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Showing posts from 2009

तेरे जाने के बाद ...

तेरे जाने के बाद
कई रोज़ तक
बहते रहे थे
मेरे आंसू
और कविता
फिर एक दिन
मैं रोया
लेकिन आंसू नहीं आये
और आज
कविता भी
कागज़ पर नहीं उतरी

- हिमांशु बाजपेयी

रणवीर, डीनर और मैं

तू जब से गया है मुझे छोड़कर

तू जब से गया है मुझे छोड़कर
मैं ऐसा तन्हा हुआ
कि अब तो लगता है जीना भी क्या जीना है
लेकिन फिर भी जीना होगा
वादा जो तुझसे किया है, निभाना होगा
मौत को आगोश में लेकर तुझे भूलना चाहता हूं
पर कम्बख्त मौत भी बेवफा निकली
जिंदगी ने थामा दामन
पर मौत भी दरवाजे पर खड़ी है
अब फैसला तुझे करना है
मौत और जिंदगी के दरम्यिान

कुछ वक्त पहले मैं ऐसा नहीं था

कुछ वक्त पहले मैं ऐसा नहीं था
आज भी मैं वैसा नहीं हूं

मै कैसा हूं, क्यूं हूं, मुझे खुद भी नहीं पता
मै कौन हूं और क्यों हूं

तुम्हे तो पता था लेकिन तुमने बताया क्यों नहीं ?
अच्छा हुआ नहीं बताया
यदि तुम बताती तो शायद मुझे तकलीफ होती

लेकिन क्यों नहीं बताया?
यदि बता देती तो शायद मै ऐसा नहीं होता
जैसा मैं हूं, फिर भी मैं हूं

भाई साहब उसकी शादी हो गई

भाई साहब जिंदगी में कुछ भी आसानी नहीं मिलता।
पता है, तो इसमें बताने की क्या बात है?
नहीं, मुझे लगा आपको पता नहीं होगा।
क्यों अपने आपको बहुत होशियार समझते हो?
अरे भाई साहब आप तो नाराज हो गए।
अरे यार नाराज होने की बात ही है। खैर कैसे आना हुआ?
कुछ नहीं, बस इधर से गुजर रहा था तो कदम आपके घर की ओर मुड़ गए। अच्छा आपको कुछ पता चला?
क्या..
आपको नहीं पता?
अरे नहीं यार..क्या हुआ?
भाई साहब पाखी की शादी हो गई।
क्या.....कब ?

इसमें बाद कमरे में काफी देर तक शांति हो गई। जैसे घर में मातम हो और किसी की मौत हो गई है। जवाब आज तक नहीं मिला।

राजमाता गायत्री देवी से वह पहली और अंतिम मुलाकात

पिछले कुछ समय से देश-विदेश की मीडिया में जयपुर की पूर्व राजमाता सुर्खियों में बनी हुई हैं। उनकी खासियत कम उनसे जुड़े विवादों को लेकर वे अधिक चर्चा में हैं। अब सबकी नजर उनकी एक हजार करोड़ रूपए की वसीयत पर है। फिलहाल यह वसीयत किस किस को मिलेगी, कहना आसान नहीं है। लेकिन आज बात उनकी वसीयत की नहीं।

वो भले ही लोगों के लिए पूर्व राजमाता रही हों लेकिन मुझ जैसे लोगों के लिए वो हमेशा न सिर्फ जयपुर की राजमाता रहीं, बल्कि कहीं न कहीं वो मुझे खुद की राजमाता लगती थीं। जयपुर में जिन लोगों ने कुछ साल भी गुजारे हैं, वे इस बात को अच्छी तरह समझ सकते हैं। गायत्री देवी और जयपुर को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है। राजमाता से मेरी पहली और आखिरी मुलाकात आज से करीब छह साल पहले हुई थी। उस वक्त मैं बीकॉम फाइनल की पढ़ाई खत्म कर जयपुर के एक स्थानीय अखबार के लिए काम करता था। उसी वक्त जयपुर के फेमस होटल रामबाग पैलेस में एक कार्यक्रम के दौरान राजमाता से मुलाकात हुई। अब तक उनके बारे में सिर्फ पढ़ा और सुना ही था। लेकिन जैसे ही उन्हें मैने गलियारे से आते देखा तो मेरी आंखें खुली की खुली रह गईं। यह किसी ख्वाब के सच ह…

क्या करूँ आती है अब अक्सर तुम्हारी याद

कभी खुशबु सी आती है
तो महक उठतीं हैं यादें
छाजाती है सुनहरी सी

वो एक अक्स उभरता है
ये दिल मशरूफ रहता है उस लम्हे मैं

अभी है वो पास
जैसे कह रहा है कुछ ख़ास
जो कभी कहा था उसने

बस एक एहसास ही है बाकी
जो हर रोज रहता है

है चेहरे पर मेरे ख़ुशी
वही जो तब तुम्हारे चेहरे पर भी थी

है हर वो पल भी इस लम्हे
जो तब जिया था तुम्हारे साथ
क्या करूँ आती है अब अक्सर तुम्हारी याद

ये डीग्री भी लेलो, ये नौकरी भी लेलो,

ये डीग्री भी लेलो, ये नौकरी भी लेलो,
भले छीन लो मुझसे USA का विसा
मगर मुझको लौटा दो वो क्वालेज का कन्टीन,
वो चाय का पानी, वो तीखा समोसा..........

कडी धूप मे अपने घर से निकलना,
वो प्रोजेक्ट की खातीर शहर भर भटकना,
वो लेक्चर मे दोस्तों की प्रोक्झी लगाना,
वो सर को चीढाना ,वो एरोप्लेन उडाना,
वो सबमीशन की रातों को जागना जगाना,
वो ओरल्स की कहानी, वो प्रक्टीकल का किस्सा.....
बीमारी का कारण दे के टाईम बढाना,

वो दुसरों के Assignments को अपना बनाना,
वो सेमीनार के दिन पैरो का छटपटाना,
वो WorkShop मे दिन रात पसीना बहाना,

वो Exam के दिन का बेचैन माहौल,
पर वो मा का विश्वास - टीचर का भरोसा.....
वो पेडो के नीचे गप्पे लडाना,
वो रातों मे Assignments Sheets बनाना,

वो Exams के आखरी दिन Theater मे जाना,
वो भोले से फ़्रेशर्स को हमेशा सताना,
Without any reason, Common Off पे जाना,

वह सोना चाहता है लेकिन नींद उसकी नीली आंखों से काफी दूर है...

वह लगातार कई दिनों से सोना चाह रहा था। लेकिन नींद थी, जो आने का नाम ही नहीं ले रही थी। उसकी आंखे तो भारी होती पर हो सो नहीं पाता था। हाथ-पांव के नाखून भी बढ़ चुके थे। इससे नहाने की उम्मीद करना रेत में पानी ढूंढने के समान था।फिर भी कुछ लोग उससे उम्मीद करते थे अच्छा बनने की। वह जी रहा था। क्यों जी रहा था, यह न उसे पता था और न उसके आसपास के लोगों को। यह अलग बात थी कि उसके आसपास ऐसा कोई नहीं बचा था जिससे वह अपने दिल की बात कर सके।लेकिन आज से कुछ शताब्दी पहले तक ऐसा नहीं था। बात उस समय की है जब उस शहर में मॉल नहीं आए थे। शॉपिंग साप्ताहिक हॉट में हुआ करती थी। महिलाएं तो सड़क पर ना के बराबर निकलती थीं और सड़कों पर, जहां आज मर्सिडिज और नैनो दौड़ती हैं, वहां सिर्फ ऊंट, हाथी और घोड़े ही थे। शताब्दी बदली तो सबकुछ बदला।
उस जमाने में लोग एक-दूसरे के लिए जीते और मरते थे। आज भी जीते और मरते हैं पर किसके लिए। वह भी किसी के लिए जीना और मरना चाहता था लेकिन यह लंबी दास्तान बन गई। सुना था वह भी किसी के लिए जीती और मरती थी। लेकिन यह क्या अब वह उसके लिए नहीं और किसी के लिए जीने-मरने की बात करने लगी है। शहर …

एक अजन्मी बेटी का मां के नाम पत्र

मेरी प्यारी मां,

मैं खुश हूं और भगवान से प्रार्थना करती हूं कि आप भी सुखी रहें। यह पत्र मैं इसलिए लिख रही हूं क्योंकि मैंने एक सनसनीखेज खबर सुनी है, जिसे सुनकर मैं सिर से पांव तक कांप उठी। स्नेहमयी मां आपको मेरा कन्या होने का पता लग गया है और मुझ मासूम को जन्म लेने से पहले ही कोख में ही मार डालने की साजिश रची जा रही है। यह सुन मुझे यकीन ही नहीं हुआ भला मेरी प्यारी-प्यारी कोमल हृदया मां ऐसा कैसे कर सकती हे? कोख में पल रही अपनी लाडो के सुकुमार शरीर पर नश्तरों का चुभन एक मां कैसे सह सकती है?

पुण्यशीला मां! बस, आप एक बार कह दीजिए-यह जो कुछ मैंने सुना वह झूठ है। दरअसल, यह सब सुनकर मैं दहल सी गई हूं। मेरे तो हाथ ही इतने सुकोमल हैं कि डॉक्टर के क्लीनिक जाते वक्त आपका आंचल भी जोर से नहीं पकड़ सकती ताकि आपको रोक लूं। मेरी बांह भी इतनी मजबूत नहीं है कि आपके गले से लिपट सकूं।

मधुमयी मां! मुझे मारने के लिए आप जो दवा लेना चाहती हैं, वह मेरे नन्हें शरीर को बहुत कष्ट देगी। स्नेहयमी मां! मुझे बहुत दर्द होगा। आप तो देख भी नहीं पाएंगी कि वह दवाइ्र आपके पेट के अंदर मुझे कितनी मुझे कितनी बेरहमी से मार डालेग…

वह पुराने दिनों में लौट चुका था...

अमित के सेल फोन पर रिंग बजती है। अचानक बजे इस फोन ने उसकी नींद को बुरी तरह तोड़ दिया था। बाएं हाथ से उसने फोन उठाया तो दाएं हाथ से लाइट का स्विच खोजना शुरु किया। फोन जयपुर से ही था। इस फोन कॉल ने अमित की आधी रात को तपती दोपहरी में बदल दिया था।

अभी-अभी अमित को पता चला - पाखी की शादी है। बारात राजस्थान के कोटा शहर से आएगी। इस खबर पर वह कैसे रिएक्ट करे ? वह सोच नहीं पा रहा था लेकिन वह बैचेन हो चुका था। उसने आसपास की पूरी दुनिया को तहस नहस कर दिया था। इस दुनिया में वह अकेला बचा था। लेकिन यह सब ख्वाबों में था।

लेकिन सच्चई यही थी कि वह पूरी दुनिया को तबाह करना चाहता था। वह पाखी और अपने पुराने रकीब से पूछना चाहता था कि वह दोनों क्यों अलग हो गए। पाखी अमित को नहीं मिल पाई पर वह इस बात से खुश था कि उसके जीवन में शुभ है। लेकिन आज पाखी और शुभ भी अलग हो चुके थे।

अमित से शुभ को फोन लगाया। घंटी लगातार बज रही थी लेकिन कोई अमित का फोन उठाया नहीं गया।

अमित और अधिक बैचेन हो चुका था। उसने पाखी से बात करनी चाही पर न जाने क्यूं उसने उसे कॉल नहीं किया। घड़ी रात के दो बजा रही थी। इसी के साथ वह पाखी के साथ बिताए …

एक नजर यारा दा ठर्रापना पर

हिंदी में इस वक्त इतने ब्लॉग हो गए हैं कि कुछ समझ में ही नहीं आता है कि कौन से ब्लॉग को पढ़ा जाए और कौन सा छोड़ा जाए। कुछ ऐसे ब्लॉग हैं जिन्हें चौबीस घंटे में एक बार देखना ही पढ़ता है। मजबूरी सी हो गई है। तो कुछ ऐसे ब्लॉग भी हैं जहां कभी कभी नजर पढ़ती है। कुछ ब्लॉग जिन पर कभी कभी जाना होता है, उन्हें पढ़कर यही लगता है कि इनकी गलियों में कभी कभी क्यों जाया जाए। रोज क्यों नहीं?

मसलन एक नजर शब्द योग पर। शब्द योग ब्लॉग पर जहां कुछ अच्छे व्यंग्य हैं तो कुछ दिल को छूती कविता। शब्द योग ब्लॉग के लेखक अनुज खरे भोपाल में रहते हैं और दैनिक भास्कर में कार्यरत्त हैं। इनकी व्यंग्य की शैली कमाल है। यकीन नहीं आता तो एक नजर यारा दा ठर्रापना पर। इसे पढ़ने पर आप बिना कमेंट के रही नहीं सकते हैं। तो देर किस बात की। जरा जल्दी से पढ़कर मुझे बताएं।

उनको प्रणाम!

जो नहीं हो सके पूर्ण-काम
मैं उनको करता हूँ प्रणाम।कुछ कंठित औ' कुछ लक्ष्य-भ्रष्ट
जिनके अभिमंत्रित तीर हुए;
रण की समाप्ति के पहले ही
जो वीर रिक्त तूणीर हुए!
उनको प्रणाम!जो छोटी-सी नैया लेकर
उतरे करने को उदधि-पार,
मन की मन में ही रही, स्वयं
हो गए उसी में निराकार!
उनको प्रणाम!जो उच्च शिखर की ओर बढ़े
रह-रह नव-नव उत्साह भरे,
पर कुछ ने ले ली हिम-समाधि
कुछ असफल ही नीचे उतरे!
उनको प्रणामएकाकी और अकिंचन हो
जो भू-परिक्रमा को निकले,
हो गए पंगु, प्रति-पद जिनके
इतने अदृष्ट के दाव चले!
उनको प्रणामकृत-कृत नहीं जो हो पाए,
प्रत्युत फाँसी पर गए झूल
कुछ ही दिन बीते हैं, फिर भी
यह दुनिया जिनको गई भूल!
उनको प्रणाम!थी उम्र साधना, पर जिनका
जीवन नाटक दु:खांत हुआ,
या जन्म-काल में सिंह लग्न
पर कुसमय ही देहाँत हुआ!
उनको प्रणामदृढ़ व्रत औ' दुर्दम साहस के
जो उदाहरण थे मूर्ति-मंत?
पर निरवधि बंदी जीवन ने
जिनकी धुन का कर दिया अंत!
उनको प्रणाम!जिनकी सेवाएँ अतुलनीय
पर विज्ञापन से रहे दूर
प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके
कर दिए मनोरथ चूर-चूर!
उनको प्रणाम!
- बाबा नागर्जुन -

वह फिर उसके साथ होली नहीं मना पाया

उसे अचानक एक भूली बिसरी याद आती है। कई साल पहले जब वह कॉलेज में पढ़ता था तो वहां वह भी साथ ही पढ़ती थी। नजर मिलने के साथ ही वह उसके प्रेम में रंग चुका था। पहली होली पर वह घर चली गई थी जो उत्तर प्रदेश में कहीं था। लेकिन दूसरी होली में वह इसी शहर में थी। स्थिति अब बदल चुकी थी। वह अब उसके साथ होली नहीं खेल सकता था। देखते-देखते वह परायी हो गई थी।

वह किस रिश्ते से उससे होली खेलता। वह अब तक चाहता रहा कि उसे वह रंगे अपने रंग से। शुभ के साथ पाखी होली खेल रही थी। कॉलेज के अन्य साथी भी उससे होली खेल रहे थे। अमित को कुछ हो रहा था। शायद वह अंदर ही अंदर जल रहा था। वह उसके साथ होली खेलना चाहता था। वह सोचता रहा। सबने उसके साथ होली खेली। वह नहीं खेला। संकोच में नहीं खेल पाया।

होली फिर आई और उससे मुलाकात भी हुई। कोई फायदा नहीं था। अमित और वो एक ही ऑफिस में थे। लेकिन होली के ऐन पहले वह घर जा चुकी थी। इस बार भी अमित की अधूरी आस अधूरी रह गई। आज फिर रंगों का त्यौहार है। वह आज भी उसके साथ रंगों का त्यौहार मनाना चाहता है। इस शहर में पानी बचाने के लिए आंदोलन चल रहे हैं। हर कोई सूखी होली की बात कर रहा है। ताकि …

मीडिया - मैसेज - सेक्स

उन दोनों की मुलाकात हुए कुछेक ही महीने हुए थे। लेकिन इन कुछेक महीनों में वे कुछ अधिक करीब आ गए थे। लड़की यूनिवर्सिटी में पढ़ती थी तो लड़का वहां ग्रेड टू का कर्मचारी था। उसकी डच्यूटी यूनिवर्सिटी की लायब्रेरी में थी। जहां वह अक्सर किताबों के बहाने उसे देखने के लिए आती रहती थी। लायब्रेरी की रैक से किताबें निकलती थीं। पन्ने पलटे जाए जाते थे। लेकिन नजरे सामने बैठे उस ग्रेेड टू के कर्मचारी पर होती थी। वह कर्मचारी भी उसके आने के बाद कुछ अधिक ही सक्रिय हो जाता था। स्टूडेंट्स को लेकर चपरासी पर रौब झाड़ने का कोई मौका वह नहीं छोड़ता था। वे दोनों एक दूसरे की जरूरतों को पूरा कर रहे थे।

बसंत के बाद यूनिवर्सिटी में नया बैच आया। वह अब सीनियर्स बन गई थी। लेकिन वह लड़का अभी सेकेंड ग्रेड का ही कर्मचारी था। नए बैच में कुछ खूबसूरत लड़कियों के साथ कुछ पैसे वाले लड़के तो कुछ गांव से पहली बार निकले लड़के भी आए थे। बंसत के साथ अब सबकुछ बदल गया था। अब सेकेंड ग्रेड का कर्मचारी और उस लड़की में कुछ भी पहले जैसा नहीं था। स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही थी। कल तक जिस लड़की को वह अपनी सेकेंड हैंड स्कूटर पर बैठाकर उसके घ…

वह लगातार रोए जा रही थी..

वो लगातार रोई जा रही थी। विदाई की बेला में वैसे भी रोना लड़की के चरित्र के लिए उसके समाज में अच्छा माना जाता है। पिछली जनवरी में जब उसके पड़ोसी शर्मा जी की बेटी हंसते हुए विदा हुई थी तो कई दिनों तक उसकी हंसी चाची-मौसी के लिए चर्चा का विषय बनी रही थी। लेकिन वह लगातार रो रही थी। उसके रोने में अजीब सा कुछ था। जो केवल वही महसूस कर सकता था जो कि कहीं दूर बैठा उसका इंतजार कर रहा था।

वह कभी अपनी मां से लिपट कर रो रही थी तो कभी अपने छोटे भाई से। बाप के पास भी गई थी रोने के लिए। बाप की आंखों में आंसू के दो बूंद तो जरूर थे। लेकिन वह दहाड़ मार कर रो रही थी। कार का दरवाजा खोला जा चुका था। अपने पति और ननद केसाथ वह अंदर बैठ चुकी थी लेकिन उसका रोना थमने का नाम ही नहीं ले रहा था। वह लगातार रो रही थी।

सुबह के वक्त जब वह अपने पति के लिए चाय बनाने के लिए उठी तो न जाने क्यों मन हुआ कि जाकर अखबार भी ले आया जाए। अखबार से उसका कुछ खास लगाव था। उसका वह भी एक अखबार में ही तो काम करता था। उसके घर आने वाला अखबार भी वही अखबार था जहां उसका प्रेमी काम करता था। अखबार के एक कोने में आज एक छोटी सी खबर थी। उस अखबार के …

क्या एनजीओ वाली लड़कियां बड़ी चालाक होती हैं?

बेटा ये एनजीओ वाली लड़किया बड़ी चालाक होती हैं। जरा बच कर रहना है। यह चेतावनी मुझे पिछले दिनों मिली है। चेतावनी देने वाली हमारी नई मकान मालकिन हैं। भोपाल के शाहपुरा का यह घर है फिलहाल पर है। एंडवास किराया लेने के बाद हमारी मकान मालिक ने जब मुझे चेताते हुए एनजीओ वाली चेतावनी दी थी तो मुझे मुस्कुराना पड़ा। इसकी भी वजह थी। वजह यह थी कि राजस्थान में कई साल जन आंदोलन को देने के साथ मैने एनजीओ को बड़े करीब से देखा है। एनजीओ वाली लड़किया चालाक नहीं बल्कि अपने अधिकारों को लेकर जागरुक रहती हैं। बस यही बात मकान मालिकन को अटक रही है। खैर आशंका है कि कुछ दिनों बाद एनजीओ वाली लड़कियों को मकान छोड़ना पड़ सकता है। क्योंकि वे बहुत चालाक होती हैं।


मसक कली मटक कली

बॉलीवुड में प्रयोग तो आए दिन होते रहते हैं। लेकिन इन दिनों जो प्रयोग हो रहे हैं वे वाकई शानदार हैं। जरा दिल्ली -६ फिल्म को ही देख लिजीए। फिल्म के सभी गाने दिल को छुने वाले हैं। इस फिल्म का अधिकांश हिस्सा जयपुर के पास सांभर कस्बे में फिल्माया गया है। निर्देशक से लेकर पूरी टीम तक ने सांभर को चांदनी चौक में तब्दील करने में कोई कमी नहीं रखी है। खैर…

बिल्लू भिया को,मुंगेर सरपंच का सलाम कबूल हो

अभी ऑफिस पहुंच कर जैसे ही कम्प्यूटर ऑन किया तो शांतनु का ई मेल आया हुआ था। खोल कर पढ़ने लगा तो तनाव के माहौल में भी मुस्कुराना पड़ा। क्यों? इसके लिए तो आपको नीचे मूंगेर का वह पत्र पढ़ना पढ़ेगा जो बिल गेट्स साहेब को लिखा गया है। पढ़िए और बताएं कि आपको हंसी आई या नहीं?

जय हो॥

बिल गेट्स को शिकायती पत्र (Complaint to Bill Gates)
आदरणीय बिल्लू भिया को,
इंडिया से मुंगेर सरपंच का सलाम कबूल हो... आपके देश के एक और बिल्लू भिया (बतावत रहें कि प्रेसीडेंटवा रहे) ऊ भी इस पंचायत को एक ठो कम्प्यूटर दे गये हैं । अब हमरे गाँव में थोडा-बहुत हमही पढे-लिखे हैं तो कम्प्यूटर को हम घर पर ही रख लिये हैं । ई चिट्ठी हम आपको इसलिये लिख रहे हैं कि उसमें बहुत सी खराबी हैं (लगता है खराब सा कम्प्यूटर हमें पकडा़ई दिये हैं), ढेर सारी "प्राबलम" में से कुछ नीचे लिख रहे हैं, उसका उपाय बताईये -
- जब भी हम इंटरनेट चालू करने के लिये पासवर्ड डालते हैं तो हमेशा ******** यही लिखा आता है, जबकि हमारा पासवर्ड तो "चमेली" है... बहुत अच्छी लडकी है...।

- जब हम shut down का बटन दबाते हैं, तो कोई बटन काम नही करता है ।

ये बातें झूठी बातें हैं

उसे देर रात सिगरेट की तलब ने बैचेन कर दिया था। घड़ी रात के दो बजा रही थी। उसे पता था कि ऑफिस के पास के मॉल के पास में जो गुमटी हैं, वहां सिगरेट मिल सकती है। बस दुकानदार को जगाना पड़ेगा जो कि काफी बुगरुज हैं। लेकिन उसके पास कोई विकल्प नहीं था। जैकेट और मोबाइल लेकर जैसे ही बाहर निकला तो खाली सड़कें डरावनी लग रही थीं लेकिन उसे पता है कि कभी इन्हीं सड़कों पर वह भी धूमा करती थी।

अरे यह क्या? उसने तय किया था कि वह कभी भी उसे याद नहीं करेगा। लेकिन अचानक उसे एक बिसरी हुई याद आती है। देखते देखते ये यादंे वीरान सड़कों पर उतर आती हैं। वह उसे देख सकता था। उसके होंठों के तिल को भी। जबकि चारों ओर स्याह अंधेरा था। लेकिन फिर भी वह उसे देख सकता था। वह उसे पुकारना चाहता है लेकिन आवाज नहीं निकलती है।

अचानक हवा के झोंके के साथ वह वापस लौट आता है। सामने ही गुमटी थी जहां से उसे सिगरेट लेना था। शुक्र है उसे सिगरेट मिल भी गई। सिगरेट लेने के बाद वह उसे मुंह में लगाकर जलाता है। और फिर वह तीन साल पहले उसी शहर में लौट आता है जहां से उसने पढ़ाई की थी। वह उसे आज भी बहुत याद करता है। याद ही नहीं बल्कि चाहता भी बहुत …