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वो परी थी

भोपाल आए पूरे दो महीने हो गए. कितनी जल्दी ये समय कटा पता ही नहीं चला. काम और बस काम. बाकी चीजों के लिए समय ही नहीं निकाल पाया. काफी मजा आ रहा है. खासतौर पर उस वकत जब सुबह उठकर अख़बार में अपना नाम पढ़ता हूँ. बायलाइन का अलग नशा है. दिन भर दीमाग खास ख़बर खोजता है किसी भी कीमत पर. कई बार ऐसा भी हुआ है कि जब भी उन सडकों या मोहल्लों से गुजरता हूँ जहाँ कभी उसे देखा था या दो कदम साथ चले थे.तो पुरानी यादें तजा हो जाती हैं. आज भी यहाँ की फिजा में उसे मैं महसूस करता हूँ. वो आसमान से उतरी एक परी थी मेरे लिए. और मैं उसका महाराज.

Comments

Udan Tashtari said…
बड़ी शिद्दत से याद कर रहे हैं..सही है.
pallavi trivedi said…
hmm...feeling nostalgic. it happens friend..
जिंदगी चलने का नाम है यू ही चला चल।
कोई साथ ना हो बैशक। उसकी यादों के सहारे ही चला चल।
मिल जाऐगी वह किसी राह चलते चलते जरा होसला तो रख।
जिंदगी चलने का नाम है यू ही चला चल।
mamta said…
लगता है मौसम बड़ा ही सुहाना है।
कभी उस परी से मिलाइए। :)
poemsnpuja said…
maharaj mein maja nahin aaya...raajkumar hona chahiye pari ka to :)

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दोस्ती और विश्वासघात में अन्तर होता है
यह तो सब जानते हैं
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आपके साथ वो करे
जो दुश्मन भी नहीं करता है
जी हाँ मैं अपने सबसे प्यारे दोस्त की बात कर रहा हूँ
मैंने उसकी दोस्ती को इबारत समझा
और उसने हर मोड़ पर मुझे ठगा
मैं आज भी उसपर विश्वास करना चाहता हूँ
लेकिन करूँ या नहीं करूँ
अजीब सी उलझन है