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रेगिस्तान और वो : बंजर जमीं इंतजार की- भाग तीन

हवा में एक अजीब सी खामोशी थी। उमस भरे इस माहौल में काफी देर तक दोनों बैठे रहे। उसी वक्‍त अचानक जोर जोर से आंधिया चलने लगी। उमस भरा वातावरण अब आंधियों और तुफान में बदल चुका था। हर तरफ हाहाकार मच गया। मचना भी था। आखिर क्‍यों नहीं मचता ? इस बार भी आखिर वही हुआ जो कि इस देश में और पूरी दुनिया में हजारों सालों से होता आ रहा है। एक बार फिर धर्म के नाम पर एक को मार डाला गया। और सिर्फ धर्म के नाम पर नहीं बल्कि प्रेम के नाम पर। आसमान में काले बादल और बस आंधी ही आ‍ंधी। जल्‍दी ही सब कुछ पहले की तरह हो गया।

इस बात को करीब बाईस साल होने को आए। यह बताते बताते अमित की आंखें गिली हो रही थी। उसमें इतना साहस नहीं बचा था कि आगे की कहानी या कहें या घटना को अपनी उन्‍नीस वर्षीय बेटी को बता सके। लेकिन बताना भी जरुरी थी। हां बताना भी जरुरी थी। आखिर उसकी बेटी को यह हक है कि उसका नाम क्‍यूं परुनिशा रखा गया। हिन्‍दू होते हुए मुस्लिम नाम?

काफी रात हो चुकी है। परुनिशा को सुबह जल्‍दी कालेज भी जाना होता। ऐसे में अमित और आगे की कहानी आज उसे नहीं सुना सकता था। दोनों अपने कमरों में चले जाते हैं।
गुड नाइट पापा। यह परुनिशा की लेकिन उसकी आवाज काफी भारी थी।
अमित बस इतना ही कह पाता......गुड नाइट बेटा

बिस्‍तर पर पड़ते ही अमित की आंखों में एक बार फिर वो दिन वापस लौट आए जब वह पहली बार उस परुनिशा से मिला था जिसके नाम पर उसने अपनी बेटी का नाम रखा।

शायद जून महीने की बात थी। जब दोनों अपने अपने शहरों को छोड़कर सुखद भविष्‍य की तलाश में पहले एक साथ कालेज में पढते हुए बड़े हुए और फिर बाद में एक ही शहर में नौकरी करने लगे। अमित ने अपने कैरियर की शुरुआत मुंबई से निकलने वाले एक छोटे से अखबार से शुरुआत की तो परुनिशा एक समाचार चैनल में एंकर बनी।


जारी .......

Comments

Udan Tashtari said…
बहुत उम्दा और बेहतरीन कहानी रही हर किश्त में. ऐसा लगा कि और चलती तो और मजा आता.

प्रभावशाली लेखन है, बधाई. और कहानियां लाईये ऐसी ही.
मर्मस्पर्शी ! आगे की कथा जानने की उत्सुकता है. इंतज़ार मे !!

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