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मैं तुम्हें आज भी चाहता हूं

मैं जब भी उससे बात करता था तो एक बात जो मुझे हमेशा और आज भी सताती है , वो है उसकी खामोशी। मैं कितना बोलता था लेकिन वो कुछ भी नहीं बोलती थी। उसक खामोशी सागर की तरह है। उसकी खामोशी की ही ताकत है कि पूरी रात जागने के बावजूद मैं उसके बारें में लिख पा रहा हूं। सुबह के साढ़े पांच बजे हैं और मैं उसे शिद्दत से महसूस करना चाह रहा हूं। लेकिन मुझे इस बात का इल्म है कि वो करीब नहीं है। मैं इमरोज भी नहीं बन सकता जिसे अमृता प्रीतम से अलग किया जा सके। मैं सिर्फ मैं हूं। लेकिन उसे मैं क्या कहूं ? उसकी मासूमियत ही जो आज भी बांधे रखी हुई है। वरना हम लड़कों की जात तो ऐसी होती है कि तू नहीं तो और कोई। लेकिन मैं आज भी उसकी कमी महसूस कर सकता हूं। उसके साथ मैंने जिंदगी के सबसे बेहतर दिन गुजारे ही नहीं बल्कि जिए हैं। चाहे वे भोपाल के दिन हो या फिर मुंबई के। पिछले कुछ सालों से वे काफी नाराज हैं। उनकी जगह मैं होता तो शायद मैं भी यही करता जो वे कर रही हैं। क...

एक बार फिर भोपाल

लिजिए एक बार फिर भोपाल आ गया हूं। भोपाल में फिर तीसरी बार वापसी हुई है। शुरुआती दौर में लगा कि भोपाल वापसी किस दिशा में जाएगी, पता नहीं था। खैर अब पूरे दो सप्ताह बाद एक बार फिर से भोपाल का मौसम हसीन सा लगने लगा है। रहने के लिए घर का इंतजाम भी हो गया है। जहां मैं अपने पुराने दोस्त के साथ हूं। डच्यूटी रात की है तो दिक्कत की कोई बात नहीं है। दिन में हमारे दोस्त अपनी गाड़ी से आफिस छोड़ देते थे। बस से १क् मिनट में आफिस और फिर खाना-पीना कर रात के नौ बजे से लेकर सुबह के सात बजे तक न्यूज के साथ खेलना। सुबह टहलते हुए सबसे पहले पोहा और चाय का नाश्ता फिर बस पकड़ कर घर की ओर वापसी। जब पूरा देश सोता है तो मेरे जैसे हजारों लोग जागते हैं और जब लोग जागते हैं तो हमारे जैसे लोगों की रात होती है। यही है जिदंगी मेरे भाई। खैर अभी तो ठंड का मजा ले रहा हूं जनाब। दो दिनों में ठंड बढ़ी है और इसी के साथ मौसम भी दमदार हो गया है। शुरू से ही ठंड का मौसम मेरे लिए सबसे प्रिय मौसम रहा है। और जब बात भोपाल की ठंड की हो तो ये सोने पर सुहागा जैसा है। भोपाल की बात की जाए तो आप झीलों की बात न करें? यह कैसे हो सकता है? कल्प...

पत्रकारिता विभाग की भटकती यादें

चार महीने इंदौर में रिपरेटिंग करने के बाद अब मैं फिर से झीलों की नगरी भोपाल में आ चुका है। नई जिम्मेदारियों के साथ नई चुनौतियां भी हैं। जो कि मेरे जैसे लोगों के लिए बहुत जरूरी है। क्योंकि यदि हमारे जैसे लोगों को नया काम, नई चुनौती नहीं दी जाए तो हमारे अंदर कुछ दम तोड़ने लगता है। सात महीने में दो ट्रांसफर के बाद भोपाल आकर अच्छा तो लग रहा है लेकिन यहां की गलियों में भटकते हुए वे पुरानी यादें भटकती आत्मा की तरह मेरा पीछा कर रही हैं। वे मुझे दबोचना चाह रही हैं और मैं बच रहा हूं। यहां के माखन लाल विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में बिताते दो साल मेरे लिए किसी जन्नत के अनुभव से कम नहीं थे। मस्ती की पाठशाला था यह विभाग। समय बदला तो बदल गया विश्वविद्यालय का भवन और बदल गए यहां के स्टूडेंट्स। लेकिन मेरे लिए आज भी कुछ नहीं बदला है। आज भी मैं पूरे अधिकार के साथ नए भवन में जाता हूं और पूरी गर्मजोशी के साथ नए ख्वाब लेकर आए लोगों से मिलता हूं। अच्छा लगता उन लोगों से मिलकर जिनकी आंखों में ख्वाब होता है। कुछ पाने, करने की ललक होती है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि पत्रकारिता विभाग में जो नए...

सपनों को तोड़ने के लिए

कई दिनों बाद कुछ लिखने बैठ रहा हूं। दोस्तों ने कहा कि तेरे मुंबई को फिर से निषाना बनाया गया हूं, कुछ तो लिख। सबसे पहले मैं यह बता दूं कि आंतकवादियों ने नरीमन प्वाइंट के जिस होटल को निषाना बनाया है, उसके आसपास और उससे मेरी जिंदगी में बहुत अहम स्िाान है। खासतौर पर मेरे जैसे हजारों ऐसे लोगों को जिन्हें मुंबई पनाह देता है। घर परिवार से दूर, ऑफिस को तनाव को कम करने के लिए नरीमन प्वाइंट सबसे अहम स्थान है। नरीमन प्वाइंट से मेरी पहली मुलाकात हिंदी फिल्मों से हुई थी। मुंबई जाने से पहले ही मैने तय कर लिया था कि सबसे पहले इसी स्थान पर जाना है। और मैं गया भी। इस जगह से मेरी जो पहली याद जुड़ी है, वह यह है कि तीन साल पहले दीवाली की बात है। घर जा नहीं पाया था। बस फिर क्या था रात के दो तीन बजे तक यहीं आकाष और सागर को देखकर घर की याद से लड़ता रहा। कल जब मुंबई ब्लास्ट के फुटेज देखा तो अचानक मुंबई के उन सभी स्थानों पर बिताए एक एक पल याद आ गए, जहां विस्फोट हुआ था। यह विस्फोट मुंबई या हिंदुस्तान को तबाह करने के लिए नहीं बल्कि मेरे जैसे आम आदमी के सपनों को तोड़ने के लिए किया गया। आम आदमी सपने देखता था, देख रहा...

भोपाल टू जयपुर वाया मुंबई

अक्सर मैं सोचता हूं कि कुछ वक्त निकाल कर कुछ न कुछ लिखा जाए अखबार के अलावा। कई दिनों बाद आज मौका मिल ही गया है। आज पुरानी कहानी को फिर से नए अंदाज में लिखने को दिल कह रहा है। कुछ इस कहानी से बुरी तरह पक जाएंगे तो कुछ कहेंगे आषीष भाई बहुत हुआ। अब तो बंद करो। सभी को बस यही कहना चाहूंगा कि दिल है कि मानता नहीं। खैर अधिक नहीं झेलाते हुए शुरूआत करता हूं। यह कहानी भोपाल में शुरू हुई और शायद जयपुर जाकर खत्म हो चुकी है। शायद। कहते हैं कि प्यार में बड़ी ताकत होती है। सच्चा प्यार आपको जीना सिखाता है और एक तरफा प्यार आपको बर्बाद कर देता है। खैर मुझे नहीं पता कि मैं बर्बाद हुआ या आबाद। मुझे आज भी उसके होंठो का वो तिल बार बार परेषान करता है जो उसके मुस्कुराने के साथ दिखता था। कई साल बीत गए और मैं उसकी मुस्कुराहट को तरस गया हूं। भोपाल से मुंबई हम साथ गए थे। लेकिन मुंबई से हम दोनों का रास्ता अलग हो चुका था। उसने राजस्थान की राजधानी में एक अखबार को ज्वाइन कर लिया था। और मैं भी मुंबई की नौकरी छोड़कर भोपाल का वापस रूख कर लिया था। जितने दिन भी हम साथ थे, वे कम से कम मेरे जीवन के सबसे अच्छे दिनों में से ए...

कुछ खूबसूरत लम्हें

मुंबई लोकल एक प्रेम कथा

यदि आप सोच रहे हैं कि मैं आज कुछ बहुत अधिक लिखने जा लिखने जा रहा हूं तो पूरी तरह गलत हैं। जी हां पूरी तरह गलत। चलिए अब बिना अधिक पकाए हुए कहानी की शुरूआत करता हूं। आप इसे कहानी मान भी सकते हैं और नहीं भी। वह शाम भी अन्य शामों की तरह एक सामान्य शाम थी। लेकिन मुंबई की शाम होने के नाते इसमें थोड़ी सी गरमाहट थी। वो अंधेरी रेलवे स्टेषन के प्लेटफार्म नंबर 4 पर खड़ा बैचेनी से विरार की ओर जाने वाली तेज लोकल का इंतजार कर रहा था। रह रहकर उसकी आंखे महिलाओं के फस्र्ट क्लास डिब्बे के सामने वाली भीड़ पर जा कर जम जा रही थी। वह उसका इंतजार कर रहा था। उसे आप कोई भी नाम दे सकते हैं। इससे न मुझे कोई फर्क पड़ने वाला है और न ही इस कहानी को। अचानक उसकी नजर उस लड़की से मिली और इतने में जोरदार हार्न बजाते हुए 12 डिब्बे वाली लोकल भी आ चुकी थी। उसे घर पहुंचने की जल्दी थी और मुझे भी। मेरा घर उसके स्टेषन से चार स्टेषन आगे था। वह मीरा रोड में रहती थी। उसने किसी तरह अपने बैग को संभालते हुए लोकल में चढ़ने वाली भीड़ का एक हिस्सा बन चुकी थी और मैं भी। लोकल अपनी पूरी गति से भागी जा रही थी। मेरे और उसके डिब्बे को एक जाली जोड़ती...