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Showing posts from 2008

मैं तुम्हें आज भी चाहता हूं

मैंजबभीउससेबातकरताथातोएकबातजोमुझेहमेशाऔरआजभीसतातीहै, वोहैउसकीखामोशी।मैंकितनाबोलताथालेकिनवोकुछभीनहींबोलतीथी।उसकखामोशीसागरकीतरहहै।उसकीखामोशीकीहीताकतहैकिपूरीरातजागनेकेबावजूदमैंउसकेबारेंमेंलिखपारहाहूं।सुबहकेसाढ़ेपांचबजेहैंऔरमैंउसेशिद्दतसेमहसूसकरनाचाहरहाहूं।लेकिनमुझेइसबातकाइल्महैकिवोकरीबनहींहै।मैंइमरोजभीनहींबनसकताजिसेअमृताप्रीतमसेअलगकियाजासके।मैंसिर्फमैंहूं।लेकिनउसेमैंक्याकहूं? उसकीमासूमियतहीजोआजभी बांधेरखीहुईहै।वरनाहमलड़कोंकीजाततोऐसीहोतीहैकितूनहींतोऔरकोई।लेकिनमैंआजभीउसकीकमीमहसूसकरसकताहूं।उसकेसाथमैंनेजिंदगीकेसबसेबेहतरदिनगुजारेहीनहींबल्किजिएहैं।
चाहे वे भोपाल के दिन हो या फिर मुंबई के। पिछले कुछ सालों से वे काफी नाराज हैं। उनकी जगह मैं होता तो शायद मैं भी यही करता जो वे कर रही हैं। कभी कभी सोचता हूं कि आज के कुछ सालों बाद मैं अपने रिश्ते को उनके साथ कैसे देखूंगा। मुझे जवाब नहीं मालूम है। वो खुश हैं। लेकिन मैं? इसका जवाब भी मुझे नहीं पता। लेकिन फिर भी इस बात का इल्म है कि मेरी किसी भी हरकत से उन्हें तकलीफ न हो।

एक बार फिर भोपाल

लिजिए एक बार फिर भोपाल आ गया हूं। भोपाल में फिर तीसरी बार वापसी हुई है। शुरुआती दौर में लगा कि भोपाल वापसी किस दिशा में जाएगी, पता नहीं था। खैर अब पूरे दो सप्ताह बाद एक बार फिर से भोपाल का मौसम हसीन सा लगने लगा है। रहने के लिए घर का इंतजाम भी हो गया है। जहां मैं अपने पुराने दोस्त के साथ हूं। डच्यूटी रात की है तो दिक्कत की कोई बात नहीं है। दिन में हमारे दोस्त अपनी गाड़ी से आफिस छोड़ देते थे। बस से १क् मिनट में आफिस और फिर खाना-पीना कर रात के नौ बजे से लेकर सुबह के सात बजे तक न्यूज के साथ खेलना। सुबह टहलते हुए सबसे पहले पोहा और चाय का नाश्ता फिर बस पकड़ कर घर की ओर वापसी। जब पूरा देश सोता है तो मेरे जैसे हजारों लोग जागते हैं और जब लोग जागते हैं तो हमारे जैसे लोगों की रात होती है। यही है जिदंगी मेरे भाई।

खैर अभी तो ठंड का मजा ले रहा हूं जनाब। दो दिनों में ठंड बढ़ी है और इसी के साथ मौसम भी दमदार हो गया है। शुरू से ही ठंड का मौसम मेरे लिए सबसे प्रिय मौसम रहा है। और जब बात भोपाल की ठंड की हो तो ये सोने पर सुहागा जैसा है। भोपाल की बात की जाए तो आप झीलों की बात न करें? यह कैसे हो सकता है? कल्प…

पत्रकारिता विभाग की भटकती यादें

चार महीने इंदौर में रिपरेटिंग करने के बाद अब मैं फिर से झीलों की नगरी भोपाल में आ चुका है। नई जिम्मेदारियों के साथ नई चुनौतियां भी हैं। जो कि मेरे जैसे लोगों के लिए बहुत जरूरी है। क्योंकि यदि हमारे जैसे लोगों को नया काम, नई चुनौती नहीं दी जाए तो हमारे अंदर कुछ दम तोड़ने लगता है। सात महीने में दो ट्रांसफर के बाद भोपाल आकर अच्छा तो लग रहा है लेकिन यहां की गलियों में भटकते हुए वे पुरानी यादें भटकती आत्मा की तरह मेरा पीछा कर रही हैं। वे मुझे दबोचना चाह रही हैं और मैं बच रहा हूं। यहां के माखन लाल विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में बिताते दो साल मेरे लिए किसी जन्नत के अनुभव से कम नहीं थे। मस्ती की पाठशाला था यह विभाग। समय बदला तो बदल गया विश्वविद्यालय का भवन और बदल गए यहां के स्टूडेंट्स। लेकिन मेरे लिए आज भी कुछ नहीं बदला है। आज भी मैं पूरे अधिकार के साथ नए भवन में जाता हूं और पूरी गर्मजोशी के साथ नए ख्वाब लेकर आए लोगों से मिलता हूं। अच्छा लगता उन लोगों से मिलकर जिनकी आंखों में ख्वाब होता है। कुछ पाने, करने की ललक होती है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि पत्रकारिता विभाग में जो न…

सपनों को तोड़ने के लिए

कई दिनों बाद कुछ लिखने बैठ रहा हूं। दोस्तों ने कहा कि तेरे मुंबई को फिर से निषाना बनाया गया हूं, कुछ तो लिख। सबसे पहले मैं यह बता दूं कि आंतकवादियों ने नरीमन प्वाइंट के जिस होटल को निषाना बनाया है, उसके आसपास और उससे मेरी जिंदगी में बहुत अहम स्िाान है। खासतौर पर मेरे जैसे हजारों ऐसे लोगों को जिन्हें मुंबई पनाह देता है। घर परिवार से दूर, ऑफिस को तनाव को कम करने के लिए नरीमन प्वाइंट सबसे अहम स्थान है। नरीमन प्वाइंट से मेरी पहली मुलाकात हिंदी फिल्मों से हुई थी। मुंबई जाने से पहले ही मैने तय कर लिया था कि सबसे पहले इसी स्थान पर जाना है। और मैं गया भी। इस जगह से मेरी जो पहली याद जुड़ी है, वह यह है कि तीन साल पहले दीवाली की बात है। घर जा नहीं पाया था। बस फिर क्या था रात के दो तीन बजे तक यहीं आकाष और सागर को देखकर घर की याद से लड़ता रहा। कल जब मुंबई ब्लास्ट के फुटेज देखा तो अचानक मुंबई के उन सभी स्थानों पर बिताए एक एक पल याद आ गए, जहां विस्फोट हुआ था। यह विस्फोट मुंबई या हिंदुस्तान को तबाह करने के लिए नहीं बल्कि मेरे जैसे आम आदमी के सपनों को तोड़ने के लिए किया गया। आम आदमी सपने देखता था, देख रह…

भोपाल टू जयपुर वाया मुंबई

अक्सर मैं सोचता हूं कि कुछ वक्त निकाल कर कुछ न कुछ लिखा जाए अखबार के अलावा। कई दिनों बाद आज मौका मिल ही गया है। आज पुरानी कहानी को फिर से नए अंदाज में लिखने को दिल कह रहा है। कुछ इस कहानी से बुरी तरह पक जाएंगे तो कुछ कहेंगे आषीष भाई बहुत हुआ। अब तो बंद करो। सभी को बस यही कहना चाहूंगा कि दिल है कि मानता नहीं। खैर अधिक नहीं झेलाते हुए शुरूआत करता हूं। यह कहानी भोपाल में शुरू हुई और शायद जयपुर जाकर खत्म हो चुकी है। शायद। कहते हैं कि प्यार में बड़ी ताकत होती है। सच्चा प्यार आपको जीना सिखाता है और एक तरफा प्यार आपको बर्बाद कर देता है। खैर मुझे नहीं पता कि मैं बर्बाद हुआ या आबाद। मुझे आज भी उसके होंठो का वो तिल बार बार परेषान करता है जो उसके मुस्कुराने के साथ दिखता था। कई साल बीत गए और मैं उसकी मुस्कुराहट को तरस गया हूं। भोपाल से मुंबई हम साथ गए थे। लेकिन मुंबई से हम दोनों का रास्ता अलग हो चुका था। उसने राजस्थान की राजधानी में एक अखबार को ज्वाइन कर लिया था। और मैं भी मुंबई की नौकरी छोड़कर भोपाल का वापस रूख कर लिया था। जितने दिन भी हम साथ थे, वे कम से कम मेरे जीवन के सबसे अच्छे दिनों में से …

कुछ खूबसूरत लम्हें

मुंबई लोकल एक प्रेम कथा

यदि आप सोच रहे हैं कि मैं आज कुछ बहुत अधिक लिखने जा लिखने जा रहा हूं तो पूरी तरह गलत हैं। जी हां पूरी तरह गलत। चलिए अब बिना अधिक पकाए हुए कहानी की शुरूआत करता हूं। आप इसे कहानी मान भी सकते हैं और नहीं भी। वह शाम भी अन्य शामों की तरह एक सामान्य शाम थी। लेकिन मुंबई की शाम होने के नाते इसमें थोड़ी सी गरमाहट थी। वो अंधेरी रेलवे स्टेषन के प्लेटफार्म नंबर 4 पर खड़ा बैचेनी से विरार की ओर जाने वाली तेज लोकल का इंतजार कर रहा था। रह रहकर उसकी आंखे महिलाओं के फस्र्ट क्लास डिब्बे के सामने वाली भीड़ पर जा कर जम जा रही थी। वह उसका इंतजार कर रहा था। उसे आप कोई भी नाम दे सकते हैं। इससे न मुझे कोई फर्क पड़ने वाला है और न ही इस कहानी को।

अचानक उसकी नजर उस लड़की से मिली और इतने में जोरदार हार्न बजाते हुए 12 डिब्बे वाली लोकल भी आ चुकी थी। उसे घर पहुंचने की जल्दी थी और मुझे भी। मेरा घर उसके स्टेषन से चार स्टेषन आगे था। वह मीरा रोड में रहती थी। उसने किसी तरह अपने बैग को संभालते हुए लोकल में चढ़ने वाली भीड़ का एक हिस्सा बन चुकी थी और मैं भी। लोकल अपनी पूरी गति से भागी जा रही थी। मेरे और उसके डिब्बे को एक जाली जोड़ती…

मैं आप सभी को छोड़कर जा रही हूं

उन दोनों के तलाक की खबर सुनने में उसे एक अजीब सा सकून मिल रहा था। यह स्वाभाविक भी था शायद। लेकिन कहीं न कहीं कुछ गलत भी था। कल ही उसे पता चला कि उन दोनों का तलाक हो गया है। वह उसकी पूर्व प्रेमिका थी, जो बिछड़ गई थी और उसे उम्मीद है कि तलाक के बाद अब वे फिर से एक दूसरे की बांह में झूल सकते हैं। हां यही तो उसे दिमाग में घूम रहा था। अचानक उसके मोबाइल की रिंग टोन ने उसे जगाया। वह सही था। पूरे आठ साल बाद मोबाइल की स्कीन पर परूनिषा की फोटो नंबर के साथ चमक रही थी। उसे विष्वास नहीं हुआ। लेकिन काॅल उसी का था। कांपते हाथों से उसने मोबाइल की स्वीच दबा और कहा हां बोलो। उधर से उसने जो कहा, वह उसके वजूद को हिलाने के लिए काफी था। परूनिषा ने कहा, बस अब सहन नहीं होता। मैं आप सभी को छोड़कर जा रही हूं। बस और उधर से फोन काट दिया गया। वह आज भी उस शहर में परूनिषा को खोज रहा है जहां वह उसे छोड़कर गया था।

वे मेरे सामने हैं तो भी अजीब लग रहा

टूटने के बाद फिर से जुड़ना शायद इतना तकलीफदेय नहीं होता है जितना जुड़ने के बाद टूटना। कल शाम अचानक वे मेरे सामने खड़ी थीं। मुझे लगा मैं कोई ख्वाब देख रहा हूं, लेकिन यकीन मानिए यह ख्वाब नहीं सोलह आना सच था। अंतिम बार वे मुझे बोरीवली के स्टेषन पर छोड़कर जयपुर चली गई थीं और मैं मुंबई के उसी स्टेषन पर कई दिनों तक उसका इंतजार करता रहा। लगा था कि जयपुर से आने वाली गाड़ी से वे वापस आएगीं। पहले दिन बीते और फिर महीने। लेकिन वे नहीं आईं। मेरा भी मुंबई छूट गया। मौसम बदलते गए और कैलेंडर के पन्ने। पर वे नहीं आईं। धीरे धीरे मैं भी उन्हें भुलाता गया। लगभग भूला ही दिया था। लेकिन अचानक उन्हें देखकर उनके साथ बिताए गए एक एक पल फिर से मेरे सामने जिंदा हो गए। मैने कभी कभी सोचा भी नहीं था कि वे ऐसे मेरे सामने आएंगी। बोरीवली में जब वे छोड़कर जा रही थीं तो कुछ अजीब सा लग रहा था और जब आज वे मेरे सामने हैं तो भी अजीब लग रहा है।

उनकी तलाश जारी है

वे खुश हैं। वजह क्या हो सकती है। क्योंकि वे जिससे नफरत करती हैं वह इनसे बहुत दूर कहीं बैठा हुआ है और वे अपनों के साथ खुष हैं और जिंदगी का भरपूर मजा उठा रही हैं। सुना है आजकल राजस्थान के किसी शहर में हैं। किस शहर में हैं यह नहीं पता। लेकिन फिर भी वह उसकी उस खुषबू को आज भी महसूस कर सकता है जब वे उसके साथ थी। उसके होंठो के तिल को वह आज चूमना चाहता है। दम तोड़ती हसरतों के बावजूद वह आज भी उसे पाना चाहता है। उनकी तलाश में वह पूरी दुनिया भटक रहा है पर वे नहीं मिल पा रही हैं। वे कोई भी हो सकती हैं। वे उप्र के कस्बानुमा शहर की कोई गोरी या फिर मुंबई की कोई हसीना भी हो सकती हैं। कोई भी। जब भी उनकी याद आती है वे उसे याद करके जिंदगी के एक दिन और काट लेता है। यही चल रहा है। कब तक चलेगा पता नहीं।

दूरियों से प्यार

लोग कहते हैं कि दूरियों से प्यार बढ़ता है। कुछ वक्त पहले तक यही हम भी मानते थे। लेकिन धारणा अब टूट रही है। जब वे छोड़कर जा रही थीं तो लगा कि वे हमें हमेषा याद रखेंगे लेकिन ऐसा हो नहीं सका। वजह कुछ भी हो सकती। हो यह भी सकता है कि उसे वक्त ही नहीं मिलता है। यह भी संभव है कि वे अब मुझे याद ही नहीं करना चाहते। कुछ ही दिनों में हम उसके कुछ अधिक करीब आ गए थे। खैर यह तो अब पुरानी बात हो चुकी है। जिसे जाना वे जा चुके हैं। इस शहर में जिंदगी जीने का अलग ही मजा आ रहा है। हरदिन यहां के जीवन तो जिंदादिली से जी रहा हूं। इंदौर शहर के लोग जितने अच्छे हैं उतना ही अच्छा यहां का खाना। चाहे यह दाल बाफले हो या फिर साबुदाने की खिचड़ी। बाकी बात अगली बार।

इंदौर को मेरा पहला सलाम

मुंबई से भोपाल और अब इंदौर में अपना डेरा जम गया है। अब देखने वाली बात यह है की मालवा की जमीं से मुझे कितना प्यार मिलता है। आज पहला दिन शानदार रहा। मैंने पहले ही दिन इस शहर को अपना मान लिया है और शायद यहाँ के रहवाशी भी मुझे अपना मानकर बेपनाह मोहब्बत दें। इंदौर के सभी ब्लोगेर्स से मेरा विन्रम अनुरोध है कि मुझे भी अपनी जमात में शामिल कर लें। आज सुबह जैसे ही यहाँ की सरजमीं पर कदम रखा तो पानी की बूंदों ने कहा कि बिना नहाये यहाँ किसी को प्रवेश नही है सो मुझे भीगना ही था। और यही कारण रहा की मैं पूरी तरह अभी भी फ्रेश महसूस कर रहा हूँ। जबकि वक्त बहुत अधिक हो गया है।

मेरे वो सबसे प्यारे दोस्त

कुछ बातें आज भी मेरी समझ में नहीं आती हैंै। कुछ के लिए अैं आज भी खलनायक हूं। वो मुझसे बेपनाह नफरत करते हैं और मैं चाह रहा हूं कि उनकी इस नफरत को प्यार में बदल दूंगा। लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है। मैने अपने कई ऐसे दोस्त इसी कारण खो दिए हैं। कई बार मैं ही जिम्मेदार था लेकिन कभी मैं नहींं था जिम्मेदार। खैर बस ख्ुादा से इतनी ही दुआ करता हूं मुझे मेरे वो सब दोस्त वापस कर दें जिन्हें मैं खो चुका हूं। इसमें मेरे वो सबसे प्यारे दोस्त भी हैं जो मुझे कालेज लाइफ में मिले थे।

अब जी कर क्या किया जाए

वो चाहती थी कि मैं उसके साथ एक दोस्त जैसा ही बर्ताव करूं। लेकिन यह मेरे लिए संभव नहीं था। मैं उसे चाहता हूं। खैर हर किसी के चाहने से यदि खुदा मिलने लगता तो खुदा की औकात की क्या रह जाती। फिर भी लोग खुदा को जमीन पर लाने की जिद्द करते हैं। और मैं उस पागल लडक़ी के दिल में अपने लिए थोड़ी सी जगह बनाने का प्रयास कर रहा हूं पिछले कई बरस से। लेकिन कम्बख्त उसके दिल में मेरे लिए जगह ही नहीं है। उस बेगाने शहर को छोडक़र यहां आया। लेकिन दिल-ए-नादान को चैन यहां भी नहीं। जिस गली से गुजरता हूं, उसके होने का अहसास महसूस होता है। सोच रहा हूं अब यह शहर भी छोड़ दूं। आपकी क्या राय है। अब दुनिया से भी रुखसत होने का वक्त आ गया है।
नोट-कहानी

थोड़ी सी बात मिर्च मसाला

आप यकीन मानिए, यह मेरी कहानी नहीं है। यह कहानी हर उस शख्स थी जो कभी भी कहीं न कहीं किसी न किसी से प्यार करता था, करता है और करता रहेगा। यह बस एकतरफा प्रेम कहानी है। चलिए अब अधिक नहीं पकाते हुए शुरु करता हूं। बात उस वक्त की है जब बारिश की पहली बूंदें जमीन पर पड़ती हैं। इसके बाद पूरा माहौल मिट्टी की सौंधी खूश्बू से महक उठता है। दोनों एक साथ कालेज से निकले थे। काम की तलाश में वो बंबई चला गया और वो इसी शहर में रह गई। वक्त बदला और साथ में कई बातें बदल गई। जो कल तक एक दूसरे के लिए जान देते थे, आज जान लेने पर तुले हैं। वजह साफ है। वो अब उसे नहीं चाहती है। उसकी जिंदगी में और कोई आ गया है। जी हां और कोई आ गया है। आपको सुनाई दिया या नहीं। खैर बात आगें बढ़ाता हूं। बंबई छोडक़र वो वापस अपने पुराने शहर में आ गया। उम्मीद थी कि वो उसे स्वीकार कर लेगी। लेकिन नहीं वो गलत था। वो भी सही थी। दोनों की मुलाकात ऐसे वक्त हुई जहां होनी नहीं चाहिए थी। आगे की बात आज नहीं कल।

प्यार, मोहब्बत और वो

आप यकिन कीजिए मुझे प्यार हो गया है. दिक्कत बस इतनी सी है कि उनकी उमर मुझसे थोडी सी ज्यादा है. मैं २५ बरस का हूँ और उन्होंने ४५ वा बसंत पार किया है. पेशे से वो डाक्टर हैं. इसी शहर में रहती हैं. सोचता हूँ अपनी मोहब्बत का इज़हार कर ही दूँ. लेकिन डर भी सता रहा है. यदि उन्होंने ना कर दिया तो. खैर यह उनका विशेषाधिकार भी है. उनसे पहली मुलाकात एक स्टोरी के चक्कर में हुई थी. शहर में किसी डाक्टर का कमेन्ट चाहिए था. सामने एक अस्पताल दिखा और धुस गया मैं अन्दर. बस वहीं उनसे पहली बार मुलाकात हुई. इसके बाद आए दिन मुलाकातें बढती गई. यकीं मानिये उनका साथ उनकी बातें मुझे शानदार लगती हैं. मैं उनसे मिलने का कोई बहाना नहीं छोड़ता हूँ. अब आप ही बताएं मैं क्या करूँ..

परी को प्यार हो गया.

आप यकीन मानिये या मत मानिये लेकिन यह सोलह आने सच बात है. बात क्या जनाब किस्सा ही है. आप परी को नहीं जानते हैं. चलिए मैं बता देता हूँ. यह न तो आसमान से आई कोई परी है और ना ही किस्से कहानी वाली परी. यह परी है उत्तर प्रदेश के एक कस्बे की. नाम कुछ भी हो सकता है. जैसे सपना, मीना या फिर टीना लेकिन मेरे लिए बस वो परी है. इस परी से हमारी पहली मुलाकात झीलों की नगरी में ही हुई थी. इसे आप पहली नज़र का प्यार कहें या और कुछ. कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन उसमे कुछ ऐसा था या कहूँ है, जो मुझे आज भी उसकी ओर खींचता है. उसकी आंखों में जब भी मैंने आंसू देखा तो मेरी आँखें गीली हो गई. कई महीनो के साथ में उसने मुझे जीना सिखा दिया था. मैं आज जो भी हूँ, उसी के कारण हूँ. लेकिन उसे प्यार हो गया. ओर परी को यदि किसी से प्यार हो जाए तो वो बन्दा कितना नसीब वाला होगा. यह वही समझ सकता है जिसने परी से प्यार किया हो. परी आज खुश है. इसलिए मैं भी खुश हूँ.

वो परी थी

भोपाल आए पूरे दो महीने हो गए. कितनी जल्दी ये समय कटा पता ही नहीं चला. काम और बस काम. बाकी चीजों के लिए समय ही नहीं निकाल पाया. काफी मजा आ रहा है. खासतौर पर उस वकत जब सुबह उठकर अख़बार में अपना नाम पढ़ता हूँ. बायलाइन का अलग नशा है. दिन भर दीमाग खास ख़बर खोजता है किसी भी कीमत पर. कई बार ऐसा भी हुआ है कि जब भी उन सडकों या मोहल्लों से गुजरता हूँ जहाँ कभी उसे देखा था या दो कदम साथ चले थे.तो पुरानी यादें तजा हो जाती हैं. आज भी यहाँ की फिजा में उसे मैं महसूस करता हूँ. वो आसमान से उतरी एक परी थी मेरे लिए. और मैं उसका महाराज.

हम मिलेंगे

कई दिनों बाद आज लिखने बैठा हूँ. सोच रहा हूँ उसके बारे में लिखूं जिसकी जिंदगी में अब मैं नहीं हूँ, आज भी उसकी एक झलक पाने के लिए दिल बेकरार रहता है. लेकिन मुझे पता है अब मैं उसे कभी नहीं देख पाउँगा. फिर भी वो मेरे दिल के सबसे करीब है. उसकी सांसों को आज भी मैं महसूस कर सकता हूँ. वो अब मेरी जिंदगी में नहीं है. वो अब मेरे शहर में है और मैं उस शहर में जहाँ हम मिले थे. उसके जाने के बाद मेरी जिंदगी अब थम सी गई है लेकिन फिर भी मैं चल रहा हूँ और उमीद है की हम एक दिन मिलेंगे और एक अच्छे दोस्त की तरह.

मुंबई डायरी

कई महीनों पहले एक अंग्रेजी के अखबार में पढ़ा था कि न्‍यूयार्क और लंदन के बाद मुंबई ही एक मात्र ऐसा शहर है जो आपको जीरो से हीरो बना सकता है। बस कूबत आपमें होनी चाहिए। ऐसा मुझे भी लगता है। आज ही लग रहा है, ऐसा नहीं है। मुंबई में जब पहली बार कदम रखा था तो यहां की आसमान छूती इमारतों को देख कर मन में एक अजीब सा भाव उठ रहा था। दिल्‍ली की तुलना में यह शहर कुछ अधिक बेहतर है। यहां दिखावा उतना नहीं है, जितना की दिल्‍ली में देखने को मिलता है। दिल्‍ली में जब आप प्रवेश करते हैं तो चारों ओर खुलापन दिख है। मुंबई में ऐसा नहीं है। जब आप यहां के वीटी या दादर जैसे प्रमुख रेलवे स्‍टेशन में प्रवेश करते हैं तो चारों ओर जनसैलाब के साथ बड़ी बड़ी इमारतें आपका स्‍वागत करती हैं। सब भागे जा रहे हैं। वक्‍त की कमी है।

एक के बाद एक लोकल ट्रेन अपने अंदर से भीड़ को उगलती हैं और निगलती हैं। पहली पहली बार सब कुछ अजीब सा लगता है। यदि आपका दिल कमजोर है तो बस आप यही चाहेंगे कि दूसरी ट्रेन पकड़ कर गांव या उस शहर को लौट जाएं जहां से आएं है। लेकिन एक बार जब आप इस शहर में कदम रख देते हैं तो अपने आप हमारों ख्‍वाब आपके अंदर उमड़…

मै जरुर वापस आऊंगा

समझ में नहीं आ रहा कि शुरुआत क्‍हां से और कैसे करुं। लेकिन शुरुआत तो करनी होगी। मुंबई में दो साल हो गए हैं और अब इस श‍हर को छोड़कर जाना पड़ रहा है। यह मेरी सबसे बड़ी कमजोरी है कि मैं जहां भी रहता हूं उसके मोह में बंध जाता हूं। बनारस से राजस्‍थान आते भी ऐसा ही कुछ महसूस हुआ था। फिर जयपुर से भोपाल जाते हुए दिल को तकलीफ हुई थी। इसके बाद भोपाल से मुंबई आते हुए भोपाल और दोस्‍तों को छोड़ते हुए डर लग रहा था। और आज मुंबई छोड़ते हुए अच्‍छा नहीं लग रहा है। मैं बार बार लिखता रहा हूं कि मुंबई मेरा दूसरा प्‍यार है। और किसी भी प्‍यार को छोडते हुए विरह की अग्नि में जलना बड़ा कष्‍टदायक होता है।

इस शहर ने मुझे बहुत कुछ दिया। इस शहर से मुझे एक अस्तिव मिला। कुछ वक्‍त उसके साथ गुजारने का मौका मिला, जिसके साथ मैने सोचा भी नहीं था। मुंबई पर कई लेख लिखते वक्‍त इस शहरों को पूरी तरह मैने जिया है। लेकिन अब छोड़कर जाना पड़ रहा है। बचपन से लेकर अब तक कई शहरों में जिंदगी बसर करने का मौका मिला। लेकिन बनारस और मुंबई ही दो ऐसे शहर हैं जो मेरे मिजाज से मेल खाते हैं। बाकी शहरों में थोड़ी सी बोरियत होती है लेकिन यहां ऐसा …

बस में तुम्‍हारा इंतजार

हर रोज की तरह मुझे आज भी पकड़नी थी बेस्‍ट की बस।
हर रोज की तरह मैंने किया आज भी तुम्‍हारा इंतजार
अंधेरी के उसी बस स्‍टॉप पर
जहां कभी हम साथ मिला करते थे
अक्‍सर बसों को मैं बस इसलिए छोड़ देता था
ताकि तुम्‍हारा साथ पा सकूं
ऑफिस के रास्‍ते में

कई बार हम साथ साथ गए थे ऑफिस
लेकिन अब वो बाते हो गई हैं यादें

आज भी मैं बेस्‍ट की बस में तुम्‍हारा इंतजार करता हूं
और मुंबई की खाक छानता हूं
अंतर बस इतना है अब बस में तन्‍हा हूं
फिर भी तुम्‍हारा इंतजार करता हूं

वो चौराहे के किसी न किसी रास्‍ते से वापस जरुर आएगी

वो चली गई। उसने एक बार भी उसे पीछे मुड़कर नहीं देखा। जबकि वो काफी देर तक उसी चौराहे पर खड़ा देखता रहा। उसे आस थी, वो मुड़ेगी और उसे हल्‍की नजर से देखेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वो उसे भरपूर नजर से देखना चाह रहा था। कई दिन, कई महीने, कई बरस और कई सदिया बीत गई। लेकिन वो आज भी वहीं खड़ा है और उसका इंतजार कर रहा है। बस इसी आस में, कि वो चौराहे के किसी न किसी रास्‍ते से वापस जरुर आएगी। वो आज भी इंतजार कर रहा है।

साधारण आंखों में असाधारण सपने

महात्‍मा गांधी के सपनों का हिंदुस्‍तान भले ही हम न बना पाएं लेकिन बापू की प्रयोगधर्मिता देशके उन तमाम युवाओं को जाने अनजाने में जरुर प्रेरित करती है, जिसके कारण आज सैकड़ों की तादाद में युवक-युवतियां जमीन से उठकर सफलता के नए मापदंड तय कर रहे हैं। वो कोई भी हो सकता है। बशर्ते उन्‍हें जोखिम उठाने का सा‍हस हो। वो एक पेट्रोल पंप पर काम करने वाले युवक से औद्यगिक साम्राज्य खड़ा करने वाले धीरूभाई अंबानी भी हो सकते हैं और साधारण सी नौकरी करने वाले एक पत्रकार से अपना मीडिया साम्राज्‍य खड़ा करने वाले राघव बहल भी।

आप इस बात को माने या नहीं मानें लेकिन जमीन के नीचे काफी कुछ बड़ी तेजी से बदल रहा है। इस बदलाव का आमतौर पर सतही नजर से देखने या अनुभव करने से कोई अहसास नहीं होता लेकिन चीजों में बदलाव तो ही रहा है। यह बदलाव हिंदुस्‍तान में तेजी से उभरते मध्‍य वर्ग में हो रहा है। कल के लखपति या फिर कुछ रुपए तक कमाने वाला आज मध्‍यवर्ग की पहचान बन चुका है। इसमें आप चाहें तो अंबानी साम्राज्‍य के जनक धीरुभाई को या फिर मुंबई के उन हजारों डिब्‍बों वालों को शामिल कर सकते हैं, जिनकी समाज में एक अलग पहचान है। कोई भ…

मैं, मच्‍छर और सेक्‍स अपील

आज मैं खुश हूं। पहली बार इस बात पर खुश हूं कि मुझे मच्‍छर खूब सताते हैं। खुशी की वजह पेरिस और फिनलैंड के शोधकर्ताओं की दो अलग-अलग समूह की वो रिपोर्ट भी है, जिसमें कहा गया है कि मच्छर उनकी तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं, जिनकी सेक्स अपील अच्छी होती है और जो सुंदर होते हैं। यह रिपोर्ट एक जर्मन पत्रिका में प्रकाशित हुई है।

फिनलैंड के यूनिवर्सिटी ऑफ टुरकू के प्रोफेसर पावो टिकनेन ने कुछ विवाहित जोड़ों व कुछ अकेले लोगों को मच्छरों से भरी प्रयोगशाला में कुछ समय बिताने के लिए कहा। उन पर किए गए तकरीबन सात परीक्षणों के बाद वे इस नतीजे पर पहुंचे कि मच्छर उनकी तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं, जिनके शरीर से फेरामोंस नामक मादक हार्मोन का रिसाव होता है। यहां एक बात और बताना चाहूंगा कि यह पहले से भी प्रमाणित है कि जिन व्यक्तियों के पसीने से ज्यादा मादक गंध आती है, उन्हें मच्छर काफी परेशान करते हैं। अब आगें मैं क्‍या कहूं। मैं खुश हूं। बस आपसे इतना निवेदन है कि अर्थ का अनर्थ मत निकालिएगा। लेकिन कमेंट देकर अपनी राय जरुर देकर मेरा उत्‍साहवर्धन कर सकते हैं।

क्‍या वाकई दोस्‍ती प्‍यार है

सबसे पहले मैं यह बात दूं कि यह कविता मेरी नहीं है। मेरे एक दोस्‍त ने मुझे भेजी है जिसे मैं बस आप सबके लिए लगा रहा हूं। पढि़ए और बताइए क्‍या वाकई दोस्‍ती ऐसी ही होती है जैसा इस कविता में कहा गया है।

दोस्ती पहली बारिश की बूंदों मैं है..
दोस्ती खिलते फूलों की खुशबू मैं है ..
दोस्ती ढलते सूरज की किरणों मैं है ..
दोस्ती हर नए दिन की उम्मीद है..
दोस्ती ख्वाब है, दोस्ती जीत है..
दोस्ती प्यार है, दोस्ती गीत है..
दोस्ती दो दिलों का संगीत है..
दोस्ती सांग चलती हवाओं मैं है..
दोस्ती इन बरसती घटाओं मैं है..
दोस्ती दोस्तों की वफाओं मैं है..

तीसरे बिहारी को मुंबई भेज दो

हम दो, हमारे दो, तीसरा हो तो मुंबई भेज दो। हां यही मैसेज बिहारी नेता लालू यादव ने अपने राज्‍य की जनता को दिया है। सुबह जब अपना ई मेल चेक कर रहा था तो यह मेल देख कर थोड़ा सोच में पड़ गया। क्‍या इस मैसेज पर रोया जाए या फिर बस हल्‍का सा मुस्‍कुराने से काम चल जाएगा। ऐसा भी हो सकता है कि किसी ने लालू का बदनाम करने के लिए लालू के नाम से यह मैसेज फैलाया है। खैर बात जो भी, आप तो बस यह बताएं कि इस मेल पर आपकी क्‍या प्रतिक्रिया है। आपकी प्रतिक्रिया को हम लालू यादव, बाल ठाकरे व राज ठाकरे तक पहुंचाने का प्रयास करेंगें।

क्‍यूं भईए पैंटी देख रहे हो ना !

चलिए आज मिलवाते हैं उन क्रिकेटरों से, जिन पर पूरे भारत वर्ष को गर्व है। आज गरीबी, भूखमरी जैसे मुद्वों के लिए न तो मीडिया में जगह है और न ब्‍लॉग पर। हर जगह तो बस क्रिकेट का ही जलवा है। लोग भूख से मरते हैं तो मरने दिजीए। देश की 33 फीसदी से अधिक आबादी गरीबी रेखा के नीचे है, रहने दिजीए। हम सब बस बैठकर किक्रेट देखते हैं और हमारे क्रिकेटर कुछ और।

परुनिशा−एक अधूरी प्रेम कथा−हर रोज मुंबई के स्‍टेशन पर वो उसका इंतजार करता है

वो हर साल की तरह इस बार भी होली पर घर जा रही है। पिछले कई सालों से अमित उसे होली पर स्‍टेशन छोडने जाता रहा है लेकिन इस बार नहीं जा पाएगा। वो गंगा किनारे एक छोटे से गांव से आती है। अमित रेतीले रेगिस्‍तान से। जैसे कभी गंगा और रेगिस्‍तान का मिलाप नहीं हो सकता है। ठीक वैसे ही वो दोनों कभी नहीं मिल सकते हैं। हुआ भी यही।

अमित उसे भूलना चाहता है लेकिन शहर की फिजाओं में फैला उसका अहसास उसे भूलने नहीं देता है। या कहें कि वो उसे भूलना ही नहीं चाहता था। उसे याद है कि वो कब पहली बार उससे कहां और किस हालात में मिला था और देखते देखते उसे अपना दिल दे दिया। उनकी मोहब्‍बत का गवाह मुंबई शहर बना। यह वही मुंबई है जहां लोग प्‍यार करने के बहाने ढूंढ़ते हैं। लोकल ट्रेन से लेकर नरीमन प्‍वाइंट तक अन्‍य प्रेमियों की तरह उन दोनों की भी प्रिय जगह थी। जहां वो सकून से कुछ पल साथ गुजार सकते थे। लेकिन जूहू चौपाटी की याद आज भी उसे सबसे अधिक सताती है। जूहू की रेत पर दोनों कई बार अकेले बैठकर एक साथ कई ख्‍वाब बुनते थे। शहर की जिस गली से वो गुजरता है, उसे अचानक उसकी याद आ जाती है। चाहे वह अंधेरी की गलियां हो या फिर दादर …

बुढि़या और मैं

मैं उसे हर रोज तिल तिल कर मरते देखता हूं लेकिन कुछ नहीं करता हूं। या कहूं करना ही नहीं चाहता हूं। मुझे लग रहा है मैं अपनी संवेदना खो रहा हूं इस शहर में। मैं ऐसा तो नहीं था। लेकिन अब हो गया शायद। उसे देखकर दिल दुखता है लेकिन मैं कुछ नहीं करता हूं। वसई स्‍टेशन के पास हर रोज मैं जो देखता हूं, उसके बाद मुझे सोचना पड़ता है। मैं भी बाकियों की तरह उसके बगल से निकल जाता हूं, जैसे बाकी निकल जाते हैं। लेकिन वो पिछले कई सालों से वहीं सड़क किनारें अपनी एक गठरी के साथ टिकी हुई है। वो एक बुर्जुग महिला है। जो कि आसपास वाले दुकानदारों के रहमो करम पर जिंदा है। उसे जब भी देखता हूं तो अपनी नानी की याद आ जाती है। मेरी नानी भी इतनी ही बूढ़ी थी। लेकिन वो अब नहीं हैं। खैर वापस चलते हैं वसई। हर रोज उस बुढि़या को देखकर मन में एक टीस सी उबरती है। लेकिन मैं कुछ नहीं कर पाता हूं। उसे हर रोज जिंदा देखकर मुझे अच्‍छा लगता है। वरना जिस हालत में वो है, ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि वो कब तक जिएगी। बरसात हो या फिर कड़ाते की ठंड। वो वहीं सड़क किनारे पड़ी रहती है। कभी पाव खाकर जिंदा रहती है तो कभी आस पास वाले रोटी दे दे…

बाबा की एक कविता -- अकाल और उसके बाद

नागार्जुन मेरे प्रिय कवियों में से एक हैं। जब कभी मैं सोचता हूं बाबा नागार्जुन कि कविताएं मुझे क्‍यों पसंद हैं तो जवाब भी उन्‍हीं की कविताएं दे देती हैं। नागार्जुन की कविता आम आदमी की कविता है। जिसे समझने के लिए आपको संवेदनशील होना जरुरी है। यदि आप आम आदमी का दर्द महसूस नहीं कर सकते हो तो उनकी कविता आपके किसी के काम की नहीं है। पेश है उन्‍हीं की प्रसिद्व कविता अकाल और उसके बाद ।

कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।

भड़ास, मोहल्‍ला और एक कविता

कल से हिंदी ब्‍लॉग पर मारामारी मची हुई है। जिसे देखो वही कमर के नीचे वार कर रहा है। सब मिलाकर नंगई चरम पर है। कई महीनों पहले कहीं यह कविता पढ़ी थी, शायद ऐसे माहौल में यह कविता हिंदी ब्‍लॉग के महारथियों को कोई दिशा दे पाए। और जनाब ब्‍लॉग के आगे भी जहां है। बस यह कविता गुनगुनाएं और खुदा से दुआ करें कि देश में, मोहल्‍ले में, यहां तक की अपनी भड़ास में भी हम किसी का दिल न दुखाएं।

परिवर्तन में ही है नींव
क्रांति की,
पर क्रांति अलसायी सी नहीं आती,
उसके प्रवाह में स्‍थापित मूल्‍यों के घरौंदे ढह जाते हैं,
उन्‍मूलन तो हो जाता है खंडहरों की परंपरा का
पर, यदि नव निर्माण न हो तो,
क्रांति का च्रकवात नूतनता की रेत
उछालता रह जाता है
परिवर्तन की उस मरीचिका में,
क्रांति को परिवर्तन के पड़ाव के लिए चाहिए
किसी युग पुरुष का समर्थन
और जन जन की कोटि कोटि
भुजाओं का पौरुष

आज मैं कुछ भी नहीं कहूंगा

आज मैं कुछ भी नहीं कहूंगा। बस आप इसे देखें और अपनी प्रतिक्रिया दें



अजी एक नजर इधर भी

पिछले दिनों हमारी एक मित्र ने हमें एक ईमेल भेजा। इसमें किसी ब्‍लॉग का लिंक था लेकिन जब लिंक खोला तो इसमें कुछ शानदार देखने को मिला। बस आपको करना यह है कि नीचे जो चित्र है उसे बड़े ध्‍यान से देखें। बस देखते रहिए। चाहे तो आप कमेंट भी कर सकते हैं।

ये है मुंबई लोकल मेरी जान

मुंबई मेरा दूसरा प्‍यार है। पहले प्‍यार के बारें में बात न करें तो ही ज्‍यादा अच्‍छा है। मुंबई ने मुझे बहुत कुछ दिया है कम कीमत पर। खैर बातें तो होती होंगी। सबसे पहले खास बात। मुंबई की जीवन रेखा यानि मुंबई लोकल के अपने अनुभव को मैने शब्‍दों में बांधने का प्रयास किया। हालांकि यह बहुत मुश्किल काम था। फिर भी किया। जयपुर के डेली न्‍यूज में यह अनुभव प्रकाशित हुआ। पढ़कर जरा बताएं कि क्‍या खामियां रह गई हैं। आशीष महर्षि

रेलवे स्‍टेशन पर भागमभाग मची हुई है। जिसे देखो वही भागा जा रहा है। कोई रुकने का नाम नहीं ले रहा है। स्‍टेशन खचाखच भरा हुआ। लड़कियों से लेकर बुजुर्ग तक भागे जा रहे हैं। सबको चिंता बस इस बात की है कि उनकी लोकल न छूट जाए। हालांकि यहां हर पांच मिनट में दूसरी लोकल है लेकिन इसके बावजूद लोग भाग रहे हैं। सुबह से लेकर देर रात तक मुंबई के तमाम स्‍टेशनों पर पैर रखने की जगह नहीं होती है। यह तो एक मात्र झलक है मुंबई की लोकल ट्रेन और इससे जुड़े लोगों की। मुंबई लोकल को शब्‍दों से बांधने का प्रयास नहीं किया जा सकता है। यह एक ऐसा अनुभव है जिसके लिए आपको खुद मुंबई आना होगा और लोकल में सफर करना…

गुलाबी नगर का वो कॉफी हाउस

शहर के उस नामचीन कॉफी हाऊस में आज थोड़ी खामोशी फैली हुई थी। ठंड के दिनों में गरमा गरम कॉफी के साथ नई किताबों को खोजते कई जोड़े दिन में कम से कम एक बार तो उधर से गुजर ही जाते थे। लेकिन आज माहौल थोड़ा बदला बदला था। आज पूरे कॉफी हाऊस में एक केवल दो ही लोग थे। एक उस कॉफी हाऊस का मालिक अमित और दूसरा एक कस्‍टमर, जो कि सबसे कोने वाले सीट पर बैठ कर गरमा गरम कॉफी के साथ कोई किताब पढ़ रहा था। आज शाम कुछ अधिक ही ठंड़ी थी। लेकिन अंदर का माहौल पूरी तरह शांत और बड़ा सकून देने वाला था। गुलाबी नगर में आज से करीब बारह साल पहले यह कॉफी हाऊस खुला था। कॉफी हाऊस का मालिक अमित एक बड़े समाचार पत्र में स्‍थानीय संपादक है। दिन में एक बार अमित अपनी बेटीके संग जरुर अपने कॉफी हाऊस को देखने आ जाया करता है। बाकी समय कॉफी हाऊस का मैनेजर जॉन ही इसे संभालता है।

दूसरी ओर, आज न जाने क्‍यों अमित का मन अपने ऑफिस में नहीं लग रहा था और उसने कॉफी हाऊस की ओर ही जाना बेहतर समझा। ऑफिस से निकलते हुए आज कई सालों बाद वो पुरानी बातें याद आ रही थी कि अब उसके दिमाग में पहली बार इस कॉफी हाऊस को बनाने का प्‍लान दिमाग में आया था। गाड़ी …

बोधिसत्‍व जी आप अकेले नहीं हैं

हम सब की हालत ऐसी ही है
बोधिसत्‍व मुझसे उम्र में चौदह साल बढ़े हैं। लेकिन उन्‍होने आज की पोस्‍टमें कुछ ऐसी बातें लिख दीं, जिससे मुझे भी थोड़ी निराशा हो रही है। और इसे मानने में मुझे कोई एतराज नहीं है। उनकी पोस्‍ट पढ़ने के बाद आज फिर से जेहन में वो सभी पुरानी बातें उभर गईं जिससे मैं भूल चुका था। कॉलेज में मेरे कई अच्‍छे दोस्‍त थे और इसमें कुछ आज भी हैं। लेकिन उसी कॉलेज में कुछ ऐसे लोग भी थे जिनसे मेरी या कहें उनकी मुझसे नहीं बनती थी। क्‍यों नहीं बनती थी, इसका जवाब आज तक मेरे पास नहीं है। ऐसे ही मुंबई जब आया तो ऑफिस में भी कुछ गड़बढ़ हुई। जो मेरे सबसे प्रिय दोस्‍त थे वही मेरे दुश्‍मन बन गए। उन्‍हे लगने लगा कि मै बॉस का प्रिय हूं और मेरी वजह से उनके खास दोस्‍त की जॉब नहीं लग पाई। उनको लगता था कि मैं नहीं चाहता कि उनके दोस्‍त को जॉब मिले।

समय बितता गया। गलतफहमियां बनती और मिटती गईं। कुछ पल साथ रहे लेकिन उनका यहां से छोड़कर जाना फिर से गलतफहमियों को बढ़ा दिया। अब वो मुझसे बात नहीं करते हैं जबकि कल तक उनका दावा था कि वो मेरे सबसे अच्‍छे दोस्‍त हैं। मुझे आज भी वो दोस्‍त लगते हैं लेकिन कुछ बाते…

बेटी का जन्‍मदिन

उसके चले जाने के बाद मैं थोड़ा निराश था। मुझे इस बात का सपने में भी कभी ख्‍याल नहीं आया कि वो ऐसे अचानक मुझे छोड़कर चली जाएगी। शादी के केवल चार साल ही तो हुए थे। लेकिन वो मुझे और हमारी दो साल की बच्‍ची को हमेशा के लिए छोड़कर जा चुकी थी। बहुत तनाव और पीड़ा के दिन थे वो। शुरुआत में मुझे लगा कि वो वापस आ जाएगी। दूसरे पतियों की तरह मैं भी पत्नियों को अपनी जायदाद समझता था। बात सिर्फ जायदाद तक सीमित नहीं थी। मैंने उसका विश्‍वास भी तोड़ा था। शादी के बाद भी मेरा परुनिशा से मिलना जारी रहा। जिसकी भनक मिलते ही वो मुझे हमेशा के लिए छोड़कर चली गई। मैने कई बार उससे बात भी करनी चाही लेकिन कोई फायदा नहीं। वो बहुत नाराज थी। उसके जाने के बाद मैने भी परुनिशा से मिलना छोड़ दिया और परुनिशा ने भी कहीं और निकाह कर लिया था। अब मैं बिल्‍कुल तन्‍हा और अकेला था। मेरे पास अब सिर्फ मेरी बेटी थी। जिसे मुझे पालना था। मेरी बेटी एकदम अपनी मां पर गई थी। वैसे ही नाक नक्‍शे, वहीं आंखे और वैसे ही मुस्‍कुराना।

आज मेरी बेटी के साथ मेरी बीवी का भी जन्‍मदिन है। मेरी बेटी आज पंद्रह साल की हो गई है। देर तक सोने वाला मैं आज सबसे…

भरोसे पर टिकती है दुनिया

भरोसे पर टिकती है दुनिया
और दुनिया टिकती है दोस्‍ती पर
भरोसे से ही होते हैं दुनिया के सारे काम
प्‍यार भरोसे की है देन
भरोसे पर कायम है इंसानियत
सब की जड़ में है भरोसे की नींव
जब टूटता है भरोसा
हिल जाती है सारी नींवे
दोस्‍ती दुश्‍मनी में बदलती है
जिंदगी भर साथ चलने वाला
बन जाता है आपकी जिंदगी का दुश्‍मन
ऐसे में बस न टूटे भरोसा
बनी रहे सबकी आशा

इसे मोहब्‍बत कहें या मुंबई

यह लेख राजस्‍थान पत्रिका समूह के डेली न्‍यूज समाचार पत्र में रविवार को प्रकाशित हुआ है। अब आप इसे पढ़कर अपनी राय जरुर दें ताकि यदि कुछ गलती हो तो सुधारा जाए। हालांकि मैने भरसक प्रयास किया है कि इस लेख को दिल से लिख सकूं
कभी कभी कुछ चीजों को शब्‍दों में नहीं बांधा जा सकता है। इन्‍हें केवल महसूस किया जा सकता है। इश्‍क भी उन्‍हीं चीजों में शुमार है जिसे शब्‍दों में बांधना कोई आसान काम नहीं है और जब बात मुंबई के प्‍यार की हो तो मामला थोड़ा और पेचिदा हो जाता है। हिंदुस्‍तान की अधिकतर फिल्‍मों की शुरुआत प्‍यार से शुरु होती मुंबई डायरी, डेली न्‍यूज, लेखहै और प्‍यार पर ही खत्‍म हो जाती है। जाहिर है ऐसे में फिल्‍मों के शहर मुंबई का प्‍यार तो खास होगा ही। मुंबई में प्रेमी अपने प्‍यार के इजहार के लिए किसी खास दिन का इंतजार नहीं करते हैं लेकिन फिर भी 14 फरवरी या वैलेंटाइन डे का दिन मुंबईकर, खासतौर पर यहां के युवाओं के लिए खास मायने रखता है। इस दिन पूरे मुंबई पर एक ही रंग होता है और वो रंग होता है इश्‍क का। मुंबई के हाइवे से लेकर समुंद्र तट तक, चारों और सिर्फ और सिर्फ इश्‍क का रंग होता है। मुंबईकर …

उस मोड़ पर वो फिर जुदा हुए

वो मिले और कुछ पल साथ गुजारे। लेकिन वो दोनों एक ऐसे मोड़ पर जुदा हुए, जहां से न उसने मुड़ कर देखा और न देखने की कोशिश भी की। लेकिन एक वो था जो बार बार उस मोड़ से मुड़कर उसे जाता हुआ देख रहा था। उसके दिल में आया उसे वो रोके लेकिन उसे पता था कि वो नहीं रूकेगी। आंखों के साथ दिल भी भर आया था उसे जाता देखकर। कुछ नहीं कर पाया वो और वो चली जा रही थी और चली गई। ऐसा न जाने कितनी बार हुआ है कि सर्द मौसम से लेकर तपतपाती गर्मी में उसे कितने लोगों ने ऐसे ही मोड़ पर छोड़ कर गए हैं। और वो बार बार उस मोड़ पर उनका इंतजार करता है। लेकिन इस बार उसे कुछ अधिक ही तकलीफ हो रही थी। उसके जाने के साथ एक बार फिर वो अकेला हो गया था। दिल में कई अधूरी हसरते पाले वो इस शहर में आया था लेकिन हसरतें फिर अधूरी ही रहीं। उसने सोचा था, उससे मिलेगा तो दिल की सब बात जुबां पर रख देगा लेकिन उसके सामने आते ही वो उसकी गहरी आंखों में डूबता गया और जब तक संभलता, काफी देर हो चुकी थी। वो उस मोड़ पर उसे आगे अकेला जाने के लिए छोड़कर चली गई थी।

भोपाल जा रहा हूं

एक दिन की व्‍यक्तिगत यात्रा पर कल भोपाल के लिए निकल रहा हूं। वापसी रविवार की है। भोपाल मेरे मनपसंद शहरों में से एक है। यहा मैने अपने जीवन के दो साल बिताते हैं। शहर के सात नंबर पर हमारा कालेज हुआ करता था। दिनभर और रातों में भी हम दोस्‍तों की मंडली वहां आसपास घूमा करते थे। कोशिश रहेगी कि इस एक दिन के ठहराव में कम से कम कुछ पल उसी कैंपस के आसपास गुजारा जाए जहां से मैं पढ़कर आज पत्रक‍ारिता कर पा रहा हूं।

मुंबई और मेरे दिल की बात

(मुंबई में उत्‍तर भारतीयों के साथ जो हो रहा है उसे कोई भी जायज नहीं ठहरा सकता है। यदि मैं उत्‍तर भारतीय नहीं होता तब भी राज ठाकरे एंड पार्टी को सही नहीं ठहराता। मुंबई में जो कुछ घट रहा है उसे लेकर मन में जो विचार है आए उसे मैंने जयपुर से प्रकाशित डेली न्‍यूज के लिए लिख दिया जो आज प्रकाशित हुआ। लेख को पढि़ए और तय किजीए कौन सही है और कौन गलत। आशीष महर्षि)
मुंबई शहर ने कई हादसे देखें हैं इसीलिए इसे हादसों का शहर कहा जाता है। कभी यह शहर दंगों की आग में जलता है तो कभी बम विस्‍फोट से इस शहर के तानेबाने को बिगाड़ने का प्रयास किया जाता है। बरसात के दिनों में प्रकृति के कहर के रुप में यहां बाढ़ का प्रकोप देखने को मिलता है। लेकिन इन सब हादसों के बाद मुंबईकर यानि मुंबई के लोग मिलकर फिर से शहर को पहले जैसा शांति प्रिय और जिंदादिल बना देते हैं। जब बात मुंबईकर की होती है तो उसमें मुंबई के मराठी ही नहीं बल्कि दूर दराज से आए लोग भी शामिल हैं। मुंबईकर उप्र के दूर दराज गांव को कोई लड़का भी हो सकता है और दक्षिण भारत की कोई महिला भी। बशर्ते हो मुंबई में हो और मुंबई से प्‍यार करता हो। मुंबईकर का एक ही अर्थ…

पीवीआर की दो टिकट और मैं

वाकई मुंबई की बात निराली है। आज सुबह ऑफिस में हिंदुस्‍तान लीवर की ओर से एक कॉफी का एक फ्री स्‍टॉल लगा था जिसमें कोई भी अपनी मनपसंद कॉफी की चुस्‍की ले सकता था। मैने भी ली और जीत लिया एक ईनाम। ईनाम है पीवीआर में 14 फरवरी को स्‍पेशल फिल्‍म के लिए दो टिकट। अब सोच रहा हूं कि इन टिकटों का क्‍या करूं। 14 फरवरी को गुरुवार है और ऑफिस में न्‍यूज के साथ भी समय बिताना है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्‍या किया जाए। मुझे पता है कि कईयों के लिए यह टिकट खास मायने रखता होगा लेकिन मैं क्‍या करुं इन टिकटों का। जो कपल्‍स बनने लायक है वो थो फिलहाल जयपुर में है।

खैर हिंदुस्‍तान की अधिकतर फिल्‍मों की शुरुआत प्‍यार से शुरु होती है और प्‍यार पर ही खत्‍म हो जाती है। जाहिर है ऐसे में फिल्‍मों के शहर मुंबई का प्‍यार तो खास होगा ही। मुंबई में प्रेमी अपने प्‍यार के इजहार के लिए किसी खास दिन का इंतजार नहीं करते हैं लेकिन फिर भी 14 फरवरी या वैलेंटाइन डे का दिन मुंबईकर, खासतौर पर यहां के युवाओं के लिए खास मायने रखता है। इस दिन पूरे मुंबई पर एक ही रंग होता है और वो रंग होता है इश्‍क का। मुंबई के हाइवे से लेकर समुंद्र तट …

वो क्‍यूं बेवफा हो गई

अमित पिछले कई दिनों में गांधी होने के मायने को समझने का प्रयास कर रहा है। गांधी की आत्‍मकथा को पढ़ा। गांधी को समझने में उसका व्‍यक्तिगत हित छुपा हुआ है। हर इंसान हमेशा अपने तो दूसरे से बेहतर समझता है। हर इंसान को लगता है कि वो जो बोल रहा है, सोच रहा है, वही सही है। इंसान चाहता है कि उसकी प्रतिष्‍ठा हो। लोग उसकी इज्‍जत करें। उसकी बातों से किसी को तकलीफ न हो। लोग उसे हमेशा एक अच्‍छे इंसान के रुप में पहचाने। अमित भी कईयों की तरह एक बे‍हतर इंसान बनने का प्रयास कर रहा है। लेकिन कहते हैं न कि हर आदमी ने कई आदमी बसते हैं। शुरु से ही अमित का मानना था कि लोगों को साथ लेकर चला जाए। लेकिन यह संभव होता नहीं दिख रहा है। किसी एक को साथ लेने की कोशिश में दूसरे साथी छूट जाते हैं। जिन्‍हें अमित छोड़ना नहीं चाहता है। दोस्‍तों से गलतफहमी होती है तो उसे दूर करने का प्रयास करता है लेकिन दूसरे उसे उसकी कमजोरी समझकर उसका उपहास उड़ाते हैं। लेकिन वो ऐसा नहीं है। उसे फर्क नहीं पड़ता है कि लोग उसके बारें में क्‍या सोचते हैं। लेकिन सही मायने में पड़ता भी है। कामिनी का ऐसे छोड़कर चले जाना उसे बड़ा सता रहा है और अ…

अधूरी दास्‍तां-अमित और वो

अमित ने सोचा था कि उसके जाने के बाद उसकी यादें भूली बिसरी यादों की तरह किसी कोने में दम तोड़ देगी। उसकी यादें भी उस नई नवेली दुल्‍हन की पहली सुबह की उसके माथे की बिदिंया की तरह होगी, जो कि बेतरकीब ढंग से माथे पर फिसलती रहती है। और वह काफी हद तक सही था। वो उसे लगातार भूलता जा रहा था, लेकिन दिन न जाने बेमौसम बारिश की तरह उसकी यादें उसे सताती लगती है और वो भीगता रहता है। शायद भीगना चाहता भी है । आज उसे लग रहा था कि उसे उसकी याद नहीं आ रही है। क्‍योंकि यादें तो उनकी आती हैं जिन्‍हें हम भुला देते हैं और उसे तो उसने कभी नहीं भुलाया था। आज वह बस यही सोच र‍हा था कि जब भी वो उससे पहली बार मिलेगा तो उसकी मांग में सुर्ख लाल सिंदूर की हल्‍की लकीर होगी जो कि उसे बार बार इस बात का अहसास कराएगी कि वो अब शादीशुदा है। किसी की बहू तो किसी की पत्‍नी है। ऐसे में उससे मिलना सही होगा। शायद नहीं। यह सोचते सोचते न जाने कब अमित की आंख लग गई। पता ही नहीं चला। सुबह जब नींद टूटी तो घड़ी सुबह के नौ बजने का इशारा कर रही थी। वो आज फिर ऑफिस जाने के लिए लेट हो गया। उसे याद है कि जब से वो उसे छोडकर इस शहर से गई है तब…

मुंबई की गुलाबी ठंड के बीच फ्रेंच फिल्‍म फेस्‍टीवल

मुंबई की हल्‍की गुलाबी ठंड और फ्रेंच फिल्‍म फेस्‍टीवल, यदि दोनों एक साथ हो तो क्‍या बात है। मुंबई में पिछले दिनों चार दिवसीय इस फेस्‍टीवल के दौरान बड़ी तादाद में फिल्‍म प्रेमियों ने शिकरत कर , न सिर्फ इस फेस्‍टीवल के आयोजकों का हौसला बढ़ाया, बल्कि एक बार यह फिर से साबित कर दिया कि मुंबई वासी अच्‍छी फिल्‍मों के कितने कद्रदान हैं।

हिंदुस्‍तान में यह अपने आप में पहला फिल्‍म फेस्‍टीवल था कि जिसमें आई लगभग सभी फिल्‍मे भारतीय वितरकों को बेची जा चुकी हैं। बस इन्‍हें सिनेमा हाल में प्रदर्शित करने की देर है । आयोजकों का मानना है कि भारतीय सिनेप्रेमी फिल्‍मों के बहुत बड़े दिवानें है, यही कारण है कि फ्रेंच फिल्‍मों को देखने को लिए इतने बड़े पैमाने पर लोग उपस्थित रहे । इस फेस्‍टीवल में दिखाई गई अधिकतर फिल्‍मे नॉन हॉलीवुड की रहीं। आस्‍कर से नवाजी जा चुकी फिल्‍म क्रॉसड ट्रेक को भी भारतीय वितरकों ने हाथों हाथ लिया। फेस्टिवल में दिखाई गई फिल्‍मों में क्रॉस्‍ड ट्रेक्‍स, अजूर एंड असमा और कारामेल प्रमुख फिल्‍में रहीं । फ्रेंच फिल्‍मों का यह सफर 27 जनवरी से 30 जनवरी तक मुंबई में चलने के बाद एक से चार फरवर…

राजदीप सर बधाई

आईबीएन7 और नेटवर्क 18 से जुड़े राजदीप सरदेसाई को आज पदम श्री अवार्ड से नवाजा गया। राजदीप सरदेसाई के अलावा एनडीटीवी की बरखा दत्‍त और विनोद दुआ को भी इस अवार्ड से नवाजा गया है।

कविता या कूड़ा

कविताओं का अपना ही संसार होता है। कुछ के लिए कुछ लाइने कविता बन जाती है तो किसी के लिए यह उनके अनुभव होते हैं। मुझे नहीं पता है कि कविता किसे कहेंगे। कविता लिखने के लिए क्‍या किसी अनुभव से होकर गुजरना जरुरी है। कुछ कहेंगे हां और कुछ कहेंगे नहीं। लेकिन कविता तो आपके आसपास रोजाना घटती है। बस उसे शब्‍दों में ढालने की जरुरत है। अब आप ही बताएं कि यहां जो कविताएं है उसे कविता कहें या कूड़ा। आप की जो भी राय होगी, वो सर आंखों पर।

ब्‍लॉग की दुनिया में एक और ब्‍लॉगर

मेरे एक और दोस्‍त ने आखिरकार ब्‍लॉग की दुनिया में कदम रख ही दिया। कानपुर के बिंदकी नामक कस्‍बे के निवासी नमित से मेरी दोस्‍ती कालेज के जमाने की है। नमित फिलहाल छत्‍तीसगढ़ भास्‍कर में कार्यरत हैं। नमित और मैने एक साथ माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता संस्‍थान से मास्‍टर डिग्री हासिल की है। दोस्‍तों की मंडली में ददा के नाम से प्रसिद्व नमित के ब्‍लॉग का लिंक यहां है। आप सभी से निवदेन है ब्‍लॉग की इस दुनिया में उसका स्‍वागत करें।

http://namitshukla.blogspot.com/

मुंबई की गुलाबी ठंड और शेयर मार्केट की ठंडक

मुंबई में दो दिन से पड़ रही गुलाबी ठंड ने शहर का मिजाज थोड़ा और रंगीन बना दिया है। मुंबई की लोकल ट्रेन से लेकर चौपटी तक पर इस ठंड का असर देखा जा सकता है। एक दूसरे के हाथों में हाथ डाले मुंबई के नौजवान इन दिनों इस ठंड का भरपूर मजा उठा रहे हैं। लेकिन यह बात केवल इस शहर के युवाओं पर ही लागू नहीं होती है। जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़े बुर्जुगों का भी यही हाल है। समुंद किनारे इनकी संख्‍या भी कम नहीं है। पूरे बिंदास और नई ताजगी के संग इन बुर्जुगों को जिंदगी का मजा लेते अच्‍छे अच्‍छे युवा चकरा जाएं।

कल की मैराथन, मोहरम और मोदी के भाषण के बाद एक बार फिर शहर भागने को तैयार है लेकिन बुरा हो शेयर बाजार का, जिसकी भारी गिरावट से शहर को थोड़ा हिला दिया। इसका सबसे अधिक असर लोकल ट्रेन में देखने को मिलेगा। खासतौर पर विरार लोकल में। इस रुट पर पड़ने वाले भायंदर और वसई रोड स्‍टेशन पर गुजरातियों के साथ मारवाडियों की तादाद बहुत अधिक है और शेयर बाजार में भी इनकी भागीदारी सबसे अधिक है।

गुजरात का शेर मुंबई में दहाड़ा

मुंबई के प्रसिद्व शिवाजी पार्क को जाने वाली हर सड़क कल भगवे रंग में नजर आ रही थी। मौका था गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के सम्‍मान समारोह के बहाने महाराष्‍ट्र में भाजपा में नई जान फूंकने की कोशिश की गई। देखे देखे कौन आया, गुजरात का शेर आया, जैसे नारों के बीच मोदी के निशाने पर कांग्रेस, केंद्रीय सरकार और कांग्रेस की मुखिया सोनिया गांधी थी।

सभा को संबोधित करते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि केंद्र सरकार ने कश्मीर स्थित भारत-पाकिस्तान सीमा से बड़ी संख्या में सैनिकों को हटाने का पाप किया है। उन्होंने कहा कि केंद्र की संप्रग सरकार आतंकवाद से लड़ने में अक्षम है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस देश पर बोझ बन गई है। इससे मुक्ति के बिना देश का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता।

कांग्रेस पर वोटबैंक की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए मोदी ने कहा कि प्रधानमंत्री कहते हैं कि देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला हक है। मोदी ने कहा कि इसी सांप्रदायिक नजरिये से एक बार देश के टुकड़े हो चुके हैं। अब सरकार गरीबों के पेट भी इसी आधार पर बांटना चाहती है। इस प्रकार सांप्रदायिक नजरिये से बजट तैयार क…

कल मुंबई दौड़ेगी लेकिन मैं

कुछ दिनों पहले मेरी ही कंपनी से एक ई मेल आया कि यदि आप मुंबई मैराथन में भाग लेना चा‍हते हैं तो ई मेल के साथ भेजे गए फार्म को भर कर फारवर्ड कर दें। इस बात को करीब दो महीने होने को आए। मैने ई मेल का जवाब नहीं दिया लेकिन अब थोड़ा अफसो हो रहा है कि यार आशीष तूने क्‍यों नहीं भाग लिया। खैर समय बीत चुका है और कल मुंबई दौड़ेगी और मैं शायद अपने घर पर सोता रहूंगा या‍ फिर मुंबई के लोगों को दौड़ता देखने के लिए जाऊंगा। पता नही।

खैर इस समय यह शहर पूरी तरह दौड़ने के लिए तैयार है। मुंबई के आजाद मैदान से शुरु होकर यह मैराथन बांद्रा तक जाएगी यानि करीब 40 किलोमीटर से अधिक की दौड़। मीडिया से लेकर लोकल ट्रेन तक में हर जगह इस मैराथन का रंग दिख रहा है। जगह जगह होर्डिंग्स लगाए गए हैं और इस पर शहर के आम लोगों को जगह दी गई है। पिछले साल वर्षों से एशिया की सबसे बड़ी मैराथन मुंबई में ही आयोजित की जा रही है। अनुमान है कि इस बार इसमें 33 हजार लोग दौड़ेंगे। अनिल अंबानी, राहुल बोस, तीस्‍ता सीतलवाड़ से लेकर मुंबई के हवलदार, टैक्‍सी चालक और बुर्जुग लोग भी इसमें दौड़ेंगे।

काले कौवे

अब काले कौवे नहीं दिखते हैं साख पर
संसद में उनकी आवाजाही बढ़ गई है

खादी की टोपी से लेकर नेकर तक
कौवे कांव कांव कर रहे हैं संसद में

किसी के लिए राम जरुरी है
किसी के लिए जरुरी है गरीबों का हाथ
फिर भी कौवे कांव कांव कर रहे हैं

कोई कहता है कि वे गायब हो रहे हैं
तो कोई कहता है कि संसद निगल रही है उनको
गली से लेकर संसद के गलियारों तक में
कौवे कांव कांव कर रहे हैंमुंबई, 18 जनवरी 2008

वाकई मुंबई हादसों का शहर है

वाकई यह शहर हादसों का शहर है। यहां कब क्‍या हो जाए, कुछ भी कहना मुश्किल है। जैसे आज सुबह मेरे ऑफिस के करीब वाले मॉल में एक आदमी को चाकू घोपकर मारने का प्रयास किया जाता है और कुछ ही देर में यहां पुलिस के साथ प्रेस वालों का जमावड़ा खड़ा हो जाता है और यह जमावड़ा इस पोस्‍ट को लिखने तक वहीं पर खड़ा है। इसमें आईबीएन7, आज तक, स्‍टॉर न्‍यूज से लेकर स्‍थानीय चैनल वाले तक शामिल हैं। कुछ अखबार वाले भी हैं लेकिन उन्‍हें पहचाना थोड़ा मुश्किल है। सब अपने अपने ढ़ंग से स्‍टोरी बनाने में जुटे पड़े हैं।

मामला यह है कि मैग्‍नेट मॉल के सुपरवाइजर की हत्‍या का प्रयास किया जाता है और कारण यह था कि उसने अपने एक पूर्व कर्मचारी को वेतन नहीं दिया था। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर इतनी छोटी सी वजह से हत्‍या कैसे की जा सकती है लेकिन यह प्रयास हुआ है। बात देखने में भले ही छोटी लगे लेकिन यहां हमें यह देखना होगा कि तीन हजार रुपए की पगार पर काम करने वाले उस व्‍यक्ति के घर की माली हालत कैसी होगी। उसका एक परिवार होगा, जिसमें उसकी पत्‍नी, मां बाप और बच्‍चे होंगे। ऐसे में यदि तीन हजार रुपए यानि उसे पगार नहीं मिले तो उसके घर…

बताएं इस ऊब से कैसे निपटा जाए

रविश जी भी ऊब जाते हैं, जबकि वह देश के सर्वोत्‍तम न्‍यूज चैनल में हैं। मैं भी इन दिनों कुछ अधिक ही ऊब रहा हूं। मुंबई से नहीं बल्कि अपनी नौ से सात वाली नौकरी से। पत्रकारिता में कुछ करने के जूनून से आया था और यहां आकर ऊब रहा हूं। हर दिन बीतता जा रहा है। और ऐसे देखते देखते पूरे दो साल गुजर गए। पत्रकारिता में हर किसी को मैं ऊबते हुए देख रहा हूं, खासतौर पर मेरे जैसे युवा पत्रकारों को। जो कि पत्रकारिता को सिर्फ एक नौकरी नहीं बल्कि इससे बढ़कर मानते हैं। लेकिन सीधा सा मामला है कि यदि आप सिस्‍टम को नहीं बदल पाते हैं तो सिस्‍टम आपको बदल जाता है। अधिकतर पत्रकार सिस्‍टम के साथ बदल कर पत्रकारिता नहीं नौकरी कर रहे हैं। मैं भी शायद उन्‍हं के कदमों पर जा रहा हूं। लेकिन समय रहते नहीं चेता तो दिक्‍कत हो जाएगी। सुबह 7 बजकर 49 मिनट की विरार से चर्च गेट की लोकल पकड़ना और फिर दिनभर ऑफिस में वही रुटीन काम और शाम को फिर 7 बजकर 18 मिनट की चर्च गेट विरार लोकल में एक घंटे का सफर। कुछ भी नया नहीं है और ऊब बढ़ती जा रही है। अब आप ही बताएं इस ऊब से कैसे निपटा जाए।

वो नहीं आई

वो हर रोज सुबह के पहली पहल गंगा मईया के दर्शन को आती थी। सुंदर मुख, भरा हुआ शरीर और गहरी आंखों में बहुत कुछ खोया हुआ था उसकी। लेकिन इसके बावजूद वह सफेद साड़ी में लिपड़ी बस जिंदा लाश थी, जो इस शहर की एक धर्मशाला के एक अंधेरे कमरे में रह कर अपनी मौत का इंतजार करती रहती थी। पच्‍चीस साल की थी बिमला बस। रोजाना की तरह वह वहां उसका इंतजार कर रहा था लेकिन आज बिमला नहीं आई। माहौल में अजीब सी खामोशी थी। धर्मशाला के बाहर जब वह पहुंचा तो कुछ लोग एक लाश को बांधकर गंगा मईया के हवाले करने जा रहे थे। आज बिमला हमेशा के लिए गंगा मईया में जा रही थी। अब सिर्फ वह और गंगा मईया होंगी। मोहल्‍ले में चर्चा है कि बिमला ने खुदखुशी कर ली। अब वह उसे कभी नहीं देख पाएगा। वह उससे बात करना चाहता था लेकिन आज तक उसने केवल उसे देखा ही था, बात करने की कभी हिम्‍मत नहीं हुआ और अब तो वह हमेशा के लिए ही चली गई है।

कुछ दिनों बाद उस धर्मशाला में एक दूसरी विधवा आ गई।

आर के लक्ष्‍मण

आर के लक्ष्‍मण से मेरी पहली मुलाकात जयपुर के जवाहर कला केंद्र में एक प्रर्दशनी में कई साल पहले हुई थी। उस समय वो व्‍हील चेयर पर थे। काफी तादाद में लोग उनका आटोग्राफ लेने में लगे हुए थे। किसी तरह उनसे कुछ बात हो पाई। लेकिन उनसे बात करने के बाद पता चला कि भले ही उनका शरीर उनका साथ छोड़ रहा है लेकिन आज भी उम्र के इस पड़ाव पर वो थके नहीं हैं। पेश है उन्‍ही की कुछ रचना।

मुंबई की लोकल ट्रेन और सुबह की भागमभाग

मुंबई की लोकल ट्रेन का सफर अक्‍सर कष्‍ट्रदायी ही होता है लेकिन आज यह सुखद रहा। फ्री में जिस ट्रेन में मसाज होती हो वही मुंबई की लोकल है। लोकल जिसमें इंसानों की दशा किसी कत्‍लखाने जाती जानवरों की ट्रक से कम नहीं होती है, जिसमें इंसान जानवर से भी अधिक बुरी तरह ठूंसा रहता है। सुबह जब घर से निकला तो इस बात का पूरा अंदाजा था कि आज 8 बजे वाली लोकल छुटने वाली है। स्‍टेशन पर पहुंचा तो लोकल आती हुई दिख रही। मजबूरन मुझे रेल लाइन पार कर प्‍लेटफार्म दो पर जाना पड़ा। गाड़ी के साथ दौड़ते दौड़ते आखिर मैने ट्रेन पकड़ ही रही। भीड़ बाकी दिनों की तुलना में आज थोड़ी कम थी । गेट के बाजू में, जहां हमेशा मैं खड़ा रहता हूं, वहां जाकर अपने स्‍थान पर खड़ा हो गया। बसई रोड, नायगांव, भायंदर और फिर मीरा रोड़ आते आते साथ के लोग भी आ चुके थे और गाड़ी अब पूरी तरह पैक थी । कान में रेडियों बज रहा था और मैं हल्‍की झपकी लेते हुए सुन रहा था। दादर आया तो अचानक ग्रुप वालों ने स्‍टेशन पर ही चाय और वड़ा पाव खाने की इच्‍छा जता दी । बस फिर क्‍या था, हम सात आठ लोगों की मंडली वहीं वड़ा पाव और चाय पीने के बाद निकल पड़े अपने काम ओर…