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Showing posts with the label मेरी कविताएं

हक

तुम लड़ोगे तो मारे जाओगे क्‍योंकि व्‍यवस्‍था को पसंद नहीं  ऊंची आवाज, बराबरी, लोकतंत्र लेकिन बिना लड़े जीना भी क्‍या कोई जीना है आओ साथियों लड़ा जाए हक के लिए, हवा के लिए, आजादी के लिए हक खैरात में नहीं, लड़ने से मिलते हैं भूख झूठे आश्‍वासन से नहीं रोटी से मिटती है तो अब कब तक झूठे आश्‍वासन, गैरबरारी सहेंगे उठो, लड़ो, मरो लेकिन झुको मत क्‍यों हक मांगना हमारा अधिकार है लड़ेंगे, जीतेंगे 

ज़िंदगी की एक और दोपहर बीत गई

ज़िंदगी की एक और दोपहर बीत गई और मैं बस देखता रह गया कुछ साथ आए और कुछ पीछे छुटते गए फिर भी मैंने हार नहीं मानी और लोगों को जोड़ता गया जोड़ तोड़ के इस खेल में मैं खुद ही टूटता गया फिर भी अब अगली दोपहर का इंतजार है अक्‍टूबर, 2007, मुंबई

दोस्ती की इबादत

जिनसे मैंने दोस्ती की इबादत सीखा ना जाने वो मुझसे क्यों खफा हो गए जाते जाते मैं उन्हें मना नही सका और वो मुझे माफ़ कर ना सके मुंबई, 13 अगस्‍त 2007

कविता

मैं फिर से जीने लगा हूँ क्यूंकि फिर से कविता लिखने लगा हूं.. मैं उसे गुनगुनाता हूं अकेले पड़ने पर जोर जोर से अपनी ही लिखी एक एक लाइनों को चिलाता हूं.. मैं फिर से कविता लिखने लगा हूं.. मेरी कविताओं में केवल और केवल तुम हो लेकिन तुम कौन! हाँ याद आया तुम मतलब मैं क्यूंकि मुझसे ही तुम हो और तुमसे मैं तुम मुझसे दूर जा सकती हो लेकिन खुद से कैसे? क्यूंकि तुम्हारे एक एक अहसास में मैं ही मैं हूं

सबसे खतरनाक होता है आस्तीन का सांप 1

सबसे खतरनाक होता है आस्तीन का सांप अब तक यही सुना होगा आपने गलत। बिल्कुल गलत। आस्तीन के सांप से ज्यादा खतरनाक होता है आस्तीन का इंसान वह कोई भी हो सकता है बस सांप नहीं हो सकता वह इंसान के भेष में कोई भी हो सकता है वह आपका सबसे अच्छा दोस्त, साथी भी हो सकता वह अपकी जान पर नजर रखता है वह आपको धोखा दे सकता है वह आपकी ऐसी-तैसी करने में हमेशा तत्पर रहता है क्योंकि वह आस्तीन का इंसान है वह किसी भी जाति का हो सकता है किसी भी धर्म का हो सकता है आस्तीन का इंसान होना ही उसकी सबसे बड़ी जाति है, धर्म है

सबसे खतरनाक होता है आस्तीन का इंसान होना...

सबसे खतरनाक होता है आस्तीन का इंसान होना... डसता नहीं छुऱा भोंकता है पीठ में.... कांटे बिछाता है रास्ते में...फूलों की आड़ में... बांहों में फलता-फूलता है...अमरबेल की तरह पेड़ को ही खोखला कर देता है एक दिन... जड़ों में डालता है मट्ठा...धीमे जहर सा... और कभी सींचता है तेजाबी जहर से... बुनियादें हिलाने तक रहता है आस्तीन में... गिरता है जब कोई महल...तभी खिसकता है... नए शिकार की खोज में....सारे हथियार लेकर... जीवन भर की भागदौड़ तभी विराम लेती है... जब खुद की सोच का जहर कर देता है तन नीला... या कभी, कभी खुद की आस्तीन से ही निकल आता है इंसान... तब जाती है जान...फरामोशी के इल्जाम से... सबसे खतरनाक होता है आस्तीन का इंसान...