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मीडिया - मैसेज - सेक्स

उन दोनों की मुलाकात हुए कुछेक ही महीने हुए थे। लेकिन इन कुछेक महीनों में वे कुछ अधिक करीब आ गए थे। लड़की यूनिवर्सिटी में पढ़ती थी तो लड़का वहां ग्रेड टू का कर्मचारी था। उसकी डच्यूटी यूनिवर्सिटी की लायब्रेरी में थी। जहां वह अक्सर किताबों के बहाने उसे देखने के लिए आती रहती थी। लायब्रेरी की रैक से किताबें निकलती थीं। पन्ने पलटे जाए जाते थे। लेकिन नजरे सामने बैठे उस ग्रेेड टू के कर्मचारी पर होती थी। वह कर्मचारी भी उसके आने के बाद कुछ अधिक ही सक्रिय हो जाता था। स्टूडेंट्स को लेकर चपरासी पर रौब झाड़ने का कोई मौका वह नहीं छोड़ता था। वे दोनों एक दूसरे की जरूरतों को पूरा कर रहे थे। बसंत के बाद यूनिवर्सिटी में नया बैच आया। वह अब सीनियर्स बन गई थी। लेकिन वह लड़का अभी सेकेंड ग्रेड का ही कर्मचारी था। नए बैच में कुछ खूबसूरत लड़कियों के साथ कुछ पैसे वाले लड़के तो कुछ गांव से पहली बार निकले लड़के भी आए थे। बंसत के साथ अब सबकुछ बदल गया था। अब सेकेंड ग्रेड का कर्मचारी और उस लड़की में कुछ भी पहले जैसा नहीं था। स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही थी। कल तक जिस लड़की को वह अपनी सेकेंड हैंड स्कूटर पर बैठाकर उसके घ...

वह लगातार रोए जा रही थी..

वो लगातार रोई जा रही थी। विदाई की बेला में वैसे भी रोना लड़की के चरित्र के लिए उसके समाज में अच्छा माना जाता है। पिछली जनवरी में जब उसके पड़ोसी शर्मा जी की बेटी हंसते हुए विदा हुई थी तो कई दिनों तक उसकी हंसी चाची-मौसी के लिए चर्चा का विषय बनी रही थी। लेकिन वह लगातार रो रही थी। उसके रोने में अजीब सा कुछ था। जो केवल वही महसूस कर सकता था जो कि कहीं दूर बैठा उसका इंतजार कर रहा था। वह कभी अपनी मां से लिपट कर रो रही थी तो कभी अपने छोटे भाई से। बाप के पास भी गई थी रोने के लिए। बाप की आंखों में आंसू के दो बूंद तो जरूर थे। लेकिन वह दहाड़ मार कर रो रही थी। कार का दरवाजा खोला जा चुका था। अपने पति और ननद केसाथ वह अंदर बैठ चुकी थी लेकिन उसका रोना थमने का नाम ही नहीं ले रहा था। वह लगातार रो रही थी। सुबह के वक्त जब वह अपने पति के लिए चाय बनाने के लिए उठी तो न जाने क्यों मन हुआ कि जाकर अखबार भी ले आया जाए। अखबार से उसका कुछ खास लगाव था। उसका वह भी एक अखबार में ही तो काम करता था। उसके घर आने वाला अखबार भी वही अखबार था जहां उसका प्रेमी काम करता था। अखबार के एक कोने में आज एक छोटी सी खबर थी। उस अखबार के...

क्या एनजीओ वाली लड़कियां बड़ी चालाक होती हैं?

बेटा ये एनजीओ वाली लड़किया बड़ी चालाक होती हैं। जरा बच कर रहना है। यह चेतावनी मुझे पिछले दिनों मिली है। चेतावनी देने वाली हमारी नई मकान मालकिन हैं। भोपाल के शाहपुरा का यह घर है फिलहाल पर है। एंडवास किराया लेने के बाद हमारी मकान मालिक ने जब मुझे चेताते हुए एनजीओ वाली चेतावनी दी थी तो मुझे मुस्कुराना पड़ा। इसकी भी वजह थी। वजह यह थी कि राजस्थान में कई साल जन आंदोलन को देने के साथ मैने एनजीओ को बड़े करीब से देखा है। एनजीओ वाली लड़किया चालाक नहीं बल्कि अपने अधिकारों को लेकर जागरुक रहती हैं। बस यही बात मकान मालिकन को अटक रही है। खैर आशंका है कि कुछ दिनों बाद एनजीओ वाली लड़कियों को मकान छोड़ना पड़ सकता है। क्योंकि वे बहुत चालाक होती हैं। मसक कली मटक कली बॉलीवुड में प्रयोग तो आए दिन होते रहते हैं। लेकिन इन दिनों जो प्रयोग हो रहे हैं वे वाकई शानदार हैं। जरा दिल्ली -६ फिल्म को ही देख लिजीए। फिल्म के सभी गाने दिल को छुने वाले हैं। इस फिल्म का अधिकांश हिस्सा जयपुर के पास सांभर कस्बे में फिल्माया गया है। निर्देशक से लेकर पूरी टीम तक ने सांभर को चांदनी चौक में तब्दील करने में कोई कमी नहीं रखी है। खै...

बिल्लू भिया को,मुंगेर सरपंच का सलाम कबूल हो

अभी ऑफिस पहुंच कर जैसे ही कम्प्यूटर ऑन किया तो शांतनु का ई मेल आया हुआ था। खोल कर पढ़ने लगा तो तनाव के माहौल में भी मुस्कुराना पड़ा। क्यों? इसके लिए तो आपको नीचे मूंगेर का वह पत्र पढ़ना पढ़ेगा जो बिल गेट्स साहेब को लिखा गया है। पढ़िए और बताएं कि आपको हंसी आई या नहीं? जय हो॥ बिल गेट्स को शिकायती पत्र (Complaint to Bill Gates) आदरणीय बिल्लू भिया को, इंडिया से मुंगेर सरपंच का सलाम कबूल हो... आपके देश के एक और बिल्लू भिया (बतावत रहें कि प्रेसीडेंटवा रहे) ऊ भी इस पंचायत को एक ठो कम्प्यूटर दे गये हैं । अब हमरे गाँव में थोडा-बहुत हमही पढे-लिखे हैं तो कम्प्यूटर को हम घर पर ही रख लिये हैं । ई चिट्ठी हम आपको इसलिये लिख रहे हैं कि उसमें बहुत सी खराबी हैं (लगता है खराब सा कम्प्यूटर हमें पकडा़ई दिये हैं), ढेर सारी "प्राबलम" में से कुछ नीचे लिख रहे हैं, उसका उपाय बताईये - - जब भी हम इंटरनेट चालू करने के लिये पासवर्ड डालते हैं तो हमेशा ******** यही लिखा आता है, जबकि हमारा पासवर्ड तो "चमेली" है... बहुत अच्छी लडकी है...। - जब हम shut down का बटन दबाते हैं, तो कोई बटन काम नही करता...

ये बातें झूठी बातें हैं

उसे देर रात सिगरेट की तलब ने बैचेन कर दिया था। घड़ी रात के दो बजा रही थी। उसे पता था कि ऑफिस के पास के मॉल के पास में जो गुमटी हैं, वहां सिगरेट मिल सकती है। बस दुकानदार को जगाना पड़ेगा जो कि काफी बुगरुज हैं। लेकिन उसके पास कोई विकल्प नहीं था। जैकेट और मोबाइल लेकर जैसे ही बाहर निकला तो खाली सड़कें डरावनी लग रही थीं लेकिन उसे पता है कि कभी इन्हीं सड़कों पर वह भी धूमा करती थी। अरे यह क्या? उसने तय किया था कि वह कभी भी उसे याद नहीं करेगा। लेकिन अचानक उसे एक बिसरी हुई याद आती है। देखते देखते ये यादंे वीरान सड़कों पर उतर आती हैं। वह उसे देख सकता था। उसके होंठों के तिल को भी। जबकि चारों ओर स्याह अंधेरा था। लेकिन फिर भी वह उसे देख सकता था। वह उसे पुकारना चाहता है लेकिन आवाज नहीं निकलती है। अचानक हवा के झोंके के साथ वह वापस लौट आता है। सामने ही गुमटी थी जहां से उसे सिगरेट लेना था। शुक्र है उसे सिगरेट मिल भी गई। सिगरेट लेने के बाद वह उसे मुंह में लगाकर जलाता है। और फिर वह तीन साल पहले उसी शहर में लौट आता है जहां से उसने पढ़ाई की थी। वह उसे आज भी बहुत याद करता है। याद ही नहीं बल्कि चाहता भी बहुत...

मैं तुम्हें आज भी चाहता हूं

मैं जब भी उससे बात करता था तो एक बात जो मुझे हमेशा और आज भी सताती है , वो है उसकी खामोशी। मैं कितना बोलता था लेकिन वो कुछ भी नहीं बोलती थी। उसक खामोशी सागर की तरह है। उसकी खामोशी की ही ताकत है कि पूरी रात जागने के बावजूद मैं उसके बारें में लिख पा रहा हूं। सुबह के साढ़े पांच बजे हैं और मैं उसे शिद्दत से महसूस करना चाह रहा हूं। लेकिन मुझे इस बात का इल्म है कि वो करीब नहीं है। मैं इमरोज भी नहीं बन सकता जिसे अमृता प्रीतम से अलग किया जा सके। मैं सिर्फ मैं हूं। लेकिन उसे मैं क्या कहूं ? उसकी मासूमियत ही जो आज भी बांधे रखी हुई है। वरना हम लड़कों की जात तो ऐसी होती है कि तू नहीं तो और कोई। लेकिन मैं आज भी उसकी कमी महसूस कर सकता हूं। उसके साथ मैंने जिंदगी के सबसे बेहतर दिन गुजारे ही नहीं बल्कि जिए हैं। चाहे वे भोपाल के दिन हो या फिर मुंबई के। पिछले कुछ सालों से वे काफी नाराज हैं। उनकी जगह मैं होता तो शायद मैं भी यही करता जो वे कर रही हैं। क...

एक बार फिर भोपाल

लिजिए एक बार फिर भोपाल आ गया हूं। भोपाल में फिर तीसरी बार वापसी हुई है। शुरुआती दौर में लगा कि भोपाल वापसी किस दिशा में जाएगी, पता नहीं था। खैर अब पूरे दो सप्ताह बाद एक बार फिर से भोपाल का मौसम हसीन सा लगने लगा है। रहने के लिए घर का इंतजाम भी हो गया है। जहां मैं अपने पुराने दोस्त के साथ हूं। डच्यूटी रात की है तो दिक्कत की कोई बात नहीं है। दिन में हमारे दोस्त अपनी गाड़ी से आफिस छोड़ देते थे। बस से १क् मिनट में आफिस और फिर खाना-पीना कर रात के नौ बजे से लेकर सुबह के सात बजे तक न्यूज के साथ खेलना। सुबह टहलते हुए सबसे पहले पोहा और चाय का नाश्ता फिर बस पकड़ कर घर की ओर वापसी। जब पूरा देश सोता है तो मेरे जैसे हजारों लोग जागते हैं और जब लोग जागते हैं तो हमारे जैसे लोगों की रात होती है। यही है जिदंगी मेरे भाई। खैर अभी तो ठंड का मजा ले रहा हूं जनाब। दो दिनों में ठंड बढ़ी है और इसी के साथ मौसम भी दमदार हो गया है। शुरू से ही ठंड का मौसम मेरे लिए सबसे प्रिय मौसम रहा है। और जब बात भोपाल की ठंड की हो तो ये सोने पर सुहागा जैसा है। भोपाल की बात की जाए तो आप झीलों की बात न करें? यह कैसे हो सकता है? कल्प...