लड़की का कहा कभी भी नहीं टालता था. घर के काम से लेकर नोट बनाने तक के मामले में वो एक ही पाँव पर खड़ा दिखता था. कहते हैं ना प्यार अँधा होता है. यहाँ सिर्फ अँधा ही नहीं बहरा और लंगडा दोनों ही था.

देखते देखते कई साल बीत गए। धीरे धीरे उस लड़की ने लड़के से मिलना छोड़ दिया और एक दिन लड़के के घर पर शादी का कार्ड आया. यह उसी लड़की की शादी का कार्ड था. उसकी आँखों में अब गंगा जमुना बह रही थी. उसने तुरंत उस लड़की को फोन किया॥

और बस इतन…

युवा पत्रकार नीरज जी के परिजनों की मदद की मुहिम

दोस्तों हमारी जमात के एक साथी नीरज जी हमें छोड़कर चले गएँ हैं। उनका अचानक यूं चला जाना पत्रकारिता जगत के लिये एक भारी सदमा हैं। भड़ास में अंकित जी ने बताया कि सहारनपुर में कार्यरत IBN -7 के युवा पत्रकार नीरज चौधरी का देर रात एक सड़क दुर्घटना में देहावसान हो गया। नीरज सहारनपुर की पत्रकारिता में अपने अच्छे स्वभाव एव उत्कृष्ट काम के लिये जाने जाते थे। नीरज अपने परिवार में अपनी धर्म पत्नी एवं चार वर्षीय पुत्र पीछे छोड़ गये हैं।

एक सामाजिक प्राणी होने के नाते हम सब अपने अपने स्तर पर नीरज जी के परिवार की कुछ न कुछ मदद कर सकते हैं. यदि आप कुछ मदद करना चाहे तो यशवंत जी से 99993-30099 पर या मुझसे 98675-75176 पर बात कर सकते हैं. नीरज जी के परिजनों से बात करने के बाद आपको उनका एकाउंट नंबर बता दिया जाएगा, जिसमें आप रकम ट्रांसफर कर देंगे. अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें.हम उम्मीद करते हैं कि आप अपने स्तर पर जरुर कुछ न कुछ मदद कर सकते हैं.

आशीष महर्षि, मुंबई यशवंत सिंह, नई दिल्ली

अब तक मदद करने वालों में ये लोग प्रमुख हैं।

यशवंत सिंह, अजय ब्रह्मात्मज, मुंबई, अंकित माथुर, नई दिल्ली, रियाज हाशमी, सहारन…

रेगिस्तान और वो : बंजर जमीं इंतजार की- भाग चार

हवा हल्की सी सर्द हो चुकी थी और इसी के साथ इस शहर का मौसम और मिजाज दोनों बदलने लगा था. लेकिन आज से करीब बारह साल पहले इस शहर का मिजाज थोड़ा अलग सा था. जब इस शहर की हवाओं में दोनों के प्यार की खुशबू हुआ करती थी.

लेकिन आज नहीं हैं, परुनिशा की जिंदगी में अब अमित की जगह शुभ आ चुका है..या कहें की शुरू से ही शुभ रहा है उसके मन में.

खैर लोगों आते और जातें हैं..जिंदगी कभी नहीं थमती हैं...इसीलिए इसे जिंदगी कहते हैं..

शहर में पिछले दिनों एक नया काफ़ी हाऊस खुला था. लेकिन आज यहाँ कुछ अजीब सा कुछ था..जैसे जैसे शाम ढल रही थी वैसे वैसे इस काफ़ी हाउस में भीड़ जुटना शुरू हो जाती थी. लेकिन आज सप्ताह का अन्तिम दिन होने के कारण यहाँ भीड़ कुछ ज्यादा ही है.

शहर का यह इकलोता काफी हाउस है....

''क्या मुझे एक गरमा गर्म काफी मिलेगी'' यह आवाज उसकी की जो अभी अभी भीगते भीगते अन्दर आई है
''बिल्कुल'' इस बार काफी हाउस के वेटर ने कहा.

वो काफी पीते पीते कोने में बैठी उस महिला को निहारती रही जो कि यहाँ की मालकिन हैं. वो उसकी आंखों में कुछ खोजना चाह रही थी.अचानक कोने में बैठी उस महिला की नजर उस युव…

कई सालों बाद उगता सूरज देखा

कई सालों बाद उगता सूरज देखा
और देखी उसकी लालिमा
देखा एक नया जीवन
फिर भी अधूरा है जीवन

सूरज तो रोज उगता होगा
मैं नहीं देख पता होऊंगा
लेकिन भला हो उसका
जिसने मुझे ज़िंदगी की सच्चाई से कराया रूबरू

जीवन चलता तो है पर ज़िंदगी नहीं
वो जब साथ होता है तो जिंदगी होती है
लेकिन उससे दूर जाने पर जीवन,
जिंदगी में उल्लास होता है
जीवन में एक सन्नाटा

फिर भी एक आस हैं
क्योंकि अभी भी साँस है

NTDV लाएगा हिन्दी में न्यूज़ पोर्टल

युवा पत्रकारों के लिए एक और शानदार ख़बर. ख़बर है कि एनडीटीवी जल्दी ही अपना एक हिन्दी न्यूज़ पोर्टल लाँच करने वाला है. दुनिया भर में इंटरनेट के बढ़ते उपयोग को देखते हुए यह फ़ैसला लिया है. एनडीटीवी इस पोर्टल से पहले एक मोबाइल पोर्टल लाँच करेगी जिसका नाम एनडीटीवी एक्टिव होगा. कहा जा रहा है कि मध्य नवम्बर से यह चालू हो सकता है. जबकि हिन्दी न्यूज़ पोर्टल जिसका नाम एनडीटीवी ख़बर होगा, यह दो महीने बाद यानी अगले साल तक लाँच हो जाएगा. एनडीटीवी इसके अलावा लाइफ स्टाइल, बालीवुड और शिक्षा को लेकर भी कुछ वेब पोर्टल लाने पर कार्य कर रहा है.

फिर भी कुछ लोग मचा रहे हैं शोर

चारों ओर हैं दीपावली का जोर
फिर भी कुछ लोग मचा रहे हैं शोर
कोई भूखा है तो कोई नंगा
लेकिन हमें क्या
क्यूंकि हम सभ्य है और वो असभ्य
ऐसा ही तो हम कहते हैं

लोग कह रहे हैं दीये जलाओं
मन का अंधकार मिटाओ
अन्दर ही अन्दर लोगों को दूर भगाओ

शहर में चमक रहे हैं माल और दुकानदार
गाँव में फिर भी हैं राशन की लम्बी कतार
होते है जहाँ रोज दंगे
नेता जी हैं नंगे

आम आदमी हैं पस्त
नेता जी हैं मस्त

बस्ती में पानी नहीं
आंखों का पानी भी गायब है
दोस्ती के नाम पर दगा देते हैं
फिर अपने को दोस्त कहते हैं

फिर भी बोलो शुभ दीवाली

कुछ लिखा ही लेकिन क्या ?

कुछ दिनों से लगातार मन में एक अजीब सी उलझन चल रही थी....मुम्बई की इस भागदौड़ में समय निकल कर कुछ किताबे पढ़ा. इसमे हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा का पहला भाग क्या भूलूं क्या याद करूँ और कुछ कविताओं की छोटी छोटी कितबिया थी. इन सब को पढने के बाद एक कहानी लिखने का असफल प्रयास किया. लेकिन कहानी पूरी नहीं हो पाई. फिर कल रात में मैं एक कविता लिखा लेकिन शायद इसे कविता नहीं कहा जा सकता है. फिर भी कुछ लिखा है और उम्मीद करता हूँ कि आप सभी लोगों के मार्गदर्शन में बेहतर लिख सकता हूँ मैं....बस आप अपनी बहुमूल्य राय से अवगत कराते रहिये.. मेरी कहानी पढ़ने के लिए यहाँऔर कविता के लिया यहाँ क्लिक कीजिये.

रेगिस्तान और वो : बंजर जमीं इंतजार की- भाग तीन

हवा में एक अजीब सी खामोशी थी। उमस भरे इस माहौल में काफी देर तक दोनों बैठे रहे। उसी वक्‍त अचानक जोर जोर से आंधिया चलने लगी। उमस भरा वातावरण अब आंधियों और तुफान में बदल चुका था। हर तरफ हाहाकार मच गया। मचना भी था। आखिर क्‍यों नहीं मचता ? इस बार भी आखिर वही हुआ जो कि इस देश में और पूरी दुनिया में हजारों सालों से होता आ रहा है। एक बार फिर धर्म के नाम पर एक को मार डाला गया। और सिर्फ धर्म के नाम पर नहीं बल्कि प्रेम के नाम पर। आसमान में काले बादल और बस आंधी ही आ‍ंधी। जल्‍दी ही सब कुछ पहले की तरह हो गया।

इस बात को करीब बाईस साल होने को आए। यह बताते बताते अमित की आंखें गिली हो रही थी। उसमें इतना साहस नहीं बचा था कि आगे की कहानी या कहें या घटना को अपनी उन्‍नीस वर्षीय बेटी को बता सके। लेकिन बताना भी जरुरी थी। हां बताना भी जरुरी थी। आखिर उसकी बेटी को यह हक है कि उसका नाम क्‍यूं परुनिशा रखा गया। हिन्‍दू होते हुए मुस्लिम नाम?

काफी रात हो चुकी है। परुनिशा को सुबह जल्‍दी कालेज भी जाना होता। ऐसे में अमित और आगे की कहानी आज उसे नहीं सुना सकता था। दोनों अपने कमरों में चले जाते हैं।
गुड नाइट पापा। यह परुनिशा…

रेगिस्तान और वो : बंजर जमीं इंतजार की- भाग दो

शहर में एक तरफ़ उनकी मोहब्बत परवान चढ़ रही थी तो शहर के दूसरे कोने में जावेद की हत्या हो चुकी थी। जावेद और अमित में ज्यादा अन्तर नहीं था सिर्फ़ धर्मं को छोड़कर. नाम से ही जाहिर हैं वो मुसलमान था. हाँ मुसलमान. तभी तो उसे मार दिया गया जबकि अमित आज भी जिंदा है॥ जबकि दोनों ने एक ही गुनाह किया था. वो था प्यार करने का. वही प्यार जिसे मुसलमानों कुरान शरीफ से लेकर हिन्दुओ के ग्रंथों तक में सबसे ऊपर माना गया था.

जावेद के हत्यारों को पोलिस खोज रही थी जबकि पूरा शहर जानता था कि इस हत्या के पीछे कौन लोग शामिल हैं।

शहर के कम्पनी बाग़ में आज काफी शान्ति नहीं...अजीब सी खामोशी थी। इस खामोशी को परुनिशा की आवाज़ तोड़ती है..

मैं जान सकती हूँ अमित...आखिर तुम्हे हुआ क्या है ?
कुछ नहीं........

फिर भी कुछ तो हुआ है
नहीं...मैं सही हूँ.....
यह आवाज अमित की थी।

अमित ने आज से कुछ महीने पहले ऐसा ही एक सवाल परुनिशा से भी पूछा था लेकिन जवाब आज तक नहीं मिला।

तुम्हे पता है कि शहर में क्या चल रहा है।
क्या चल रहा है..?

कल किसी ने एक मुसलमान लड़के को मार कर फेंक दिया है। अमित ने जवाब दिया।
लेकिन क्यों ?
क्योंकि उसने एक लड़की से प्रेम…