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मनाली और मेरे अनुभव


जब हम हिमाचल की खूबसूरत वादियों में मनाली की फिजा में होते हैं तो जावेद अख्तर का लिखा ये गीत हमेशा हमारी जुबान पर होता है-वो देखो जरा परबतों पे घटाएं, हमारी दास्तान हौले से सुनाए... आपको यकीन ना आए तो इस बार जरा हो के आइए... आप मानेंगे कि हमने गलत नहीं कहा था...

मेरी नजर से मनाली
खूबसूरत वादियां, बर्फ से ढंके पहाड़, उबड़-खाबड़ पथरीले रास्ते, नागिन की तरह बलखाती घाटियां, सड़क के किनारे कभी दाएं तो कभी बाएं बहती खूबसूरत व्यास नदी। हिमाचल की सीमा शुरू होते ही यह किस्सा आपके साथ चलता है। लेकिन लक्ष्य एक ही था कि जल्दी से जल्दी कुल्लू-मनाली पहुंचना है। कुल्लू में घुसते ही दूर खड़े बर्फीले पहाड़ों पर जब नजर पड़ी तो नजरों को यकीन नहीं हुआ। कुल्लू-मनाली यदि आप जाने की कोई योजना बना रहे हैं तो सब कुछ भूलकर ही वहां जाएं। क्योंकि वहां जाने के बाद आप खुद को जन्नत में पाएंगे।

और जब वापस आएंगे तो फिर से खुद को जहन्नुम में पाएंगे। देर शाम जब मैं मनाली पहुंचा तो वहां के बाजार अपने शबाब पर थे। एक छोटा सा कस्बा मनाली दुनियाभर के टूरिस्टों से भरा पड़ा था। हर दुकान पर पर्यटकों की अच्छी खासी भीड़ और सामान खरीदने के लिए मोलभाव करते लोग। दूसरे दिन हमें रोहतांग दर्रा जाना था। लेकिन होटल के मैनेजर ने बताया कि वहां तो बर्फ के कारण पूरा रास्ता बंद है। आप वहां तक तो नहीं लेकिन उसके करीब जरूर जा सकते हैं। ड्राइवर को जगाकर हम सुबह के आठ बजे निकले। बर्फ में मस्ती करने के लिए रास्ते में हमने वहां के लायक कपड़े और चश्मे खरीद लिए थे।

दुकानदारों की नजर हम पर थी और हमारी नजर सामने दूर खड़े हिमालय राज पर। मनाली पहुंचकर लगा कि अब हमें और नहीं चढ़ना पड़ेगा लेकिन आगे और अधिक खतरनाक चढ़ाई थी। हमारा अंतिम पड़ाव था गुलाबा और उसके बाद हमारा सफर घोड़े से था। गुलाबा से करीब छह किलोमीटर दूर बारह मोड़ पर हमें जाना था। यदि आपको जन्नत इस दुनिया पर देखनी है तो मनाली से बेहतर जगह शायद ही दूसरी हो। अब तक सुना था कि दुनिया का स्वर्ग कश्मीर है। कश्मीर तो मैं गया नहीं इसलिए मैंने मनाली को ही अपना स्वर्ग मान लिया।

मनाली का बाजार छोटा सा लेकिन खूबसूरत है। मुख्य मार्ग के किनारों से होते हुए गलियों तक फैले इस बाजार में वह हर चीज आपको मिल जाएगी, जिसे आप अपनों के लिए खरीदना चाहेंगे किसी भी कीमत पर। कुल्लू की प्रसिद्ध शॉल हो या फिर लकड़ी पर की गई कारीगिरी। यदि खाने-पीने के शौकीन हैं तो यह बाजार आपको निराश नहीं करेगा। पहाड़ों पर चढ़कर यदि आप थक गए हैं तो यहां सड़क किनारे आपके पैरों की मालिश के भी इंतजाम हैं, वह भी वाजिब दामों पर। औरों की तरह हमने भी वहां से शॉल, कुल्लू की टोपी, लकड़ी के सामान खरीदे और पैरों की मसाज करवाने से नहीं चूके। वहां सबसे मजेदार छोटे-छोटे गुलाब जामुन की तो बात ही क्या। शायद ये दुनिया के सबसे छोटे गुलाब जामुन थे।

व्यास की कशिश
फिजाओं की कशिश को समझते हुए हिमाचल में बहने वाली नदी व्यास में नहाना न भूलें। इस खूबसूरत नदी के पानी में वह ताजगी है जो आपकी जिंदगी भर की थकान को एक डुबकी में दूर कर सकती है। हमने भी वही किया। दूर से जो नदी मदमस्त बहती दिखती है, पास जाने पर उसका पानी अहसास दिलाता है कि ये सिर्फ खूबसूरत नहीं बल्कि खतरनाक भी है। पैर डालते ही पूरे शरीर में कंपकंपी दौड़ गई। तीन दिन के सफर में यदि हमारा किसी ने सबसे अधिक साथ दिया तो वह थी व्यास नदी और साथ थे हिमाचल के खूबसूूरत विशाल पहाड़।

यादें जो सताती हैं..
हिमाचल की वादियों में पहुंचकर सबसे अधिक यदि आपको किसी की याद आती है तो वह आपके अपनों की। उन रिश्तों की, जिसे आपने खुद चुना है। मनाली की आबोहवा में मैंने बहुत कोशिश की खुद को भुलाने की लेकिन उन रिश्तों को नहीं भुला पाया। जिन्हें मैं अपने पीछे कहीं दूर छोड़ आया था। हर पल, हर दिन ये यादें मुझे परेशान करती रहीं। लेकिन मनाली में ऎसा कुछ नहीं हुआ। मनाली की गलियां हो या बर्फ से ढ़के पहाड़ हर जगह बस यही अहसास सताता रहा कि तुम नहीं तो मैं नहीं, मैं नहीं तो हम नहीं। हम नहीं तो कुछ भी नहीं। अब ऎसे में यदि आप मनाली जाने की सोच रहे हैं तो अपनों को साथ ले जाना न भूलें। वरना मेरी तरह आप भी यादों की गलियों में भटकते रहेंगे। ऎसी यादें जो आपको पूरी तरह परेशान कर देंगी, लेकिन इनसे निकलने का कोई रास्ता आपको नहीं दिखेगा।

जाते-जाते
अब जब मनाली से हम निकल चुके थे तो कुल्लू के एक गांव की बात की जाए तो बेहतर होगा। एक गांव। बीच से इठलाती बहती नदी। सीधे-साधे लोग। लेकिन विदेशियों का जमावड़ा। गांव वाले भी इन्हीं के रंग में रंगे हुए। इजरायल की भाषा हिब्रू हो या फिर फ्रेंच या फिर अंग्रेजी। गांववासियों से ये जुबान सुनी जा सकती है। मैं कसोल गांव की बात कर रहा हूं। कुल्लू में बसे इस गांव को यदि आप धरती का स्वर्ग कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जब हम मनाली से लौटते हुए मणिकरण जा रहे थे तो बीच में पड़े इस गांव को देखकर मेरी आंखे फटी की फटी रह गइंü।

वजह साफ थी। जितने गांव के स्थानीय लोग नहीं, उससे अधिक विदेशियों का जमावड़ा। हर घर, हर होटल में सिर्फ विदेशी मेहमान तो कुछ बरसों से बसे विदेशी। समुद्रतल से 1640 मीटर की ऊंचाई पर बसे इस गांव की कुल्लू से दूरी 42 किमी है तो शिमला से करीब 120 किलोमीटर। यह गांव देखने लायक है।

जब इस बर्फ की जन्नत से जब अपनी दुनिया में लौट रहा था तो जेहन में अजीब की उधेड़बुन चल रही थी। क्या मैं कुछ खो कर जा रहा हूं या बहुत कुछ लेकर जा रहा हूं। इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं था। फिर भी मैं खोजता रहा। दिल्ली से भोपाल के रास्ते आखिर इस सवाल का भी जवाब मिल ही गया। मैं बहुत कुछ लेकर जा रहा था। इस जन्नत की यादों ने पूरी तरह मुझे बदल दिया था।

व्यास ने लगातार मुझे बहना सिखा दिया तो ऊंचे-ऊंचे बर्फ से ढके पहाड़ों ने मुझे आध्यात्म से जोड़ दिया था। वहीं मनाली के लोगों ने मुझे सिखा दिया कि जिंदगी को कैसे जीया जाए। बस अब जाते-जाते इतना ही कहूंगा कि दिल ढूंढ़ता है मनाली के फिर वही फुर्सत के रात-दिन...

Comments

kirti said…
आनन्द आ गया...आप ने मन से लिखा है मनाली पर....हिमाचल यात्रा के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए, हिमाचल्वासियो की तरफ से आप का आभार व्यक्त करता हू.
यह खूबसूरत पोस्ट तो अतीत की सुहानी यादों में ले गई...जब तक इंडिया में थे हर साल कुल्लू मौसी के घर जाया करते...सच है कि जन्नत है कुल्लू मनाली

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