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Showing posts from March, 2007

मुंबई और मेरे एक साल

मुंबई में आए एक साल होने को है। इस शहर ने मुझे बहुत कुछ दिए हैं। जिसमें पेट भरने के लिए एक अदद नौकरी, अच्‍छे दोस्‍त और एक पहचान। कुछ लोगों से गिले शिकवे मिटे तो कुछ लोगों से दूरियां। लेकिन इन सबके बावजूद मैं खुश हूं इस शहर से। थोड़ा तन्‍हां हूं लेकिन इस तंहाई को अपनी ताकत बनाने को प्रयास कर रहा हूं जो कि जारी है। मेरी एक दोस्‍त इन दिनों स्विजलैंड मे है। उससे जब मैनें अपनी तंहाई की बातें बताई तो उसका यही कहना कि अपनी तंहाई को अपनी ताकत बना। बात दिल को जम गई और कर लिया तय कि इस तंहाई को अपनी ताकत बनाई जाए। कालेज के कुछ दोस्‍त यहां पर भी है और कुद दिल्‍ली और बिलासपुर में। याद आती है इन सबकी। कालेज के बाद सीधे नौकरी के मैदान में कूद पड़ा हूं। कालेज में बिताई गए एक एक दिन और एक एक चीजें आज भी मेरे जेहन में बसी हुईं हैं। लेकिन मुंबई की भीड़ और व्‍यस्‍त लाइफ में भी उन यादों को नहीं भूला पाया हूं और भूलाना भी नहीं चाहता हूं। जब भी याद आती है तो फोन पर बात कर ली या फिर पुराने एलबम देख लेता हूं। मुंबई में लाखों लोग अपने सपनों को साकार करने के लिए आते हैं। कुछ इस भीड़ में खो जाते हैं तो कुछ नई प…

हम क्‍यूं नहीं अपनी खामोशी को कोई नाम दें

क्‍या आपने कभी उस खामोशी को महसूस किया है जो आपके आसपास अपनों की है। उनकी खामोशी जो बोलना चाहती है लेकिन वो अपनी खामोशी कोई शब्‍द देना नहीं चाहते हैं। इसके क्‍या कारण होते हैं मैं नहीं जानता हूं। लेकिन फिर भी मैं कुछ कहने की कोशिश करुंगा जो कि मेरे दिल में है। शायद वो खामोश इस लिए रहते हैं ताकि दूसरों की भावना को ठेस नहीं पहुंचे या फिर आने वाले तूफान को मोडना चाहते हैं वो लोग जो खामोश रहत हैं। लेकिन मुझे डर लगता है इन खामोशियों से। आखिर हम क्‍यूं चुप रहें। क्‍यूं अपनी बातों को हम कोई शब्‍द नहीं देना चाहते हैं। माना कि आपकी खामोशी से किसी को बुरा लग सकता है। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं हम चुप रहें। हम अपने दोस्‍तों के साथ क्‍यों खामोश रहते हैं। इस खामोशी को सबसे अधिक औरतों में देखा जा सकता है। पुरुष स्‍वभाव से आजाद और असभ्‍य होता है।जो दिल में आया कहा दिया। वह यह भी नहीं सोचता है कि इस शब्‍दों को दूसरों पर क्‍या असर पड़ेगा। लेकिन इस मामले में औरतें सभ्‍य और शालीन होती है। क्‍यूं होती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण उनके आसपास का वातारवरण और सामाजिक परिवेश को जिम्‍मेदार ठहराया जा सकता है। जहां…

'आरक्षण की व्यवस्था एक सफल प्रयोग है'

योगेंद्र यादव
समाजाशास्त्री

जो लोग आरक्षण को ख़ारिज करते हैं, वो तो हमेशा से सामाजिक न्याय के सवाल को भी ख़ारिज करते रहे हैं. ये वो लोग हैं जो कि हिंदुस्तान के मध्यम वर्ग को अन्य वर्गों के लिए कुछ भी छोड़ना पड़े, इस स्थिति के लिए तैयार नहीं हैं.
ये वे लोग हैं जिन्होंने न तो हमारा समाज देखा है और न ही अवसरों की ग़ैर-बराबरी को समझने की कोशिश की है. ध्यान रहे कि किसी भी समाज में भिन्नताओं को स्वीकार करना उस समाज की एकता को बढ़ावा देता है न कि विघटन करता है.
मिसाल के तौर पर अमरीकी समाज ने जबतक अश्वेत और श्वेत के सवाल को स्वीकार नहीं किया, तबतक वहाँ विद्रोह की स्थिति थी और जब इसे सरकारी तौर पर स्वीकार कर लिया गया, तब से स्थितियाँ बहुत सुधर गई हैं.
हाँ, अगर आप भिन्नताओं की ओर से आँख मूँदना समाज को तोड़ने का एक तयशुदा फ़ार्मूला है.
अगर पिछले 50 साल के अनुभव पर एक मोटी बात कहनी हो तो मैं एक बात ज़रूर कहूँगा कि आरक्षण की व्यवस्था एक बहुत ही सफल प्रयोग रहा है, समाज के हाशियाग्रस्त लोगों को समाज में एक स्थिति पर लाने का.
सफल कैसे, इसे समझने के लिए इसके उद्देश्य को समझना बहुत ज़रूरी है.
आरक्षण का उद्देश्…

डर, उलझन और भगवान का आसरा

समय बदल रहा है और इसी के साथ युवा पीढी की सोच भी। दुनिया भर के मंदिरों और नौजवानों की तो मैं नहीं जानता हूं लेकिन मैं अपने आसपास से जरुर रुबरु होता रहता हूं। ऐसा ही कुछ पिछले दिनों हुआ। इसी मंगलवार को मुंबई के सिद्वीविनायक मंदिर में जाना हूं। मंदिर में नौजवानों की संख्‍या देकर किसी की कही वो लाईन यादें आ गई जब किसी ने मुझसे कहा था कि आज की पीढ़ी एकदम नास्तिक हो गई है।

इस मंदिर में मुझे ऐसा देखने को नहीं मिला। हर शनिवार की रात तेज संगीत में झूमने वाले कई युवक युवतियां इस मंदिर में देखने को मिल जाएंगे। जब मंदिरों में नौजवानों की बढ़ती संख्‍या को लेकर मैने अपने एक साथी से चर्चा की तो उनकी बात सुनकर मेरे मन में चल रही जेहाद को पूर्णविराम मिला। लेकिन अभी भी मैं थोड़ा उलझन में हूं। देश और समाज जैसे जैसे तरक्‍की कर रहा है वैसे वैसे लोगों के मन में एक अंजाना सा डर या कहें कि उलझन बढ़ती जा रही है। चूंकि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्‍सा हमारे जैसे नौजवानों का है तो मंदिरों में संख्‍या भी इन्‍हीं की अधिक होगी। हम भले ही अंकल सैम के कदमों पर चलने का प्रयास करें लेकिन इसके बावजूद हम घर से निकलने से …

अपने हुए बेगाने

मुंबई की भागमभाग जिंदगी से तंग आकर मध्‍यप्रदेश के गांवों में कुछ दिन शांति के लिए बिताने गया तो वहां भी शांति नहीं मिल पाई। अजी साहेब शां‍ति मिलती भी कैसे। जब हमारे प्‍यारे प्रधानमंत्री और वित्‍तमंत्री जी चैन की सांस नहीं ले पा रहे हैं तो मेरे जैसे खबरनवीस की क्‍या हैसियत। नाक में दमकर दिया है इस निकम्‍मे गेहूं ने। मप्र के खेतों में इन दिनों गेहूं और चना मिलकर यूपीए सरकार को राहत पहुंचाने की योजना बना रहे हैं। लेकिन डर बस इस बात का है कि यदि विपक्षी पाटियों को गेहूं व चना की योजना का कहीं पता चल गया तो गुड़ गोबर न कर दे। हुआ यूं कि गेहूं और चना देश की महंगाई कम करने में लगे हुए हैं। जबकि, विपक्ष को डर इस बात था कि यद‍ि महंगाई कम हुआ तो उप्र के चुनाव में क्‍या मुद्वा उठाएगें। इस बार इन दोनों फसलों ने मिलकर रिकार्ड उत्‍पादन का मन बना लिया। गेहूं जहां 720 लाख टन के नीचे समझौता करने को तैयार नहीं है वहीं, ससुरा चना भी 68 लाख टन की बात कर रहा है। अब इतना उत्‍पादन होगा तो बेचारी विपक्ष क्‍या करेगी। लेकिन ये गेहूं और चना इस बात को समझ ही नहीं रहें हैं। देश में जब महंगाई का दानव फैल रहा था तो…