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जूनून थोडा कम हुआ हैं लेकिन ख़त्म नही

कालेज अब पुराना हो गया हैं लेकिन फिर भी उसकी याद पुरानी नहीं हुई हैं। जेसे कल ही कि तो बात हैं जब मैं कालेज मे था। वो भोपाल का हमारा छोटा लेकिन प्यारा केम्पस और आसपास का अपना सा माहौल। लेकिन अब इन बातों को करीब सवा साल होने को आये हैं। भोपाल के सात नंबर बस स्टाप पर हमारा कालेज हुआ करता था। क्या याद करूं और क्या भूलूं कुछ भी समझ मे नही आ रहा हैं। कालेज के दिनों मे एक जूनून था लेकिन जब मीडिया के फिल्ड मे अन्दर धुसे तो जूनून थोडा कम हो गया हैं लेकिन अभी ख़त्म नही हुआ हैं। सोचा था कुछ करके दिखाएँगे लेकिन अब लगता कि नौकरी कर रहे हैं सिर्फ। बार बार दिमाग मे एक ही सवाल आता हैं कि क्या पत्रकारिता संभव नही रही आज के बाजारवाद के दौर मे। जिसे देखो वहीँ अधिक से अधिक मुनाफा कमाना चाह रहा हैं। ऐसे मे पत्रकारिता कहॉ गुम हो गई।

दिबांग और आजतक

खबर हैं कि दिबांग (यदि आप दिबांग को नहीं जानते हैं तो यह खबर आपके लिए नही हैं) इन दिनों लंबी छुट्टी पर हैं और जल्दी ही सबसे तेज चैनल आजतक मे कदम रखने वाले हैं। खबर कितनी सच हैं अभी यह कहना सही नहीं होगा लेकिन देल्ही और बोम्बे के मीडिया जगत मे यह चर्चा आम है। कुछ दिनों पहले खबर आई थी कि दिबांग को एनडीटीवी से हटा दिया गया हैं। जिसके बाद वोह लंबी छुट्टी पर चले गए हैं। लेकिन इस संभावना से इंकार नही किया जा सकता हैं कि उन्होने आजतक का साथ पकड़ लिया हो।

खलनायक हैं ठाकरे; मोदी और संजय गाँधी

शिवसेना ने एक बार फिर से साबित कर दी कि यदि किसी ने भी सच बोलने का प्रयास किया तो उसे हिंसक तरीके से कुचल दिया जाएगा। परसों भी बोम्बे मे यही देखने को मिला जब शिवसेना ने हिंदी पत्रिका आउटलुक के ऑफिस मे धुस कर जमकर हंगामा मचाया। शिवसेना का कहना कि आउटलुक ने बाला साहेब को ६० सालो का खलनायक कहा है। ठाकरे के अलावा इस लिस्ट में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और संजय गाँधी जेसे नेताओं का भी नाम हैं। क्या आउटलुक ने गलत कहा। आउटलुक ने वही कहा जो कि हैं। ठाकरे ने आमची मुम्बई के नाम पर कितनी राजनीती की हैं यह सब जानते हैं। मुम्बई मे आज भी शिवसेना का तांडव जारी हैं। जिसका खामियाज़ा उत्तर परदेश और बिहार के लोगों को उठाना पड़ता हैं।

मेरे लिए पत्रकारिता की पाठशाला हैं पी साईनाथ

देश के जाने माने पत्रकार पी साईनाथ को मैग्‍ससे पुरस्‍कार मिलना यह स‍ाबित करता है कि देश में आज भी अच्‍छे पत्रकारों की जरुरत है। वरना वैश्विककरण और बाजारु पत्रकारिता में अच्‍छी आवाज की कमी काफी खलती है। लेकिन साईनाथ जी को पुरस्‍कार मिलना एक सार्थक कदम है। देश में कई सालों बाद किसी पत्रकार को यह पुरस्‍कार मिला है। साईनाथ जी से मेरे पहली मुलाकात उस वक्‍त हुई थी जब मैं जयपुर में रह कर अपनी पढ़ाई कर रहा था। पढ़ाई के अलावा मैं वहां के कई जनआंदोलन से भी जुड़ा था। पी साईनाथ्‍ा जी भी उसी दौरान जयपुर आए हुए थे। कई दिनों तक हम लोग साथ थे। उस दौरान काफी कुछ सीखने को मिला था उनसे। मुझे याद है कि मै और मेरे एक दोस्‍त ने साईनाथ जी को राजधानी के युवा पत्रकारों से मिलाने के लिए प्रेस क्‍लब में एक बैठक करना चाह रहे थे। लेकिन इसे जयपुर का दुभाग्‍य ही कहेंगे कि वहां के पत्रकारों की आपसी राजनीति के कारण हमें प्रेस क्‍लब नहीं मिला। लेकिन हम सबने बैठक की। प्रेस क्‍लब के पास ही एक सेंट्रल पार्क है जहां हम लोग काफी देर तक देश विदेश के मुददों से लेकर पत्रकारिता के भविष्‍य तक पर बतियाते रहे। उस समय साईनाथ किसी स...

Teej- Jaipur's most beautiful festival

Today I would like to share with you about Jaipur's most beautiful festival. Yes, I am talking about Teej. When I was studying and working simultaneously with a daily newspaper in Jaipur, I got the opportunity to participate in this colourfull festival. I was covering this festival for my readers. I remember how I saw a number of decorated elephants, horses and camels that were a part of this beautiful festival. Teej is one of the most widely celebrated festivals of the Pink city. Swings, traditional songs and dancing are the unique features of Teej celebrations in Jaipur. Women perform traditional folk dance dressed in green colored clothes and sing beautiful Teej songs while enjoying their sway on swings bedecked with flowers. Teej is celebrated with immense fanfare in the capital city of Rajasthan, jaipur. On this day, women and young girls wear their best clothes and adorn themselves with fine jewelry. They gather at a nearby temple or a common place and offers prayers to G...

मुंबई का कड़वा सच

मुंबई या‍नि मायानगरी। मुंबई का नाम लेते ही हमारे जेहन में एक उस शहर की तस्‍वीर सामने आती हैं जहां हर रोज लाखों लोग अपने सपनों के संग आते हैं और फिर जी जान से जुट जाते हैं उन सपनों को साकार करने के लिए। मुंबई जानी जाती है कि हमेशा एक जागते हुए शहर में। वो शहर जो कभी नहीं सोता है, मुंबई सिर्फ जगमगाता ही है। लेकिन मुंबई में ही एक और भी दुनिया है जो कि हमें नहीं दिखती है। जी हां मैं बात कर रहा हूं बोरिवली के आसपास के जंगलों में रहने वाले उन आदिवासियों की जो कि पिछले दिनों राष्‍ट्रीय खबर में छाए रहे अपनी गरीबी और तंगहाली को लेकर। आप सोच रहे होंगे कि कंक्रीट के जंगलों में असली जंगल और आदिवासी। दिमाग पर अधिक जोर लगाने का प्रयास करना बेकार है। मुंबई के बोरिवली जहां राजीव गांधी के नाम पर एक राष्ट्रीय पार्क है। इस पार्क में कुछ आदिवासियों के गांव हैं, जो कि सैकड़ो सालों से इन जंगलों में हैं। आज पर्याप्‍त कमाई नहीं हो पाने के कारण इनके बच्‍चे कुपो‍षित हैं, महिलाओं की स्थिति भी कोई खास नहीं है। पार्क में आने वाले जो अपना झूठा खाना फेंक देते हैं, बच्‍चे उन्‍हें खा कर गुजारा कर लेते हैं। आदिवासी आदम...

एक बार फिर से न्‍याय की जीत हुई

अंतत डॉक्‍टर हनीफ को छोड़ दिया गया। इसी के साथ एक बार फिर से न्‍याय की जीत हुई। लेकिन यह तमाशा है उन लोगों के लिए जो किसी एक विशेष धर्म और जाति को लेकर देश दुनिया में जहर फैलाते हैं। अक्‍सर जब भी आंत‍कवाद और आंतकवादियों की बात होती है तो सबसे पहले नाम इस्‍लाम और मुसलमानों का लिया जाता है। कहा जाता है कि हर आंतकवादी मुसलमान होता है। लेकिन इन नासमझों को कौन बताए कि आंतकवाद को किसी भी धर्म से जोड़कर नहीं देखा जा सकता है। यदि ऐसा किया गया तो प्रवीण्‍ा भाई तोगडिया की विहिप से लेकर मोदी की भाजपा तक आंतकवाद का एक उदाहरण होंगी। क्‍या हम बाबरी मस्जिद और गुजरात नरसंहार 2002 को भूला दें। जहां मुसलमानों के साथ हिन्‍दूओं का भी कत्‍लेआम हुआ था। भारत के पूर्वी हिस्‍से से लेकर दक्षिण तक जो चल रहा है उसमें मुसलमान तो नहीं हैं। क्‍या हम लिटटे को भूल गए हैं। क्‍या हम उल्‍फा को भूल गए हैं। भारत की इं‍दिरा गांधी और राजीव गांधी को मारने वाले मुसलमान नहीं थे। गांधी बाबा की हत्‍या को हम कैसे भूल सकते है। इसमें कहीं भी इस्‍लाम और मुसलमान नहीं थे। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि हनीफ को आस्‍ट्रेलिया पु...