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तू जब से गया है मुझे छोड़कर

तू जब से गया है मुझे छोड़कर मैं ऐसा तन्हा हुआ कि अब तो लगता है जीना भी क्या जीना है लेकिन फिर भी जीना होगा वादा जो तुझसे किया है, निभाना होगा मौत को आगोश में लेकर तुझे भूलना चाहता हूं पर कम्बख्त मौत भी बेवफा निकली जिंदगी ने थामा दामन पर मौत भी दरवाजे पर खड़ी है अब फैसला तुझे करना है मौत और जिंदगी के दरम्यिान

कुछ वक्त पहले मैं ऐसा नहीं था

कुछ वक्त पहले मैं ऐसा नहीं था आज भी मैं वैसा नहीं हूं मै कैसा हूं, क्यूं हूं, मुझे खुद भी नहीं पता मै कौन हूं और क्यों हूं तुम्हे तो पता था लेकिन तुमने बताया क्यों नहीं ? अच्छा हुआ नहीं बताया यदि तुम बताती तो शायद मुझे तकलीफ होती लेकिन क्यों नहीं बताया? यदि बता देती तो शायद मै ऐसा नहीं होता जैसा मैं हूं, फिर भी मैं हूं

भाई साहब उसकी शादी हो गई

भाई साहब जिंदगी में कुछ भी आसानी नहीं मिलता। पता है, तो इसमें बताने की क्या बात है? नहीं, मुझे लगा आपको पता नहीं होगा। क्यों अपने आपको बहुत होशियार समझते हो? अरे भाई साहब आप तो नाराज हो गए। अरे यार नाराज होने की बात ही है। खैर कैसे आना हुआ? कुछ नहीं, बस इधर से गुजर रहा था तो कदम आपके घर की ओर मुड़ गए। अच्छा आपको कुछ पता चला? क्या.. आपको नहीं पता? अरे नहीं यार..क्या हुआ? भाई साहब पाखी की शादी हो गई। क्या.....कब ? इसमें बाद कमरे में काफी देर तक शांति हो गई। जैसे घर में मातम हो और किसी की मौत हो गई है। जवाब आज तक नहीं मिला।

राजमाता गायत्री देवी से वह पहली और अंतिम मुलाकात

पिछले कुछ समय से देश-विदेश की मीडिया में जयपुर की पूर्व राजमाता सुर्खियों में बनी हुई हैं। उनकी खासियत कम उनसे जुड़े विवादों को लेकर वे अधिक चर्चा में हैं। अब सबकी नजर उनकी एक हजार करोड़ रूपए की वसीयत पर है। फिलहाल यह वसीयत किस किस को मिलेगी, कहना आसान नहीं है। लेकिन आज बात उनकी वसीयत की नहीं। वो भले ही लोगों के लिए पूर्व राजमाता रही हों लेकिन मुझ जैसे लोगों के लिए वो हमेशा न सिर्फ जयपुर की राजमाता रहीं, बल्कि कहीं न कहीं वो मुझे खुद की राजमाता लगती थीं। जयपुर में जिन लोगों ने कुछ साल भी गुजारे हैं, वे इस बात को अच्छी तरह समझ सकते हैं। गायत्री देवी और जयपुर को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है। राजमाता से मेरी पहली और आखिरी मुलाकात आज से करीब छह साल पहले हुई थी। उस वक्त मैं बीकॉम फाइनल की पढ़ाई खत्म कर जयपुर के एक स्थानीय अखबार के लिए काम करता था। उसी वक्त जयपुर के फेमस होटल रामबाग पैलेस में एक कार्यक्रम के दौरान राजमाता से मुलाकात हुई। अब तक उनके बारे में सिर्फ पढ़ा और सुना ही था। लेकिन जैसे ही उन्हें मैने गलियारे से आते देखा तो मेरी आंखें खुली की खुली रह गईं। यह किसी ख्वाब के सच ह...

क्या करूँ आती है अब अक्सर तुम्हारी याद

कभी खुशबु सी आती है तो महक उठतीं हैं यादें छाजाती है सुनहरी सी वो एक अक्स उभरता है ये दिल मशरूफ रहता है उस लम्हे मैं अभी है वो पास जैसे कह रहा है कुछ ख़ास जो कभी कहा था उसने बस एक एहसास ही है बाकी जो हर रोज रहता है है चेहरे पर मेरे ख़ुशी वही जो तब तुम्हारे चेहरे पर भी थी है हर वो पल भी इस लम्हे जो तब जिया था तुम्हारे साथ क्या करूँ आती है अब अक्सर तुम्हारी याद

ये डीग्री भी लेलो, ये नौकरी भी लेलो,

ये डीग्री भी लेलो, ये नौकरी भी लेलो, भले छीन लो मुझसे USA का विसा मगर मुझको लौटा दो वो क्वालेज का कन्टीन, वो चाय का पानी, वो तीखा समोसा.......... कडी धूप मे अपने घर से निकलना, वो प्रोजेक्ट की खातीर शहर भर भटकना, वो लेक्चर मे दोस्तों की प्रोक्झी लगाना, वो सर को चीढाना ,वो एरोप्लेन उडाना, वो सबमीशन की रातों को जागना जगाना, वो ओरल्स की कहानी, वो प्रक्टीकल का किस्सा..... बीमारी का कारण दे के टाईम बढाना, वो दुसरों के Assignments को अपना बनाना, वो सेमीनार के दिन पैरो का छटपटाना, वो WorkShop मे दिन रात पसीना बहाना, वो Exam के दिन का बेचैन माहौल, पर वो मा का विश्वास - टीचर का भरोसा..... वो पेडो के नीचे गप्पे लडाना, वो रातों मे Assignments Sheets बनाना, वो Exams के आखरी दिन Theater मे जाना, वो भोले से फ़्रेशर्स को हमेशा सताना, Without any reason, Common Off पे जाना,

वह सोना चाहता है लेकिन नींद उसकी नीली आंखों से काफी दूर है...

वह लगातार कई दिनों से सोना चाह रहा था। लेकिन नींद थी, जो आने का नाम ही नहीं ले रही थी। उसकी आंखे तो भारी होती पर हो सो नहीं पाता था। हाथ-पांव के नाखून भी बढ़ चुके थे। इससे नहाने की उम्मीद करना रेत में पानी ढूंढने के समान था। फिर भी कुछ लोग उससे उम्मीद करते थे अच्छा बनने की। वह जी रहा था। क्यों जी रहा था, यह न उसे पता था और न उसके आसपास के लोगों को। यह अलग बात थी कि उसके आसपास ऐसा कोई नहीं बचा था जिससे वह अपने दिल की बात कर सके। लेकिन आज से कुछ शताब्दी पहले तक ऐसा नहीं था। बात उस समय की है जब उस शहर में मॉल नहीं आए थे। शॉपिंग साप्ताहिक हॉट में हुआ करती थी। महिलाएं तो सड़क पर ना के बराबर निकलती थीं और सड़कों पर, जहां आज मर्सिडिज और नैनो दौड़ती हैं, वहां सिर्फ ऊंट, हाथी और घोड़े ही थे। शताब्दी बदली तो सबकुछ बदला। उस जमाने में लोग एक-दूसरे के लिए जीते और मरते थे। आज भी जीते और मरते हैं पर किसके लिए। वह भी किसी के लिए जीना और मरना चाहता था लेकिन यह लंबी दास्तान बन गई। सुना था वह भी किसी के लिए जीती और मरती थी। लेकिन यह क्या अब वह उसके लिए नहीं और किसी के लिए जीने-मरने की बात करने लगी है। शह...