Skip to main content

UP POLL @ 2017 : यूपी में #BJP की हार में ही है #RSS की जीत

आज फिर से बात उत्तर प्रदेश की। यूपी की बात इस वक्त होगी तो चुनाव का जिक्र भी होगा। जिक्र संघ और भाजपा के साथ नरेंद्र मोदी का भी होगा। चलिए फिर आज हम इन्हीं के बारे में जिक्र करते हैं। भाजपा का यूपी में हारना देश के सबसे बड़े संगठन संघ के लिए रामबाण जैसा होगा। ये हार जहां संघ को फिर से जिंदा करने में मदद करेगी, वहीं प्रचंड बहुमत से सत्ता में आए मोदी एंड टीम पर थोड़ा अंकुश भी लगाएगी। क्योंकि ये पहली दफा है जब केंद्र में तो भाजपा की मजबूत सरकार है लेकिन संघ और उसका एजेंडा कहीं दूर तलक तक नहीं दिखता। संघ की पहचान हमेशा से ऐसे संगठन की रही है जो खुद को सबसे बड़ा राष्ट्रभक्त बताता है और ऐसे मुल्क का ख्वाब देखता है जहां केवल हिंदुओं के लिए स्थान होगा। यानी ऐसे मुल्क में मुसलमानों और उनसे जुड़ी किसी भी चीज के लिए कोई जगह नहीं होगा। लेकिन ये दुर्भाग्य है संघ का कि केंद्र में सत्ता में आने के बाद भाजपा के उसके प्रधानमंत्री एजेंडे से विचलित हो जाते हैं। बात राम मंदिर की हो, गो हत्या की हो या फिर सिविल यूनिफॉर्म कोड की हो। हर बार भाजपा की सरकार ने संघ से केवल वादे किए, लेकिन निभाए कभी नहीं। जबकि संघ का अस्तिव ही इन मुद्दों के कारण है। संघ से जुड़े करोड़ों लोग चाहते हैं कि मुसलमानों को सबक सिखाया जाए। लेकिन सत्ता की मलाई खाने के चक्कर में बेचारे संघी प्रधानमंत्री ये भूल जाते हैं। 

खैर फिर से हम मुद्दे पर लौटते हैं। मोदी के कारण कहीं न कहीं संघ और पूरी भाजपा हाशिए पर चली गई है। हर तरफ जिक्र मोदी और अमित शाह का ही होता है। मोदी तो पार्टी और संघ से बड़े हो चुके हैं। ऐसे में भाजपा के कई नेता और पूरा संघ चाहता है कि मोदी के बढ़ते कद को कम करना जरूरी है। यही कारण है कि यूपी जैसे सबसे महत्वपूर्ण राज्य में हो रहे विधानसभा चुनाव में संघ कहीं दूर तक नहीं दिख रहा है। संघ एक संगठन के तौर पर इस चुनाव से दूरी बना चुका है। क्योंकि उसे पता है कि यदि यूपी में भाजपा जीतती है तो मोदी को संभालना असंभव हो जाएगा। इसलिए यूपी के सिंहासन से भाजपा की दूरी जरूरी है। क्योंकि कई बार चार कदम दौड़ने के लिए दो कदम पीछे भी जाना होता है। संघ भी इस बार इसी सोच के साथ काम कर रहा है। यूपी में इस बार अमित शाह के नेतृत्व में जो टिकट का बंटवारा हुआ है, उससे भी संघ के नेताओं में काफी नाराजगी है। भाजपा ने जीत के लालच में ऐसे नेताओं को टिकट बांटा है, जिनका संघ की विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे में यदि चुनाव में संघ दूरी बनाता है तो भाजपा की हार तय है। ये हार भाजपा के साथ मोदी और अमित शाह के बढ़ते कदमों को भी रोकेगी, लेकिन जीत संघ की होगी। संघ को यदि खुद का अस्तिव बचाए रखना है तो भाजपा को हारना होगा। भाजपा की हार मोदी की हार होगी। 

यदि यूपी चुनाव में भाजपा हारती है तो एक बार फिर से पार्टी पर संघ की पकड़ मजबूत होगी। ऐसा हम नहीं, बल्कि संघ के कई नेता दबी जुबान में ऑफ द रिकॉर्ड मानते भी हैं। फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में संघ मोदी को साइडलाइन कर ऐसे नेता की तलाश करेगा, जो संघ के कंट्रोल में रहे। संघ के एजेंडे को आगे बढ़ाए। खैर, राजनीति में कुछ भी कहना संभव नहीं है। इसलिए बदलते वक्त को देखते रहिए और देखते रहिए कि यूपी में करवट लेता हुआ ऊंट दिल्ली से लेकर नागपुर तक में कहां बैठेगा। 

Comments

Popular posts from this blog

मुंबई का कड़वा सच

मुंबई या‍नि मायानगरी। मुंबई का नाम लेते ही हमारे जेहन में एक उस शहर की तस्‍वीर सामने आती हैं जहां हर रोज लाखों लोग अपने सपनों के संग आते हैं और फिर जी जान से जुट जाते हैं उन सपनों को साकार करने के लिए। मुंबई जानी जाती है कि हमेशा एक जागते हुए शहर में। वो शहर जो कभी नहीं सोता है, मुंबई सिर्फ जगमगाता ही है। लेकिन मुंबई में ही एक और भी दुनिया है जो कि हमें नहीं दिखती है। जी हां मैं बात कर रहा हूं बोरिवली के आसपास के जंगलों में रहने वाले उन आदिवासियों की जो कि पिछले दिनों राष्‍ट्रीय खबर में छाए रहे अपनी गरीबी और तंगहाली को लेकर। आप सोच रहे होंगे कि कंक्रीट के जंगलों में असली जंगल और आदिवासी। दिमाग पर अधिक जोर लगाने का प्रयास करना बेकार है। मुंबई के बोरिवली जहां राजीव गांधी के नाम पर एक राष्ट्रीय पार्क है। इस पार्क में कुछ आदिवासियों के गांव हैं, जो कि सैकड़ो सालों से इन जंगलों में हैं। आज पर्याप्‍त कमाई नहीं हो पाने के कारण इनके बच्‍चे कुपो‍षित हैं, महिलाओं की स्थिति भी कोई खास नहीं है। पार्क में आने वाले जो अपना झूठा खाना फेंक देते हैं, बच्‍चे उन्‍हें खा कर गुजारा कर लेते हैं। आदिवासी आदम...

बेनामी जी आपके लिए

गुजरात में अगले महीने चुनाव है और इसी के साथ भगवा नेकर पहनकर कई सारे लोग बेनामी नाम से ब्लॉग की दुनिया में हंगामा बरपा रहे हैं. एक ऐसे ही बेनामी से मेरा भी पाला पड़ गया. मैं पूरा प्रयास करता हूँ कि जहाँ तक हो इन डरपोक और कायर लोगों से बचा जाए. सुनील ने मोदी और करण थापर को लेकर एक पोस्ट डाल दी और मैं उस पर अपनी राय, बस फिर क्या था. कूद पड़े एक साहेब भगवा नेकर पहन कर बेनामी नाम से. भाई साहब में इतना सा साहस नहीं कि अपने नाम से कुछ लिख सकें. और मुझे ही एक टुच्चे टाईप पत्रकार कह दिया. मन में था कि जवाब नहीं देना है लेकिन साथियों ने कहा कि ऐसे लोगों का जवाब देना जरूरी है. वरना ये लोग फिर बेनामी नाम से उल्टा सुलटा कहेंगे. सबसे पहले बेनामी वाले भाई साहब कि राय.... अपने चैनल के नंगेपन की बात नहीं करेंगे? गाँव के एक लड़के के अन्दर अमेरिकन वैज्ञानिक की आत्मा की कहानी....भूल गए?....चार साल की एक बच्ची के अन्दर कल्पना चावला की आत्मा...भूल गए?...उमा खुराना...भूल गए?....भूत-प्रेत की कहानियाँ...भूल गए?... सीएनएन आपका चैनल है!....आशीष का नाम नहीं सुना भाई हमने कभी...टीवी १८ के बोर्ड में हैं आप?...कौन सा...

प्यार, मोहब्बत और वो

आप यकिन कीजिए मुझे प्यार हो गया है. दिक्कत बस इतनी सी है कि उनकी उमर मुझसे थोडी सी ज्यादा है. मैं २५ बरस का हूँ और उन्होंने ४५ वा बसंत पार किया है. पेशे से वो डाक्टर हैं. इसी शहर में रहती हैं. सोचता हूँ अपनी मोहब्बत का इज़हार कर ही दूँ. लेकिन डर भी सता रहा है. यदि उन्होंने ना कर दिया तो. खैर यह उनका विशेषाधिकार भी है. उनसे पहली मुलाकात एक स्टोरी के चक्कर में हुई थी. शहर में किसी डाक्टर का कमेन्ट चाहिए था. सामने एक अस्पताल दिखा और धुस गया मैं अन्दर. बस वहीं उनसे पहली बार मुलाकात हुई. इसके बाद आए दिन मुलाकातें बढती गई. यकीं मानिये उनका साथ उनकी बातें मुझे शानदार लगती हैं. मैं उनसे मिलने का कोई बहाना नहीं छोड़ता हूँ. अब आप ही बताएं मैं क्या करूँ..