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वे मेरे सामने हैं तो भी अजीब लग रहा

टूटने के बाद फिर से जुड़ना शायद इतना तकलीफदेय नहीं होता है जितना जुड़ने के बाद टूटना। कल शाम अचानक वे मेरे सामने खड़ी थीं। मुझे लगा मैं कोई ख्वाब देख रहा हूं, लेकिन यकीन मानिए यह ख्वाब नहीं सोलह आना सच था। अंतिम बार वे मुझे बोरीवली के स्टेषन पर छोड़कर जयपुर चली गई थीं और मैं मुंबई के उसी स्टेषन पर कई दिनों तक उसका इंतजार करता रहा। लगा था कि जयपुर से आने वाली गाड़ी से वे वापस आएगीं। पहले दिन बीते और फिर महीने। लेकिन वे नहीं आईं। मेरा भी मुंबई छूट गया। मौसम बदलते गए और कैलेंडर के पन्ने। पर वे नहीं आईं। धीरे धीरे मैं भी उन्हें भुलाता गया। लगभग भूला ही दिया था। लेकिन अचानक उन्हें देखकर उनके साथ बिताए गए एक एक पल फिर से मेरे सामने जिंदा हो गए। मैने कभी कभी सोचा भी नहीं था कि वे ऐसे मेरे सामने आएंगी। बोरीवली में जब वे छोड़कर जा रही थीं तो कुछ अजीब सा लग रहा था और जब आज वे मेरे सामने हैं तो भी अजीब लग रहा है।

Comments

बोरीवली में जब वे छोड़कर जा रही थीं तो कुछ अजीब सा लग रहा था और जब आज वे मेरे सामने हैं तो भी अजीब लग रहा है
.......ऐसा ही होता है .........बिल्कुल सही लिखा है।
थोडी देर पहले ही बात हो रही थी कि पोस्ट नही। और फिर पोस्ट भी आ गई अरे वाह। अरे आशीष जी काहे इतना सोचते है जो पल मिले जी लो उसे बस। फिर से वही याद जो शायद पहले भी लिखा था। दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया
मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो दिखा गया।
anitakumar said…
कौन?…।:) अब मिली तो फ़िर बातें क्या हुईं क्या गिले शिकवे हुए या यूंही अजीब महसूस करते रहे और वो फ़िर लौट गयीं
हूं
तो ये मामला है
:)
थोड़ा डिटेल में बताइए जनाब। कहानी तो काफी इंट्रेस्टिंग लग रही है।
mamta said…
अरे आशीष ये क्या अभी भी वहीं पर हो जहाँ कुछ महीने पहले थे । :)
बोरीवली में जब वे छोड़कर जा रही थीं तो कुछ अजीब सा लग रहा था और जब आज वे मेरे सामने हैं तो भी अजीब लग रहा है
.......ऐसा ही होता है ........
बोरीवली से वे जब जयपुर गई तो राजस्‍थान पत्रिका का पोर्टल ज्‍वाइन कर लिया तो क्‍या अब वे भी इंदौर आ गई हैं। कहीं वेबदुनिया पोर्टल में तो नहीं। या फिर तुम्‍हारे साथ भास्‍कर में लेकिन अखबार में नहीं पोर्टल में। अब के संभाल कर रखना....कहीं फिर दिल्‍ली में ढूंढो
Anonymous said…
lut pit ke vapis samne aye to kya hua

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