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साधारण आंखों में असाधारण सपने

महात्‍मा गांधी के सपनों का हिंदुस्‍तान भले ही हम न बना पाएं लेकिन बापू की प्रयोगधर्मिता देशके उन तमाम युवाओं को जाने अनजाने में जरुर प्रेरित करती है, जिसके कारण आज सैकड़ों की तादाद में युवक-युवतियां जमीन से उठकर सफलता के नए मापदंड तय कर रहे हैं। वो कोई भी हो सकता है। बशर्ते उन्‍हें जोखिम उठाने का सा‍हस हो। वो एक पेट्रोल पंप पर काम करने वाले युवक से औद्यगिक साम्राज्य खड़ा करने वाले धीरूभाई अंबानी भी हो सकते हैं और साधारण सी नौकरी करने वाले एक पत्रकार से अपना मीडिया साम्राज्‍य खड़ा करने वाले राघव बहल भी। आप इस बात को माने या नहीं मानें लेकिन जमीन के नीचे काफी कुछ बड़ी तेजी से बदल रहा है। इस बदलाव का आमतौर पर सतही नजर से देखने या अनुभव करने से कोई अहसास नहीं होता लेकिन चीजों में बदलाव तो ही रहा है। यह बदलाव हिंदुस्‍तान में तेजी से उभरते मध्‍य वर्ग में हो रहा है। कल के लखपति या फिर कुछ रुपए तक कमाने वाला आज मध्‍यवर्ग की पहचान बन चुका है। इसमें आप चाहें तो अंबानी साम्राज्‍य के जनक धीरुभाई को या फिर मुंबई के उन हजारों डिब्‍बों वालों को शामिल कर सकते हैं, जिनकी समाज में एक अलग पहचान है। कोई भ...