वे खुश हैं। वजह क्या हो सकती है। क्योंकि वे जिससे नफरत करती हैं वह इनसे बहुत दूर कहीं बैठा हुआ है और वे अपनों के साथ खुष हैं और जिंदगी का भरपूर मजा उठा रही हैं। सुना है आजकल राजस्थान के किसी शहर में हैं। किस शहर में हैं यह नहीं पता। लेकिन फिर भी वह उसकी उस खुषबू को आज भी महसूस कर सकता है जब वे उसके साथ थी। उसके होंठो के तिल को वह आज चूमना चाहता है। दम तोड़ती हसरतों के बावजूद वह आज भी उसे पाना चाहता है। उनकी तलाश में वह पूरी दुनिया भटक रहा है पर वे नहीं मिल पा रही हैं। वे कोई भी हो सकती हैं। वे उप्र के कस्बानुमा शहर की कोई गोरी या फिर मुंबई की कोई हसीना भी हो सकती हैं। कोई भी। जब भी उनकी याद आती है वे उसे याद करके जिंदगी के एक दिन और काट लेता है। यही चल रहा है। कब तक चलेगा पता नहीं।
आशीष महर्षि सतपुड़ा से लेकर रणथंभौर के जंगलों से बुरी खबर आ रही है। आखिर जिस बात का डर था, वही हुआ। इतिहास में पहली बार मानसून में भी बाघों के घरों में इंसान टूरिस्ट के रुप में दखल देंगे। ये सब सिर्फ ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने के लिए सरकारें कर रही हैं। मप्र से लेकर राजस्थान तक की भाजपा सरकार जंगलों से ज्यादा से ज्यादा कमाई करना चाहती है। इन्हें न तो जंगलों की चिंता है और न ही बाघ की। खबर है कि रणथंभौर के नेशनल पार्क को अब साल भर के लिए खोल दिया जाएगा। इसी तरह सतपुड़ा के जंगलों में स्थित मड़ई में मानसून में भी बफर जोन में टूरिस्ट जा सकेंगे। जब राजस्थान के ही सरिस्का से बाघों के पूरी तरह गायब होने की खबर आई थी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरिस्का पहुंच गए थे। लेकिन क्या आपको याद है कि देश के वजीरेआजम मोदी या राजस्थान की मुखिया वसुंधरा या फिर मप्र के सीएम शिवराज ने कभी भी बाघों के लिए दो शब्द भी बोला हो? लेकिन उनकी सरकारें लगातार एक के बाद एक ऐसे फैसले करती जा रही हैं, जिससे बाघों के अस्तिव के सामने खतरा मंडरा रहा है। चूंकि सरकारें आंकड़ों की बाजीगरी में उ...
Comments
मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो दिखा गया
अनुमान लगाना मुश्किल है !!!
-- शास्त्री जे सी फिलिप
-- हिन्दी चिट्ठाकारी के विकास के लिये जरूरी है कि हम सब अपनी टिप्पणियों से एक दूसरे को प्रोत्साहित करें
सच्चे जज्बात भी ठुकरा देते हैं लोग,
क्या देखेंगे दो इंसानों का मिलना,
बैठे हुए दो परिंदों को तो उदा देते हैं लोग...