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शापिंग मॉल में रिक्‍शा वाला

शापिंग मॉल कल्‍चर भी अजीब होता है। आप सोच रहे होंगे कि मैने अजीब शब्‍द का उपयोग क्‍यों किया। लेकिन मैं क्‍या करूं, कल जो देखा उसके बाद अजीब ही शब्‍द सही लग रहा। मॉल कल्‍चर ने जहां छोटे कारोबारियों को धंधें को कम किया है वहीं मल्‍टीनेशलन कंपनियों के अलावा देश की बड़ी कंपनियों की जेब को भर भी रही है।

कल मैं शहर के मैग्‍नेट शॉपिंग मॉल में गया तो वहां एक बड़ा अजीब नजारा देखने को मिला जिसने मेरी उस सोच को बदल दिया कि मॉल केवल अमीरों के लिए ही है। कल जब मैं इस मॉल में कुछ खरीददारी कर रहा था तो मुझे एक बंदा मिला जिसने एक मैली सी शर्ट और पैंट पहना हुआ था। पांव में हवाई चप्‍पल। यह देखकर मेरे दिमाग में बस यही आ रहा था क‍ि यह इंसान यहां क्‍या लेने आया है। इसका जवाब मुझे उस वक्‍त मिला जब भुगतान के समय वह लाइन में लगा। उसने एक कपड़े धोने की साबुन और नारियल तेल की सबसे छोटी शीशी खरीदी। बिल करीब 18 रुपए के आसपास था। मैं भी जल्‍दी से भुगतान कर के उसे साथ ही बाहर निकला तो देखते हुए यह महाशय आटो रिक्‍शा चलाते हैं। किसी तरह हिम्‍मत करके मैने उनसे पूछ ही लिया कि आप मॉल में क्‍या केवल यह लेने के लिए आए थे तो जवाब हां मैं ही मिला।

Comments

Aflatoon said…
मुझे लगता है उन जैसे भाई बहन अतिशीघ्र वहाँ जाना बन्द कर देंगे। शहर बनारस के एक मॉल में शुरुआत में ज्यादा भीड़ थी , शायद नई जगह देखने का आकर्षण रहा हो। पाँच - छ: महीने में अत्यन्त उल्लेखनीय रूप से भीड़ कम हो गयी है।रिवर्स ऑस्मॉसिस से गुजरे पानी युक्त गुलगप्पे बनारसी नहीं खा रहे।
अफलातून जी आप सही कह रहे हैं लेकिन शायद इसमें अभी थोड़ा वक्‍त लगेगा, खैर बनारस के सिगरा वाला मॉल मैंने भी देखा लेकिन भीड़ कुछ खास नहीं थी, मैं भी मूलत बनारस के मीरघाट से आता हूं
वो भाई शायद मेरी तरह वहां यह देखने गए थे कि आखिर यह मॉल है क्या।
मेरे शहर में जब पहला मॉल खुला तो मैं अपने दोस्त के साथ तीन महीने बाद पहली बार गया, खरीदना कुछ नही था सिर्फ़ देखने गया था।
अलग नजर से मॉल घूमने के लिए बधाई
mamta said…
वैसे बहुत से लोग जिज्ञासावश भी जाते है। इलाहाबाद के बिग बाजार मे तो ऐसा ही कुछ देखने को मिलता है।भीड़ और सिर्फ भीड़।
माल में शापिंग का लुत्फ वो भी उठाना चाहता है।

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