3 August 2009

क्या करूँ आती है अब अक्सर तुम्हारी याद

कभी खुशबु सी आती है
तो महक उठतीं हैं यादें
छाजाती है सुनहरी सी

वो एक अक्स उभरता है
ये दिल मशरूफ रहता है उस लम्हे मैं

अभी है वो पास
जैसे कह रहा है कुछ ख़ास
जो कभी कहा था उसने

बस एक एहसास ही है बाकी
जो हर रोज रहता है

है चेहरे पर मेरे ख़ुशी
वही जो तब तुम्हारे चेहरे पर भी थी

है हर वो पल भी इस लम्हे
जो तब जिया था तुम्हारे साथ
क्या करूँ आती है अब अक्सर तुम्हारी याद

2 comments:

चन्दन कुमार said...

behtarin sahab

Roshani said...

ham Ishwar se prarthna karte hain ki vah aapko jald hi mil jaaye.
Good luck and very good poem.