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ये जो ज़िंदगी की किताब है............

कई महीनों से सोच रहा था कि कुछ अपने जीवन के बारे में लिखा जाए. समय के अभाव में लिख नहीं पा रहा था. लेकिन अब मन की सारी भड़ास निकालने का वक्त आ गया है. लगातार रूटीन के काम करते करते अब मैं पूरी तरह पक कर तैयार हूँ. वहीं न्यूज़, वही ऑफिस का माहौल और वही पुराने चेहरे. उफ़ समझ में नहीं आ रहा है क्या किया जाए. और ऊपर से २५ दिसंबर खड़ा है. अब आप ही बातें ऐसे माहौल में कैसे काम किया जाए. सुबह करीब ९ बजे से लेकर सात बजे शाम तक ऑफिस में ज्यादा समय निकल जाता है और बाकी समय लोकल और घर पर. अब मेरे पास ख़ुद के लिए समय ही नहीं बचता है. पिछले दिनों हरिवंश राय बच्चन की क्या भूलूं क्या याद करूँ पढने शुरू किया था लेकिन पूरी हो नही पा रही है. अब क्या किया जाए. कई महीनों से डायरी को भी हाथ नहीं लगाया है. कुछ ऐसा हो भी नहीं रहा है कि जिसे लिखा जाए. लेकिन मेरे जैसे शख्स के लिए कुछ न कुछ लिखना जरुरी है. और जिस दिन मैंने लिखना छोड़ दिया, उस दिन मेरा तो काम तमाम ही है.

मेरा पहला प्यार
जन्म स्थान बनारस है तो लगता है कि बनारसी ठसक भी होनी चाहिए. लेकिन नहीं है. कई लोगों ने मुझसे यह शिकायत की है कि भाई साहेब आपमें वो बनारसी ठसक नहीं है. अब मैं क्या करूँ? कहाँ से पैदा करूँ वो बनारसी ठसक. स्कूल के बाद ही राजस्थान आ गया और वहां चार साल रहने के बाद दो साल भोपाल चला गया और अब मुम्बई में हूँ. सभी शहरों के रंग में रंग चुका हूँ मैं. फिर भी बनारस तो मेरे खून में बसता है. बनारस मेरा पहला प्यार है.

कुछ साथी बिछड़ गए
मुम्बई में अभी कोई ऐसा दोस्त भी नहीं बचा है जिससे दिल की बात की जाए. जो थे उनमे से कुछ राजस्थान तो कुछ भोपाल चले गए हैं. सबसे अच्छा एक दोस्त इन दिनों जयपुर में है. जब मैं यहाँ आया था तो हम कुल दस लोग थे. लेकिन अब अकेला ही हूँ. ज्यादातर लोगों इस समय अच्छी अच्छी जगह पर है. कुछ राजस्थान पत्रिका में, कुछ ने खुद का काम और कुछ ने अन्य जगह पर नौकरी पकड़ ली है.. बढ़िया है. पहले अक्सर शनिवार हमारे लिए अच्छा हुआ करता था. पंकज था जिसके साथ मिलकर कभी कभी पार्टी हो जाया करती थी. लेकिन अब हो भी नहीं है. खैर शायद यही जीवन है. लोग आते हैं और जाते हैं. लेकिन जीवन चलता रहता है.

घर के लिए कुछ ले लूँ
अब सोच रहा हूँ कि घर पर गैस ले लूँ ताकि मैं भी राजीव की तरह चाय तो कम से कम घर पर ही पी सकूं. पिछले दिनों दीवाली पर एक पन्द्रह सौ का टोस्टर लिया था. ताकि घर पर ही नाश्ता बना सकूं. लेकिन अभी तक इस बार भी उसका प्रयोग नहीं कर पाया हूँ. ऐसा ही कुछ डर गैस के साथ लग रहा है. कहीं ऐसा नहीं हो कि गैस ले लूं और काम ही नहीं आए. माँ ने बड़े प्यार से गाजर का हलुवा बनाया था. लेकिन मेरी लापरवाही से वो भी सड़ गया. फ्रिज़ भी लेना होगा.

क्या खोया क्या पाया ?
पूरे पौने दो साल होने को आये मुम्बई में आए हुए. पता ही नहीं चला की कैसे देखते देखते समय बीत गया. जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो यही सोचता हूँ कि इन पौने दो सालों में मैंने क्या खोया और क्या पाया है इस शहर में. खोने की बात की जाए को करीब एक साल तक अपने सबसे खास दोस्त के साथ बिताया लेकिन बाद में मुझे उसे खोना पड़ा. जबकि पाने की बात की जाए को कई अच्छे दोस्त पायें हैं यहाँ से. कई साथी दिया है इस शहर ने. अजीब शहर है..

अब हम बड़े हो गए
वक्त है कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा है. जैसे जैसे उमर बढ़ती जाती है वैसे वैसे इन्सान पर जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ता जाता है. मेरे साथ भी कुछ ऐसा हो रहा है, बनारस, भोपाल और जयपुर के वो मस्ती के दिन कल की बात हो गई है. अब मैं बड़ा हो गया हूँ और लोग मुझसे बड़े होने की उम्मीद करते है. करना भी चाहिए. लेकिन अक्सर जब मैं गलियों में उन बच्चों को खेलते कूदते देखता हूँ तो दिल में एक कसक सी उठती है. खास मैं भी बच्चा ही होता. ये बच्चे भी कुछ समय बाद बड़े होने वाले हैं. वाकई बचपन सबसे शानदार पल होता है. बनारस की गलियों में नेकर पहनकर घूमना, उन्हीं गलियों में क्रिकेट खेलना सब कुछ बीते ज़माने की बात लगती है. लड़कियों के पीछे भागने का भी वक्त अब बीत गया है. अभी तो बस अपने भविष्य और घर वालों की चिंता है.

Comments

क्या आशीष बाबू, मुझे लगा कि आपके व्यक्तिगत जीवन के बारे में भी कुछ मजेदार सुनने को मिलेगा वो भी ख़ुद आपके ही मुंह से, पर वो सब तो आब ख़ुद ही हजम कर गए. खैर हम भी कौन सा आपको आसानी से छोड़ने वाले हैं. वैसे आपके बारे में पढ़ कर यही लगा कि शायद आप कुछ ज्यादा ही जल्दी बड़े हो गए. ऐसे जिंदादिल लोगों को भगवान् जल्दी ही परिस्थितियों में कुछ इस तरह उलझाता है कि उसे जीने का तो मौका सही से मिल ही नहीं पाटा. बाकी दोस्त तो जब जो साथ हैं वहीं हैं.. जो अपनी अपनी राहों पर चले गए वो तो ख्यालो में ही रह जाते हैं कभी कभी. आपकी रसोई जल्दी से सज सके इसके लिए हार्दिक शुभकामनाये. ज्यादा कुछ न सही तो एक फ्रैंग पेन और एक इलेक्ट्रिक हीटर तो ले ही आइये. १५०० कि जगह केवल २०० खर्चा कीजिये, और चाय के साथ साथ मैगी भी बनाइये. मैं तो जबसे घर से दूर हुआ हूँ, दोस्त मुझसे मिलने कम, और मेरे हाथ का खाना खाने ज्यादा आते हैं.
अपने अंदर बहुत ही व्यवस्थित तरीके से झांका है आपने! या फ़िर उसे व्यवस्थित सा बना कर रखा है यहां!
लेकिन लिखा बढ़िया है।
ये जो ज़िंदगी की किताब है…पन्ने दर पन्ने बनते-जुड़ते चले जाते हैं। नए पन्ने पर पहुंचने के लिए पिछले पन्ने पीछे करने जरुरी होते हैं। लेकिन याद रखें कि नए पन्नो का सिलसिला पिछले पन्नों से रहता ही है।
शुभकामनाएं।
भई...चलते जाना ही जिंदगी है, गिरते-पड़ते-उठते जीना ही जीवन है, अनुभवों की गठरी बड़ी करते जाना ही जीवन है..अच्छा-बुरा-निराशा-आशा-जय-पराजय....ये सब रास्ते के साथी हैं, जो मिले गले लगाओ...फिर आगे बढ़ो....चलते रहिये भाई....हम सब साथ हैं...
यशवंत
बिल्‍कुल भाई
गैस भी खरीदो और फ्रीज भी
खाना न सही कम से कम चाय मैगी और दलिए या चावल का नाश्‍ता तो तैयार किया जा सकता है।
वैसे सलाह थोडी भारी है, भाभी लाने की तैयारी करो ताकी सब कुछ अपने आप हो जाएगा।

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