आईबीएन7 और नेटवर्क 18 से जुड़े राजदीप सरदेसाई को आज पदम श्री अवार्ड से नवाजा गया। राजदीप सरदेसाई के अलावा एनडीटीवी की बरखा दत्त और विनोद दुआ को भी इस अवार्ड से नवाजा गया है।
किसी ने कहा है कि सबको वह नहीं मिलता है, जो वह चाहता है लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं है..क्योंकि मुझे इस जिंदगी से कुछ चाहिए ही नहीं। लिखता हूं, पढ़ता हूं, आवारागर्दी करता हूं।
25 January 2008
राजदीप सर बधाई
आईबीएन7 और नेटवर्क 18 से जुड़े राजदीप सरदेसाई को आज पदम श्री अवार्ड से नवाजा गया। राजदीप सरदेसाई के अलावा एनडीटीवी की बरखा दत्त और विनोद दुआ को भी इस अवार्ड से नवाजा गया है।
24 January 2008
कविता या कूड़ा
23 January 2008
ब्लॉग की दुनिया में एक और ब्लॉगर
मेरे एक और दोस्त ने आखिरकार ब्लॉग की दुनिया में कदम रख ही दिया। कानपुर के बिंदकी नामक कस्बे के निवासी नमित से मेरी दोस्ती कालेज के जमाने की है। नमित फिलहाल छत्तीसगढ़ भास्कर में कार्यरत हैं। नमित और मैने एक साथ माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता संस्थान से मास्टर डिग्री हासिल की है। दोस्तों की मंडली में ददा के नाम से प्रसिद्व नमित के ब्लॉग का लिंक यहां है। आप सभी से निवदेन है ब्लॉग की इस दुनिया में उसका स्वागत करें।21 January 2008
मुंबई की गुलाबी ठंड और शेयर मार्केट की ठंडक
मुंबई में दो दिन से पड़ रही गुलाबी ठंड ने शहर का मिजाज थोड़ा और रंगीन बना दिया है। मुंबई की लोकल ट्रेन से लेकर चौपटी तक पर इस ठंड का असर देखा जा सकता है। एक दूसरे के हाथों में हाथ डाले मुंबई के नौजवान इन दिनों इस ठंड का भरपूर मजा उठा रहे हैं। लेकिन यह बात केवल इस शहर के युवाओं पर ही लागू नहीं होती है। जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़े बुर्जुगों का भी यही हाल है। समुंद किनारे इनकी संख्या भी कम नहीं है। पूरे बिंदास और नई ताजगी के संग इन बुर्जुगों को जिंदगी का मजा लेते अच्छे अच्छे युवा चकरा जाएं। 
कल की मैराथन, मोहरम और मोदी के भाषण के बाद एक बार फिर शहर भागने को तैयार है लेकिन बुरा हो शेयर बाजार का, जिसकी भारी गिरावट से शहर को थोड़ा हिला दिया। इसका सबसे अधिक असर लोकल ट्रेन में देखने को मिलेगा। खासतौर पर विरार लोकल में। इस रुट पर पड़ने वाले भायंदर और वसई रोड स्टेशन पर गुजरातियों के साथ मारवाडियों की तादाद बहुत अधिक है और शेयर बाजार में भी इनकी भागीदारी सबसे अधिक है।
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मुंबई डायरी
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गुजरात का शेर मुंबई में दहाड़ा
मुंबई के प्रसिद्व शिवाजी पार्क को जाने वाली हर सड़क कल भगवे रंग में नजर आ रही थी। मौका था गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के सम्मान समारोह के बहाने महाराष्ट्र में भाजपा में नई जान फूंकने की कोशिश की गई। देखे देखे कौन आया, गुजरात का शेर आया, जैसे नारों के बीच मोदी के निशाने पर कांग्रेस, केंद्रीय सरकार और कांग्रेस की मुखिया सोनिया गांधी थी।सभा को संबोधित करते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि केंद्र सरकार ने कश्मीर स्थित भारत-पाकिस्तान सीमा से बड़ी संख्या में सैनिकों को हटाने का पाप किया है। उन्होंने कहा कि केंद्र की संप्रग सरकार आतंकवाद से लड़ने में अक्षम है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस देश पर बोझ बन गई है। इससे मुक्ति के बिना देश का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता।
कांग्रेस पर वोटबैंक की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए मोदी ने कहा कि प्रधानमंत्री कहते हैं कि देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला हक है। मोदी ने कहा कि इसी सांप्रदायिक नजरिये से एक बार देश के टुकड़े हो चुके हैं। अब सरकार गरीबों के पेट भी इसी आधार पर बांटना चाहती है। इस प्रकार सांप्रदायिक नजरिये से बजट तैयार करके देश के गरीबों का भला नहीं किया जा सकता। गरीब सिर्फ गरीब होता है, वो किसी संप्रदाय का नहीं होता।
यह खबर मेरी खबर डॉट कॉम पर भी पढ़ी जा सकती है।
19 January 2008
कल मुंबई दौड़ेगी लेकिन मैं
कुछ दिनों पहले मेरी ही कंपनी से एक ई मेल आया कि यदि आप मुंबई मैराथन में भाग लेना चाहते हैं तो ई मेल के साथ भेजे गए फार्म को भर कर फारवर्ड कर दें। इस बात को करीब दो महीने होने को आए। मैने ई मेल का जवाब नहीं दिया लेकिन अब थोड़ा अफसो हो रहा है कि यार आशीष तूने क्यों नहीं भाग लिया। खैर समय बीत चुका है और कल मुंबई दौड़ेगी और मैं शायद अपने घर पर सोता रहूंगा या फिर मुंबई के लोगों को दौड़ता देखने के लिए जाऊंगा। पता नही।खैर इस समय यह शहर पूरी तरह दौड़ने के लिए तैयार है। मुंबई के आजाद मैदान से शुरु होकर यह मैराथन बांद्रा तक जाएगी यानि करीब 40 किलोमीटर से अधिक की दौड़। मीडिया से लेकर लोकल ट्रेन तक में हर जगह इस मैराथन का रंग दिख रहा है। जगह जगह होर्डिंग्स लगाए गए हैं और इस पर शहर के आम लोगों को जगह दी गई है। पिछले साल वर्षों से एशिया की सबसे बड़ी मैराथन मुंबई में ही आयोजित की जा रही है। अनुमान है कि इस बार इसमें 33 हजार लोग दौड़ेंगे। अनिल अंबानी, राहुल बोस, तीस्ता सीतलवाड़ से लेकर मुंबई के हवलदार, टैक्सी चालक और बुर्जुग लोग भी इसमें दौड़ेंगे।
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मुंबई डायरी
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18 January 2008
काले कौवे
अब काले कौवे नहीं दिखते हैं साख पर
संसद में उनकी आवाजाही बढ़ गई है
खादी की टोपी से लेकर नेकर तक
कौवे कांव कांव कर रहे हैं संसद में
किसी के लिए राम जरुरी है
किसी के लिए जरुरी है गरीबों का हाथ
फिर भी कौवे कांव कांव कर रहे हैं
कोई कहता है कि वे गायब हो रहे हैं
तो कोई कहता है कि संसद निगल रही है उनको
गली से लेकर संसद के गलियारों तक में
कौवे कांव कांव कर रहे हैं
मुंबई, 18 जनवरी 2008
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मेरी कविता
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14 January 2008
वाकई मुंबई हादसों का शहर है
वाकई यह शहर हादसों का शहर है। यहां कब क्या हो जाए, कुछ भी कहना मुश्किल है। जैसे आज सुबह मेरे ऑफिस के करीब वाले मॉल में एक आदमी को चाकू घोपकर मारने का प्रयास किया जाता है और कुछ ही देर में यहां पुलिस के साथ प्रेस वालों का जमावड़ा खड़ा हो जाता है और यह जमावड़ा इस पोस्ट को लिखने तक वहीं पर खड़ा है। इसमें आईबीएन7, आज तक, स्टॉर न्यूज से लेकर स्थानीय चैनल वाले तक शामिल हैं। कुछ अखबार वाले भी हैं लेकिन उन्हें पहचाना थोड़ा मुश्किल है। सब अपने अपने ढ़ंग से स्टोरी बनाने में जुटे पड़े हैं।
मामला यह है कि मैग्नेट मॉल के सुपरवाइजर की हत्या का प्रयास किया जाता है और कारण यह था कि उसने अपने एक पूर्व कर्मचारी को वेतन नहीं दिया था। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर इतनी छोटी सी वजह से हत्या कैसे की जा सकती है लेकिन यह प्रयास हुआ है। बात देखने में भले ही छोटी लगे लेकिन यहां हमें यह देखना होगा कि तीन हजार रुपए की पगार पर काम करने वाले उस व्यक्ति के घर की माली हालत कैसी होगी। उसका एक परिवार होगा, जिसमें उसकी पत्नी, मां बाप और बच्चे होंगे। ऐसे में यदि तीन हजार रुपए यानि उसे पगार नहीं मिले तो उसके घर में कई दिनों तक चूल्हा नहीं जला होगा। तभी तो उसे इतना बड़ा कदम उठाना पड़ा होगा। मैं उस व्यक्ति के अपराध को सही नहीं ठहरा रहा हूं लेकिन मुंबई में लाखों की तादाद में ऐसे लोग हैं जो कि हर रोज दो जून की रोटी के लिए लड़ते हैं। इनके सामने जिंदा रहने का सकंट है। हजारों की तादाद में हर रोज इस शहर में आते हैं। कुछ यहीं अपने अस्तिव के लिए लड़ते हैं तो कुछ वापस अपने गांव या शहर चले जाते हैं। ऐसा है यह शहर। वाकई मुंबई हादसों का शहर है।
मामला यह है कि मैग्नेट मॉल के सुपरवाइजर की हत्या का प्रयास किया जाता है और कारण यह था कि उसने अपने एक पूर्व कर्मचारी को वेतन नहीं दिया था। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर इतनी छोटी सी वजह से हत्या कैसे की जा सकती है लेकिन यह प्रयास हुआ है। बात देखने में भले ही छोटी लगे लेकिन यहां हमें यह देखना होगा कि तीन हजार रुपए की पगार पर काम करने वाले उस व्यक्ति के घर की माली हालत कैसी होगी। उसका एक परिवार होगा, जिसमें उसकी पत्नी, मां बाप और बच्चे होंगे। ऐसे में यदि तीन हजार रुपए यानि उसे पगार नहीं मिले तो उसके घर में कई दिनों तक चूल्हा नहीं जला होगा। तभी तो उसे इतना बड़ा कदम उठाना पड़ा होगा। मैं उस व्यक्ति के अपराध को सही नहीं ठहरा रहा हूं लेकिन मुंबई में लाखों की तादाद में ऐसे लोग हैं जो कि हर रोज दो जून की रोटी के लिए लड़ते हैं। इनके सामने जिंदा रहने का सकंट है। हजारों की तादाद में हर रोज इस शहर में आते हैं। कुछ यहीं अपने अस्तिव के लिए लड़ते हैं तो कुछ वापस अपने गांव या शहर चले जाते हैं। ऐसा है यह शहर। वाकई मुंबई हादसों का शहर है।
11 January 2008
बताएं इस ऊब से कैसे निपटा जाए
रविश जी भी ऊब जाते हैं, जबकि वह देश के सर्वोत्तम न्यूज चैनल में हैं। मैं भी इन दिनों कुछ अधिक ही ऊब रहा हूं। मुंबई से नहीं बल्कि अपनी नौ से सात वाली नौकरी से। पत्रकारिता में कुछ करने के जूनून से आया था और यहां आकर ऊब रहा हूं। हर दिन बीतता जा रहा है। और ऐसे देखते देखते पूरे दो साल गुजर गए। पत्रकारिता में हर किसी को मैं ऊबते हुए देख रहा हूं, खासतौर पर मेरे जैसे युवा पत्रकारों को। जो कि पत्रकारिता को सिर्फ एक नौकरी नहीं बल्कि इससे बढ़कर मानते हैं। लेकिन सीधा सा मामला है कि यदि आप सिस्टम को नहीं बदल पाते हैं तो सिस्टम आपको बदल जाता है। अधिकतर पत्रकार सिस्टम के साथ बदल कर पत्रकारिता नहीं नौकरी कर रहे हैं। मैं भी शायद उन्हं के कदमों पर जा रहा हूं। लेकिन समय रहते नहीं चेता तो दिक्कत हो जाएगी। सुबह 7 बजकर 49 मिनट की विरार से चर्च गेट की लोकल पकड़ना और फिर दिनभर ऑफिस में वही रुटीन काम और शाम को फिर 7 बजकर 18 मिनट की चर्च गेट विरार लोकल में एक घंटे का सफर। कुछ भी नया नहीं है और ऊब बढ़ती जा रही है। अब आप ही बताएं इस ऊब से कैसे निपटा जाए।
9 January 2008
वो नहीं आई
वो हर रोज सुबह के पहली पहल गंगा मईया के दर्शन को आती थी। सुंदर मुख, भरा हुआ शरीर और गहरी आंखों में बहुत कुछ खोया हुआ था उसकी। लेकिन इसके बावजूद वह सफेद साड़ी में लिपड़ी बस जिंदा लाश थी, जो इस शहर की एक धर्मशाला के एक अंधेरे कमरे में रह कर अपनी मौत का इंतजार करती रहती थी। पच्चीस साल की थी बिमला बस। रोजाना की तरह वह वहां उसका इंतजार कर रहा था लेकिन आज बिमला नहीं आई। माहौल में अजीब सी खामोशी थी। धर्मशाला के बाहर जब वह पहुंचा तो कुछ लोग एक लाश को बांधकर गंगा मईया के हवाले करने जा रहे थे। आज बिमला हमेशा के लिए गंगा मईया में जा रही थी। अब सिर्फ वह और गंगा मईया होंगी। मोहल्ले में चर्चा है कि बिमला ने खुदखुशी कर ली। अब वह उसे कभी नहीं देख पाएगा। वह उससे बात करना चाहता था लेकिन आज तक उसने केवल उसे देखा ही था, बात करने की कभी हिम्मत नहीं हुआ और अब तो वह हमेशा के लिए ही चली गई है।कुछ दिनों बाद उस धर्मशाला में एक दूसरी विधवा आ गई।
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कहानी
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8 January 2008
आर के लक्ष्मण





आर के लक्ष्मण से मेरी पहली मुलाकात जयपुर के जवाहर कला केंद्र में एक प्रर्दशनी में कई साल पहले हुई थी। उस समय वो व्हील चेयर पर थे। काफी तादाद में लोग उनका आटोग्राफ लेने में लगे हुए थे। किसी तरह उनसे कुछ बात हो पाई। लेकिन उनसे बात करने के बाद पता चला कि भले ही उनका शरीर उनका साथ छोड़ रहा है लेकिन आज भी उम्र के इस पड़ाव पर वो थके नहीं हैं। पेश है उन्ही की कुछ रचना।
मुंबई की लोकल ट्रेन और सुबह की भागमभाग
मुंबई की लोकल ट्रेन का सफर अक्सर कष्ट्रदायी ही होता है लेकिन आज यह सुखद रहा। फ्री में जिस ट्रेन में मसाज होती हो वही मुंबई की लोकल है। लोकल जिसमें इंसानों की दशा किसी कत्लखाने जाती जानवरों की ट्रक से कम नहीं होती है, जिसमें इंसान जानवर से भी अधिक बुरी तरह ठूंसा रहता है। सुबह जब घर से निकला तो इस बात का पूरा अंदाजा था कि आज 8 बजे वाली लोकल छुटने वाली है। स्टेशन पर पहुंचा तो लोकल आती हुई दिख रही। मजबूरन मुझे रेल लाइन पार कर प्लेटफार्म दो पर जाना पड़ा। गाड़ी के साथ दौड़ते दौड़ते आखिर मैने ट्रेन पकड़ ही रही। भीड़ बाकी दिनों की तुलना में आज थोड़ी कम थी । गेट के बाजू में, जहां हमेशा मैं खड़ा रहता हूं, वहां जाकर अपने स्थान पर खड़ा हो गया। बसई रोड, नायगांव, भायंदर और फिर मीरा रोड़ आते आते साथ के लोग भी आ चुके थे और गाड़ी अब पूरी तरह पैक थी । कान में रेडियों बज रहा था और मैं हल्की झपकी लेते हुए सुन रहा था। दादर आया तो अचानक ग्रुप वालों ने स्टेशन पर ही चाय और वड़ा पाव खाने की इच्छा जता दी । बस फिर क्या था, हम सात आठ लोगों की मंडली वहीं वड़ा पाव और चाय पीने के बाद निकल पड़े अपने काम ओर। सब मिलाकर आज का सफर और दादर में नाश्ता जीवन के कुछ ऐसे पलों में से एक है जो कि चाह कर भी नहीं भुलाया जा सकता है।
लोकल ट्रेन बनाम शेयर मार्केट की हलचल
शेयर मार्केट बड़ी तेजी से बढ़ता जा रहा है और कुछ लोग और अमीर बनते जा रहे हैं। सब मिलाकर मुंबई में स्थिति सुखद है और लोकल ट्रेन में भी इस बात का अहसास हो जाता है कि मार्केट में तेजी है। लोगों के मुस्कुराते चेहरे और बात बात में शर्त लगा लेना यहां की खासियत बन चुकी है। लेकिन जनाब जब बाजार टूटता है तो सबसे अधिक दयनीय दशा भायंदर के मारवाडियों और गुजरातियों की होता है । विश्वास नहीं है तो कभी विरार लोकल ट्रेन में सफर किजीए और खुद ही महसूस किजीए बाजार की गिरावट और गरमी को। मुंबई में सबसे अधिक मारवाड़ी भायंदर में रहते हैं।
मुंबई में गुलाबी ठंड
मुंबई की सुबह अब थोड़ी ठंडी हो गई है। लेकिन दिल्ली और जयपुर में तुलना की जाए तो यहां की ठंडक को गुलाबी ठंड कहना अधिक सही होगा। लेकिन यदि आप लोकल में सफर कर रहे हैं तो इस गुलाबी ठंडक के अहसास से आप वंचित ही रह जाएंगे। शहर में सुबह के वक्त और देर रात अलाव जलाकर टैक्सी वाले बार बार आप को इस बात का अहसास करा सकते हैं कि भईया ठंडक जारी है।
लोकल ट्रेन बनाम शेयर मार्केट की हलचल
शेयर मार्केट बड़ी तेजी से बढ़ता जा रहा है और कुछ लोग और अमीर बनते जा रहे हैं। सब मिलाकर मुंबई में स्थिति सुखद है और लोकल ट्रेन में भी इस बात का अहसास हो जाता है कि मार्केट में तेजी है। लोगों के मुस्कुराते चेहरे और बात बात में शर्त लगा लेना यहां की खासियत बन चुकी है। लेकिन जनाब जब बाजार टूटता है तो सबसे अधिक दयनीय दशा भायंदर के मारवाडियों और गुजरातियों की होता है । विश्वास नहीं है तो कभी विरार लोकल ट्रेन में सफर किजीए और खुद ही महसूस किजीए बाजार की गिरावट और गरमी को। मुंबई में सबसे अधिक मारवाड़ी भायंदर में रहते हैं।
मुंबई में गुलाबी ठंड
मुंबई की सुबह अब थोड़ी ठंडी हो गई है। लेकिन दिल्ली और जयपुर में तुलना की जाए तो यहां की ठंडक को गुलाबी ठंड कहना अधिक सही होगा। लेकिन यदि आप लोकल में सफर कर रहे हैं तो इस गुलाबी ठंडक के अहसास से आप वंचित ही रह जाएंगे। शहर में सुबह के वक्त और देर रात अलाव जलाकर टैक्सी वाले बार बार आप को इस बात का अहसास करा सकते हैं कि भईया ठंडक जारी है।
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मुंबई डायरी
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7 January 2008
उसका यूं चला जाना
कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो हमें सबसे प्रिय होते हैं। उन रिश्तों के आगे और पीछे हमें कुछ भी नहीं सूझता है और खास तौर पर ये रिश्तों उस दौर में बनते हैं जब आप या तो स्कूल में होते हैं या कॉलेज में। यानि उस उम्र में जब आप धीरे धीरे दुनिया को समझने लगते हैं। ऐसा सबके साथ होता है। लेकिन एक वक्त ऐसा भी आता है कि आप अपना साया आपका साथ छोड़ने लगता है, दूसरों से क्या गिला की जाए। कॉलेज के शुरुआती दौर में की वह उसकी तरफ खींचा चला जा रहा था। कुछ था उस लड़की में। शायद वह उससे प्यार करने लगा था। शायद इसलिए क्योंकि वह एकतरफा प्यार था। और फिल्मों की तरह यहां भी एक तरफा प्यार सफल हो नहीं सकता। लेकिन कई सालों की दोस्ती में उनके बीच एक ऐसा संबंध बन गया था कि उसे विश्वास था कि वह उसे कभी छोड़कर नहीं जाएगा। एक दोस्त के रुप में वह हमेशा उसके साथ रहेगी। लेकिन नहीं ऐसा नहीं हुआ। मुंबई में एक साल साथ रहने के बाद वह चली गई। स्टेशन पर दोनों रोए भी लेकिन वहां जाने के बाद न जाने ऐसा क्या हुआ कि वह उससे बात ही करना छोड़ दी। आखिर ऐसा क्यूं किया उसने। आज भी वह बस एक ही प्रश्न उससे करना चाहता है। लेकिन वह तैयार नहीं है बात करने के लिए। ऐसे में बस गुलजार साहब की वह लाइनें याद आती हैं कि
हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हें नहीं तोड़ा करते
जिस की आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते
शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा
जाने वालों के लिये दिल नहीं थोड़ा करते
तूने आवाज़ नहीं दी कभी मुड़कर वरना
हम कई सदियाँ तुझे घूम के देखा करते
लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो
ऐसी दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते
लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह वहां बहुत खुश है लेकिन जिसको छोड़कर वह गई थी उसका क्या। वह आज भी मुंबई की हवाओं में उसे महसूस कर सकता है। वह आज भी उसे यहां की गलियों में, सड़कों पर खोजता है लेकिन वह यहां नहीं है। वह हर बार उस मोड़ पर जा जाकर उसका इंतजार करता है जिस मोड़ पर वह उसे छोड़कर गई थी। कितने मौसम बीत गए, और बीत गईं कई सदिया लेकिन वह क्या उसका साया भी नहीं आया। फिर गुलजार साहब याद आ रहे हैं।
क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं
नज़र समेटे हुए खड़ा हूँ
जुनूँ ये मजबूर कर रहा है पलट के देखूँ
ख़ुदी ये कहती है मोड़ मुड़ जा
अगरचे एहसास कह रहा है
खुले दरीचे के पीछे दो आँखें झाँकती हैं
अभी मेरे इंतज़ार में वो भी जागती है
कहीं तो उस के गोशा-ए-दिल में दर्द होगा
उसे ये ज़िद है कि मैं पुकारूँ
मुझे तक़ाज़ा है वो बुला ले
क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं
नज़र समेते हुए खड़ा हूँ
लेकिन उसे इन बातों से कोई फर्क्र नहीं पड़ता है। वह तो अपनी जिंदगी भरपूर जी रही है। गंगा में पानी रहे या नहीं रहे, हवाओं में वह सुहावना अहसास हो या नहीं, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। फिर भी कोई है जो उसका इंतजार कर रहा है और विश्वास है कि वह वापस आएगी। और वह बस इतना ही कहना चाहती है कि मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग
हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हें नहीं तोड़ा करते
जिस की आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते
शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा
जाने वालों के लिये दिल नहीं थोड़ा करते
तूने आवाज़ नहीं दी कभी मुड़कर वरना
हम कई सदियाँ तुझे घूम के देखा करते
लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो
ऐसी दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते
लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह वहां बहुत खुश है लेकिन जिसको छोड़कर वह गई थी उसका क्या। वह आज भी मुंबई की हवाओं में उसे महसूस कर सकता है। वह आज भी उसे यहां की गलियों में, सड़कों पर खोजता है लेकिन वह यहां नहीं है। वह हर बार उस मोड़ पर जा जाकर उसका इंतजार करता है जिस मोड़ पर वह उसे छोड़कर गई थी। कितने मौसम बीत गए, और बीत गईं कई सदिया लेकिन वह क्या उसका साया भी नहीं आया। फिर गुलजार साहब याद आ रहे हैं।
क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं
नज़र समेटे हुए खड़ा हूँ
जुनूँ ये मजबूर कर रहा है पलट के देखूँ
ख़ुदी ये कहती है मोड़ मुड़ जा
अगरचे एहसास कह रहा है
खुले दरीचे के पीछे दो आँखें झाँकती हैं
अभी मेरे इंतज़ार में वो भी जागती है
कहीं तो उस के गोशा-ए-दिल में दर्द होगा
उसे ये ज़िद है कि मैं पुकारूँ
मुझे तक़ाज़ा है वो बुला ले
क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं
नज़र समेते हुए खड़ा हूँ
लेकिन उसे इन बातों से कोई फर्क्र नहीं पड़ता है। वह तो अपनी जिंदगी भरपूर जी रही है। गंगा में पानी रहे या नहीं रहे, हवाओं में वह सुहावना अहसास हो या नहीं, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। फिर भी कोई है जो उसका इंतजार कर रहा है और विश्वास है कि वह वापस आएगी। और वह बस इतना ही कहना चाहती है कि मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ हो जाये
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग
अनगिनत सदियों के तारीक बहिमाना तलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़्वाब में बुनवाये हुये
जा-ब-जा बिकते हुये कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुये ख़ून में नहलाये हुये
जिस्म निकले हुये अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुये नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मग़र क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ हो जाये
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग
अनगिनत सदियों के तारीक बहिमाना तलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़्वाब में बुनवाये हुये
जा-ब-जा बिकते हुये कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुये ख़ून में नहलाये हुये
जिस्म निकले हुये अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुये नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मग़र क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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5 January 2008
शिवसेना की आमची मुंबई
जिस बात का डर हुआ, वही हुआ। आमची मुंबई के नाम पर शहर को बांटने वाली शिव सेना ने कहा है कि दूसरे राज्यों के निवासी के कारण मुंबई का नाम बदनाम हो रहा है।
शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे ने कहा कि दूसरे प्रांत से आ कर लोग मुंबई में ऐसी घटना को अंजाम देते हैं, हम महिलाओं के उत्पीड़न को बर्दाश्त नहीं करेंगे। ठाकरे का बयान उस वक्त आया है जब कि जुहू छेड़छाड़ मामले में जिन 14 आरोपियों को गुरुवार रात पुलिस ने गिरफ्तार किया था , उनमें से ज्यादातर मराठी मूल के निवासी हैं।
शिवसेना के इस ब्यान पर राज्य कांग्रेस के प्रवक्ता संजय निरुपम ने कहा है कि अपराधियों को किसी राज्य से जोड़कर देखना गलत है। अपराधियों को सजा मिलनी चाहिए लेकिन इस राजनैतिक इश्यू बनाने से बचना चाहिए। निरुपम ने कहा कि आज से दो साल पहले हुए एक बलात्कार कांड के आरोपी दूसरे राज्य के नहीं थे।मुंबई पुलिस ने जिन लोगों को गिरफ्तार था, जिन्हें बाद में जमानत मिल गई, उनके नाम हैं: नीलेश भागयंकर, सुधीर निकावडे, रवींद्र शुक्ला, संदीप शुक्ला, डेरिक जाधव, कुणाल जाधव, सिद्घार्थ सिंह, अमित कपूर, सेबिस्तन डिसल्वा, अजय मराठे, वैभव मराठे, संदीप पांचाल, मनोज पांचाल, स्वप्निल मंधरे ।
शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे ने कहा कि दूसरे प्रांत से आ कर लोग मुंबई में ऐसी घटना को अंजाम देते हैं, हम महिलाओं के उत्पीड़न को बर्दाश्त नहीं करेंगे। ठाकरे का बयान उस वक्त आया है जब कि जुहू छेड़छाड़ मामले में जिन 14 आरोपियों को गुरुवार रात पुलिस ने गिरफ्तार किया था , उनमें से ज्यादातर मराठी मूल के निवासी हैं।
शिवसेना के इस ब्यान पर राज्य कांग्रेस के प्रवक्ता संजय निरुपम ने कहा है कि अपराधियों को किसी राज्य से जोड़कर देखना गलत है। अपराधियों को सजा मिलनी चाहिए लेकिन इस राजनैतिक इश्यू बनाने से बचना चाहिए। निरुपम ने कहा कि आज से दो साल पहले हुए एक बलात्कार कांड के आरोपी दूसरे राज्य के नहीं थे।मुंबई पुलिस ने जिन लोगों को गिरफ्तार था, जिन्हें बाद में जमानत मिल गई, उनके नाम हैं: नीलेश भागयंकर, सुधीर निकावडे, रवींद्र शुक्ला, संदीप शुक्ला, डेरिक जाधव, कुणाल जाधव, सिद्घार्थ सिंह, अमित कपूर, सेबिस्तन डिसल्वा, अजय मराठे, वैभव मराठे, संदीप पांचाल, मनोज पांचाल, स्वप्निल मंधरे ।
4 January 2008
हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए--पाश की एक और कविता
हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी, गुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी, जिंदगी के टुकड़े
हथौड़ा अब भी चलता है, उदास निहाई पर
हल अब भी चलता हैं चीखती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता है, प्रश्न नाचता है
प्रश्न के कंधों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी
कत्ल हुए जज्बों की कसम खाकर
बुझी हुई नजरों की कसम खाकर
हाथों पर पड़े घटटों की कसम खाकर
हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे तब तक
जब तक वीरू बकरिहा
बकरियों का मूत पीता है
खिले हुए सरसों के फूल को
जब तक बोने वाले खुद नहीं सूंघते
कि सूजी आंखों वाली
गांव की अध्यापिका का पति जब तक
युद्व से लौट नहीं आता
जब तक पुलिस के सिपाही
अपने भाईयों का गला घोटने को मजबूर हैं
कि दफतरों के बाबू
जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की जरुरत बाकी है
जब तक बंदूक न हुई, तक तक तलवार होगी
जब तलवार न हुई लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे
कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सजा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए
उनकी याद जिंदा रखने के लिए
हम लड़ेंगे
पाश
हम लड़ेंगे साथी, गुलाम इच्छाओं के लिए
हम चुनेंगे साथी, जिंदगी के टुकड़े
हथौड़ा अब भी चलता है, उदास निहाई पर
हल अब भी चलता हैं चीखती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता है, प्रश्न नाचता है
प्रश्न के कंधों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी
कत्ल हुए जज्बों की कसम खाकर
बुझी हुई नजरों की कसम खाकर
हाथों पर पड़े घटटों की कसम खाकर
हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे तब तक
जब तक वीरू बकरिहा
बकरियों का मूत पीता है
खिले हुए सरसों के फूल को
जब तक बोने वाले खुद नहीं सूंघते
कि सूजी आंखों वाली
गांव की अध्यापिका का पति जब तक
युद्व से लौट नहीं आता
जब तक पुलिस के सिपाही
अपने भाईयों का गला घोटने को मजबूर हैं
कि दफतरों के बाबू
जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर
हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की जरुरत बाकी है
जब तक बंदूक न हुई, तक तक तलवार होगी
जब तलवार न हुई लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी
और हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे
कि लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सजा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए
उनकी याद जिंदा रखने के लिए
हम लड़ेंगे
पाश
3 January 2008
लड़कियां मुंबई की सड़कों पर क्यों नहीं निकलें
31 दिसंबर की देर रात मुंबई में जो दो महिलाओं के साथ सत्तर अस्सी लोगों की भीड़ ने जो कुछ किया, वह शर्मनाक था लेकिन इसी के साथ एक नई बहस छिड़ गई है। ब्लॉग की दुनिया में कई लोगों ने इस पर लिखा और कमेंट के रुप में कई लोगों ने अपनी अपनी राय। कुछ ने इसे शर्मसार करने वाली घटना बताई तो किसी ने संस्कृति के ठेकेदारों पर सवालिया निशान उठाया। किसी ने इन लड़कियों के बहाने पूरे समाज के सामने यह सवाल उठा दिया कि महिलाओं को देर रात सड़क पर नहीं निकलना चाहिए क्योंकि यह हमारी संस्कृति में नहीं है। खैर सब ने अपने अपने अनुसार अपनी राय दी। कुछ बातों से मैं सहमत हूं और कुछ से नहीं। लेकिन मैं सभी लोगों का तहेदिल से आभारी हूं कि इन्होंने पूरी ईमानदारी से अपनी राय दी। अरे मुंबई तूने यह क्या कर डाला नामक शीर्षक खबर के लिए यहां क्लिक करें
वाह मनी ब्लॉग के कमल शर्मा ने कहा कि भाई शहर सुरक्षित हो या असुरक्षित....रात में पौने दो बजे तो किसी के भी घूमने के लिए ठीक नहीं है। इन महिलाओं के साथ जो अभद्रता हुई वह शर्मनाक है और छेड़ने वालों को खोजकर कानूनी कारईवाई होनी चाहिए। लेकिन इन महिलाओं और इनके पुरुष मित्रों को भी यह सोचना चाहिए था कि यह किसी भी देश और शहर में घूमने का समय नहीं है। नव वर्ष की मस्ती में आजकल होता क्या है दारु और सेक्स।
जबकि अपना पन्ना के अनिल पांडेय का मानना है कि भाई इस पर मैं यही कहूंगा कि इन हिन्दुवादी संगठनों के लोग अब क्हां मर गए। अब इन्हें महिलाओं और संस्कृति की याद नहीं आई और बडे़ बड़े दावे करने वाली सरकार क्या बेहोश हो गई थी उस वक्त।
आलाप के राजेंद्र त्यागी कहते हैं कि घटना शर्मनाक है। इस प्रकार की घटनाएं महानगरो में पनप रही अपसंस्कृति के कारण हैं। सावाधन रहना होगा। साथ ही कहूंगा- लापरवाही आपकी गाली चोरों को? ... क्यों?
आवारा बंजारा के संजीत का कहना है कि यदि अपने आप को इस घटना में रखूं तो सोचता हूं कि क्या मै रात को दो बजे अपनी किसी महिला मित्र या घर की ही महिला के साथ इकत्तीस दिसंबर की रात ऐसे माहौल मे सड़क पर घूमने निकलूंगा? अगर निकलता हूं तो मेरी गलती पहले है, बदसलूकी करने वालों की तो गलती खैर है ही। दूसरी तरफ इस घटना के बारे मे पढ़कर या सुनकर यह भी लगता है कि क्या हमारे शहरों में कानून या प्रशासन नाम की कोई चीज या उसका भय ही नही है ऐसे लोगों में जो ऐसी बदसलूकी करने के मौके तलाशते रहते हैं। क्या हम अपने ही शहर में बेखौफ हो कर नही घूम सकते? क्या महिलाएं नए साल का जश्न हम जैसे ही घूमते हुए नही मना सकती? दोनो ही नज़रिए महत्वपूर्ण हैं!! खामियां दोनो तरफ हैं। पर प्रशासन का दायित्व है कि वह नागरिकों को बेखौफ़ जीने का माहौल दे। इसके अलावा शर्म हमें, हमारे समाज को भी आनी चाहिए। हम क्या बना रहे हैं अपने आप को या समाज को, जहां नारी अकेले दिखी वह सिर्फ़ भोग की वस्तु हो जाती है। क्यों है आखिर ऐसी मानसिकता। इसके लिए तो प्रशासन जिम्मेदार नही। एक नज़र से देखें तो अनिल पाण्डेय जी की बात से भी सहमत। आमची मुंबई तो शिवसेना की मुंबई है, जहां सरकार से ज्यादा शिवसेना का राज चलता है। क्या शिवसेना के राज में ऐसा अधर्म ही होगा। या उनकी नज़र में यह अधर्म ना होकर "युवावस्था का धर्म" ही है?
समय चक्र के महेंद्र मिश्रा की राय है कि यह बड़ी शर्मनाक घटना है इसकी जितनी निंदा की जावे कम है .पश्चात्य सभ्यता की खाल पहिनने वालो को इस तरह का ख़ामियाज़ा तो भुगतने पड़ेगे ।
स्वप्नदर्शी ब्लॉग के स्वप्नदर्शी कहते हैं कि मेरी अमूमन समझ रही है कि भीड मे सुरक्षा होती है, पर आसम और अब मुम्बई की इस घट्ना के बाद से ये भरोसा भी खत्म हो रहा है. अब हिन्दुस्तानी समाज एक सामूहिक उन्माद और समूहिक रूप से अपराधी प्रवरिती क होता जा रहा है. अगर रात के दो बज़े, 70-80 पुरुश सड्क पर घूम कर नये साल के उन्माद मे थे, तो सिर्फ महिलओ को भी ये हक है कि वो भी सडक पर निकल सके, बिना भयभीत हुये. अगर किसी को बन्द ही होना चहिये तो इन राक्षसो को बन्द करके कही पाताल मे धकेलना चाहिये.
वाह मनी ब्लॉग के कमल शर्मा ने कहा कि भाई शहर सुरक्षित हो या असुरक्षित....रात में पौने दो बजे तो किसी के भी घूमने के लिए ठीक नहीं है। इन महिलाओं के साथ जो अभद्रता हुई वह शर्मनाक है और छेड़ने वालों को खोजकर कानूनी कारईवाई होनी चाहिए। लेकिन इन महिलाओं और इनके पुरुष मित्रों को भी यह सोचना चाहिए था कि यह किसी भी देश और शहर में घूमने का समय नहीं है। नव वर्ष की मस्ती में आजकल होता क्या है दारु और सेक्स।
जबकि अपना पन्ना के अनिल पांडेय का मानना है कि भाई इस पर मैं यही कहूंगा कि इन हिन्दुवादी संगठनों के लोग अब क्हां मर गए। अब इन्हें महिलाओं और संस्कृति की याद नहीं आई और बडे़ बड़े दावे करने वाली सरकार क्या बेहोश हो गई थी उस वक्त।
आलाप के राजेंद्र त्यागी कहते हैं कि घटना शर्मनाक है। इस प्रकार की घटनाएं महानगरो में पनप रही अपसंस्कृति के कारण हैं। सावाधन रहना होगा। साथ ही कहूंगा- लापरवाही आपकी गाली चोरों को? ... क्यों?
आवारा बंजारा के संजीत का कहना है कि यदि अपने आप को इस घटना में रखूं तो सोचता हूं कि क्या मै रात को दो बजे अपनी किसी महिला मित्र या घर की ही महिला के साथ इकत्तीस दिसंबर की रात ऐसे माहौल मे सड़क पर घूमने निकलूंगा? अगर निकलता हूं तो मेरी गलती पहले है, बदसलूकी करने वालों की तो गलती खैर है ही। दूसरी तरफ इस घटना के बारे मे पढ़कर या सुनकर यह भी लगता है कि क्या हमारे शहरों में कानून या प्रशासन नाम की कोई चीज या उसका भय ही नही है ऐसे लोगों में जो ऐसी बदसलूकी करने के मौके तलाशते रहते हैं। क्या हम अपने ही शहर में बेखौफ हो कर नही घूम सकते? क्या महिलाएं नए साल का जश्न हम जैसे ही घूमते हुए नही मना सकती? दोनो ही नज़रिए महत्वपूर्ण हैं!! खामियां दोनो तरफ हैं। पर प्रशासन का दायित्व है कि वह नागरिकों को बेखौफ़ जीने का माहौल दे। इसके अलावा शर्म हमें, हमारे समाज को भी आनी चाहिए। हम क्या बना रहे हैं अपने आप को या समाज को, जहां नारी अकेले दिखी वह सिर्फ़ भोग की वस्तु हो जाती है। क्यों है आखिर ऐसी मानसिकता। इसके लिए तो प्रशासन जिम्मेदार नही। एक नज़र से देखें तो अनिल पाण्डेय जी की बात से भी सहमत। आमची मुंबई तो शिवसेना की मुंबई है, जहां सरकार से ज्यादा शिवसेना का राज चलता है। क्या शिवसेना के राज में ऐसा अधर्म ही होगा। या उनकी नज़र में यह अधर्म ना होकर "युवावस्था का धर्म" ही है?
समय चक्र के महेंद्र मिश्रा की राय है कि यह बड़ी शर्मनाक घटना है इसकी जितनी निंदा की जावे कम है .पश्चात्य सभ्यता की खाल पहिनने वालो को इस तरह का ख़ामियाज़ा तो भुगतने पड़ेगे ।
स्वप्नदर्शी ब्लॉग के स्वप्नदर्शी कहते हैं कि मेरी अमूमन समझ रही है कि भीड मे सुरक्षा होती है, पर आसम और अब मुम्बई की इस घट्ना के बाद से ये भरोसा भी खत्म हो रहा है. अब हिन्दुस्तानी समाज एक सामूहिक उन्माद और समूहिक रूप से अपराधी प्रवरिती क होता जा रहा है. अगर रात के दो बज़े, 70-80 पुरुश सड्क पर घूम कर नये साल के उन्माद मे थे, तो सिर्फ महिलओ को भी ये हक है कि वो भी सडक पर निकल सके, बिना भयभीत हुये. अगर किसी को बन्द ही होना चहिये तो इन राक्षसो को बन्द करके कही पाताल मे धकेलना चाहिये.
articale
मुंबई
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2 January 2008
अरे मुंबई तूने यह क्या कर डाला
मैं आज शर्मिंदा हूं। और इस शर्मिंदगी की वजह उस शहर के लोग हैं जिस शहर को मैं अपना दूसरा प्यार मानता हूं लेकिन नए वर्ष की शुरुआत पर मुंबई में जो दो महिलाओं के साथ हुआ है, उसके बाद मुझे एक बार सोचना पड़ेगा कि क्या वाकई मुंबई मेरा दूसरा प्यार है या नहीं। महिलाओं के लिए सुरक्षित समझे जाने वाले इस शहर में नए साल के पहले ही दिन करीब 70 से 80 पुरूषों ने दो युवतियों को घेरकर उनके कपड़े फाड़कर वह सब कुछ किया जो कि हमारे जैसे हर उस शख्स के लिए शर्म से डूब जाने की बात है जो कि सभ्य समाज में रहने का दावा करता है। मुंबई के अति व्यस्त जुहू इलाके में 70 से 80 पुरूषों ने इन महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की और उनका शारीरिक उत्पीड़न किया। करीब 15 मिनटों तक चली यह शर्मनाक हरकत चलती रही ।खबरों के अनुसार एक जनवरी को सुबह के पौने दो बजे महिलाएं अपने दो पुरूष मित्रों के साथ जे.डब्ल्यू. मैरियट होटल से जूहू बीच की ओर सैर करने आई थीं, तभी लगभग 70 से 80 लोगों की भीड़ ने उन्हें छेड़ना शुरू कर दिया। यह फोटो हिंदुस्तान टाइम्स के कैमरामेन ने ली है
आईए सुमित का ब्लॉग की इस दुनिया में स्वागत करें
ब्लॉग की दुनिया में एक और शख्स ने कदम रख दिया है। नाम है सुमित सिंह। मूलत बिहार के रहने वाले सुमित इन दिनों मुंबई में जोश18 के साथ जुड़कर कार्य कर रहे हैं। सुमित एक युवा पत्रकार और मेरे दोस्त हैं। आप सभी लोगों से निवेदन है कि सुमित के ब्लॉग के साथ उसका भी इस ब्लॉग जगत में स्वागत करें। सुमित के ब्लॉग का नाम है अपना अपना आसमां। इनके ब्लॉग का यूआरएल है http://apnaapnaasman.blogspot.com/
31 December 2007
पाश की दो कविताएं
पाश से मैं पहली बार उस समय रुबरु हुआ था जब राजस्थान के एक आंदोलन के दौरान उनकी कुछ लाइनें आंखों के सामने से गुजरी थी, इसके बाद बस फिर क्या था। मैं और पाश। कई दिनों तक पाश की कविता खोज खोज कर पढ़ा और आज कहा सकता हूं कि बाबा नागार्जुन के बाद पाश ही मुझे सबसे पास दिखते हैं। पेश है पाश की दो कविताएं
1
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी , लोभ की मुठ्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से मर जाना
न होना तड़प का
सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आ जाना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना।
2
जीने का यही सलीका होता है
प्यार करना और जीना उन्हें कभी आएगा नहीं
जिन्हें जिन्दगी ने हिसाबी बना दिया
जिस्मों का रिश्ता समझ सकना-
ख़ुशी और नफरत में कभी लीक ना खींचना
जिन्दगी के फैले हुए आकार पर फिदा होना
सहम को चीर कर मिलना और विदा होना
बहुत बहादुरी का काम होता है मेरी दोस्त
मैं अब विदा होता हूं तू भूल जाना
मैंने तुम्हें किस तरह पलकों में पाल कर जवान किया
कि मेरी नजरों ने क्या कुछ नहीं किया
तेरे नक्शों की धार बांधने में
कि मेरे चुंबनों ने
कितना खूबसूरत कर दिया तेरा चेहरा कि मेरे आलिंगनों ने
तेरा मोम जैसा बदन कैसे सांचे में ढाला
तू यह सभी भूल जाना मेरी दोस्त
सिवा इसके कि मुझे जीने की बहुत इच्छा थी
कि मैं गले तक जिन्दगी में डूबना चाहता था
मेरे भी हिस्से का जी लेना
मेरी दोस्त मेरे भी हिस्से का जी लेना।
-अवतार सिंह संधू " पाश"
1
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी , लोभ की मुठ्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से मर जाना
न होना तड़प का
सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आ जाना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना।
2
जीने का यही सलीका होता है
प्यार करना और जीना उन्हें कभी आएगा नहीं
जिन्हें जिन्दगी ने हिसाबी बना दिया
जिस्मों का रिश्ता समझ सकना-
ख़ुशी और नफरत में कभी लीक ना खींचना
जिन्दगी के फैले हुए आकार पर फिदा होना
सहम को चीर कर मिलना और विदा होना
बहुत बहादुरी का काम होता है मेरी दोस्त
मैं अब विदा होता हूं तू भूल जाना
मैंने तुम्हें किस तरह पलकों में पाल कर जवान किया
कि मेरी नजरों ने क्या कुछ नहीं किया
तेरे नक्शों की धार बांधने में
कि मेरे चुंबनों ने
कितना खूबसूरत कर दिया तेरा चेहरा कि मेरे आलिंगनों ने
तेरा मोम जैसा बदन कैसे सांचे में ढाला
तू यह सभी भूल जाना मेरी दोस्त
सिवा इसके कि मुझे जीने की बहुत इच्छा थी
कि मैं गले तक जिन्दगी में डूबना चाहता था
मेरे भी हिस्से का जी लेना
मेरी दोस्त मेरे भी हिस्से का जी लेना।
-अवतार सिंह संधू " पाश"
articale
कविता
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