Skip to main content

हम क्‍यूं नहीं अपनी खामोशी को कोई नाम दें

क्‍या आपने कभी उस खामोशी को महसूस किया है जो आपके आसपास अपनों की है। उनकी खामोशी जो बोलना चाहती है लेकिन वो अपनी खामोशी कोई शब्‍द देना नहीं चाहते हैं। इसके क्‍या कारण होते हैं मैं नहीं जानता हूं। लेकिन फिर भी मैं कुछ कहने की कोशिश करुंगा जो कि मेरे दिल में है। शायद वो खामोश इस लिए रहते हैं ताकि दूसरों की भावना को ठेस नहीं पहुंचे या फिर आने वाले तूफान को मोडना चाहते हैं वो लोग जो खामोश रहत हैं। लेकिन मुझे डर लगता है इन खामोशियों से। आखिर हम क्‍यूं चुप रहें। क्‍यूं अपनी बातों को हम कोई शब्‍द नहीं देना चाहते हैं। माना कि आपकी खामोशी से किसी को बुरा लग सकता है। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं हम चुप रहें। हम अपने दोस्‍तों के साथ क्‍यों खामोश रहते हैं। इस खामोशी को सबसे अधिक औरतों में देखा जा सकता है। पुरुष स्‍वभाव से आजाद और असभ्‍य होता है।जो दिल में आया कहा दिया। वह यह भी नहीं सोचता है कि इस शब्‍दों को दूसरों पर क्‍या असर पड़ेगा। लेकिन इस मामले में औरतें सभ्‍य और शालीन होती है। क्‍यूं होती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण उनके आसपास का वातारवरण और सामाजिक परिवेश को जिम्‍मेदार ठहराया जा सकता है। जहां बचपन से ही लड़कियों को सहन की शिक्षा दी जाती है। पहले भाई की, फिर बाप, फिर पति की और अंतिम समय बेटों की। बचपन से जो खामोशी की चादर वो ओढ़ती हैं वो उनके जाने के साथ ही खत्‍म होती है।

Comments

आशीष
बहुत अच्छे ढंग से ख़ामोशी का विश्लेषण किया है। किंतु ख़ामोशी का एक और भी कारण है -
"लोग क्या कहेंगे?"
व्यक्ति को, चाहे वह नारी हो या पुरुष, अपनी ख़ामियां, अपनी गलतियां और अपने ही कर्म (मैं पिछले जन्म आदि की बात नहीं कर रहा हूं)
मस्तिष्क की एक बंद कोठड़ी में डाल देते है जिसका नाम है 'ख़ामोशी'! ज्यों ही उस कोठड़ी का दरवाज़ा खोलने का प्रयास करता है तो यही सोच कर कि "लोग क्या कहेंगे?" उसी अंधेरे में
खो जाता है।-- परिणाम क्या होते है? मनोवैज्ञानिक आज भी पता लगाने में लगे हुए हैं।
महावीर शर्मा
Beji said…
तेरी खामोशियो को सुनती रही हूँ …
क्यूँ पहुँचता नहीं है मेरा मौन तुम तक…
मैने कहना नहीं सीखा…कि तुम सुनते नहीं हो…?
निःशब्दता में इतना कहा है…
" साधारणतया मौन अच्छा है,
किन्तु मनन के लिए,
जब शोर हो चारों ओर सत्य के हनन के लिए
तब तुम्हे अपनी बात ज्वलन्त शब्दों में कहनी चाहिए
सिर कटाना पड़े या न पड़े,
तैयारी तो उसकी रहनी चाहिए "
- भवानी प्रसाद मिश्र.

Popular posts from this blog

#DigitalGyan : Sarahah के बारे में जानिए सबकुछ

'सराहा' दुनियाभर में तहलका मचाने के बाद अब हिंदुस्तान में छा गया है। जिसे देखिए, वो इसका दीवाना बन चुका है। सऊदी अरब में बनाए गए एप सराहा को दुनियाभर में यूजर्स काफी पसंद कर रहे हैं । करीब एक महीने पहले लॉन्च हुए इस एप को 50 लाख से ज्यादा बार डाउनलोड किया गया है। खास बात यह है कि एप बनाने वाली इस स्टार्टअप को सिर्फ तीन लोग चलाते हैं। इनमें 29 साल के जेन अल-अबीदीन तौफीक और उनके दो दोस्त शामिल हैं।  इस एप के जरिये यूजर अपनी प्रोफाइल से जुड़े किसी भी व्यक्ति को मैसेज भेज सकते हैं। लेकिन सबसे मजेदार यह है कि मैसेज पाने वाले को यह पता नहीं चलेगा कि ये मैसेज किसके पास से आया है। जाहिर है, इसका जवाब भी नहीं दिया जा सकता। और यही कारण है कि ये ऐप लोगों के बीच बहुत तेज़ी से लोकप्रिय होता जा रहा है। सराहा एक अरबी शब्द है, जिसका मतलब ‘ईमानदारी’ होता है। तौफिक ने बताया ‘एप बनाने का मकसद यह है कि इसके जरिये कोई कर्मचारी, बॉस या वरिष्ठ को बिना झिझक अपनी राय दे सके। यूजर किसी व्यक्ति से वो सब कह सकें जो उनके सामने आकर नहीं कह सकते। ऐसा हो सकता है कि वे जो कह रहे हैं उसे सुनना उन्हें अच्छा न ल…

दोस्ती और विश्वासघात में अन्तर होता है

दोस्ती और विश्वासघात में अन्तर होता है
यह तो सब जानते हैं
मैं भी और आप भी
लेकिन इसे क्या कहेंगे आप
जब आपका सबसे प्यारा दोस्त
आपके साथ वो करे
जो दुश्मन भी नहीं करता है
जी हाँ मैं अपने सबसे प्यारे दोस्त की बात कर रहा हूँ
मैंने उसकी दोस्ती को इबारत समझा
और उसने हर मोड़ पर मुझे ठगा
मैं आज भी उसपर विश्वास करना चाहता हूँ
लेकिन करूँ या नहीं करूँ
अजीब सी उलझन है

बाघों की मौत के लिए फिर मोदी होंगे जिम्मेदार?

आशीष महर्षि 
सतपुड़ा से लेकर रणथंभौर के जंगलों से बुरी खबर आ रही है। आखिर जिस बात का डर था, वही हुआ। इतिहास में पहली बार मानसून में भी बाघों के घरों में इंसान टूरिस्ट के रुप में दखल देंगे। ये सब सिर्फ ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने के लिए सरकारें कर रही हैं। मप्र से लेकर राजस्थान तक की भाजपा सरकार जंगलों से ज्यादा से ज्यादा कमाई करना चाहती है। इन्हें न तो जंगलों की चिंता है और न ही बाघ की। खबर है कि रणथंभौर के नेशनल पार्क को अब साल भर के लिए खोल दिया जाएगा। इसी तरह सतपुड़ा के जंगलों में स्थित मड़ई में मानसून में भी बफर जोन में टूरिस्ट जा सकेंगे। 
जब राजस्थान के ही सरिस्का से बाघों के पूरी तरह गायब होने की खबर आई थी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरिस्का पहुंच गए थे। लेकिन क्या आपको याद है कि देश के वजीरेआजम मोदी या राजस्थान की मुखिया वसुंधरा या फिर मप्र के सीएम शिवराज ने कभी भी बाघों के लिए दो शब्द भी बोला हो? लेकिन उनकी सरकारें लगातार एक के बाद एक ऐसे फैसले करती जा रही हैं, जिससे बाघों के अस्तिव के सामने खतरा मंडरा रहा है। चूंकि सरकारें आंकड़ों की बाजीगरी में उस्ताद होती हैं, तो ह…