मुंबई यानि मायानगरी। मुंबई का नाम लेते ही हमारे जेहन में एक उस शहर की तस्वीर सामने आती हैं जहां हर रोज लाखों लोग अपने सपनों के संग आते हैं और फिर जी जान से जुट जाते हैं उन सपनों को साकार करने के लिए। मुंबई जानी जाती है कि हमेशा एक जागते हुए शहर में। वो शहर जो कभी नहीं सोता है, मुंबई सिर्फ जगमगाता ही है। लेकिन मुंबई में ही एक और भी दुनिया है जो कि हमें नहीं दिखती है। जी हां मैं बात कर रहा हूं बोरिवली के आसपास के जंगलों में रहने वाले उन आदिवासियों की जो कि पिछले दिनों राष्ट्रीय खबर में छाए रहे अपनी गरीबी और तंगहाली को लेकर। आप सोच रहे होंगे कि कंक्रीट के जंगलों में असली जंगल और आदिवासी। दिमाग पर अधिक जोर लगाने का प्रयास करना बेकार है। मुंबई के बोरिवली जहां राजीव गांधी के नाम पर एक राष्ट्रीय पार्क है। इस पार्क में कुछ आदिवासियों के गांव हैं, जो कि सैकड़ो सालों से इन जंगलों में हैं। आज पर्याप्त कमाई नहीं हो पाने के कारण इनके बच्चे कुपोषित हैं, महिलाओं की स्थिति भी कोई खास नहीं है। पार्क में आने वाले जो अपना झूठा खाना फेंक देते हैं, बच्चे उन्हें खा कर गुजारा कर लेते हैं। आदिवासी आदम...
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खूब लिखते हो गुरु, लगे रहो
1999 में हम आठ दस दोस्त, बनारस मे एक मित्र के यहां विवाह के सिलसिले मे आठ दस दिन रहे। मजा आ गया था। सुबह से उठ कर गंगा स्नान और फ़िर सारा दिन पैदल ही शहर भटकना। शाम में शिव जी के प्रसाद से गला तर करना और फ़िर बनारसी पान मे भी प्रसाद मिलाकर लेना और फ़िर घर आकर ठूंस ठूंस के खाना।
वहां के हाथरिक्शे की सवारी जिस पे दो लोग मुश्किल से बैठें उसमें पांच लोग हम जाते थे कई बार।
लोहटिया से लेकर नाटी इमली, गदौलिया, लंका।
सब याद दिला दिया आपने।
अल्टीमेट शहर!!
अभी कुछ दिन पहले टीवी चैनल 'ईटीवी उर्दू' पर बनारस के बेनिया बाग में सम्पन्न एक मुशाइरा के मुख्य अंश देखे थे. एक शायरा ने पढा :
कोइ बताये इस ख्वाब की ताबीर है क्या
क्यों मुझे ख्वाब में आते हैं बनारस वाले ?
बाद में जब शायर डा. राहत इन्दोरी की बारी आई तो उन्होने इसी ज़मीन पर पूरी गज़ल ही सुना दी:
अपना किर्दार बनाने में जुटे रहते हैं
यूं तो साडी भी बना ते है बनारस वाले.
बाग की सैर तो बहाना है
तितलियां देखने जाते हैं बनारस वाले
दिन में कहते हैं सुधर जाओ मियां
रात में आके पिलाते हैं बनारस वाले
आसमां नाचता है और ज़मीं झूमती है
ऐसी शहनाई बजाते हैं बनारस वाले.
लेख अच्छा है. लिखते रहिये. शुभकामनायें.
http://bhaarateeyam.blogspot.com
जब तक बनारस मी रहा 'घर की मुर्गी' ..... वाली स्थिति रही .......अब जब भी बनारस का ज़िक्र आता है या कही देखने सुनने को मिलता है होम सिकनेस से जकड जाता हूँ.
छोटी सी ज़िंदगी का अनुभव यही कहता है की जीवन के हर आयाम से बनारस जैसा शहर और कोई नही हो सकता.
साधुवाद
लिखते रहिये
मुझे तो अस्सी घाट पर घूमना याद आ गया और अपने BHU के दिन
पर आशीष आपने कही भी BHU की चर्चा नही की
शायद करनी चाहिए
खैर बहुत अच्छा लगा