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वाह वाह बनारस

राजस्थान पत्रिका समूह के डेली न्‍यूज में पिछले ही रविवार को बनारस को लेकर मेरा एक लेख छपा है। उम्‍मीद है कि इसे पढ़कर आप अपनी राय से मुझे जरुर अवगत कराएंगे ताकि मैं अपनी लेखनी में कुछ और सुधार कर सकूं । आपकी राय और सुझाव के इंतजार में ।

आपका
आशीष












Comments

बनारस घूमाने के लिए शुक्रिया

खूब लिखते हो गुरु, लगे रहो
Aflatoon said…
राजस्थान पत्रिका के लायक आलेख है। काशी की कुछ ऐसी जगहों की चर्चा भी करते जो महत्वपूर्ण है लेकिन ज्यादा चर्चित नहीं । जैसे मानमन्दिर पर छत पर बनी वेधशाला - राजस्थान से भी जुड़ती है। राष्ट्रीय आन्दोलन के दरमियान बना भारत माता मन्दिर जिसका स्थापत्य और भीतरी रचना सहज ही राष्ट्र के प्रति प्रेम और सम्मान पैदा करते हैं। आप बनारस में रहे , पढ़े हैं -क्या इन दोनों जगहों को कभी देखा है?
बहुत बढ़िया लिखा है!! बधाई!!
1999 में हम आठ दस दोस्त, बनारस मे एक मित्र के यहां विवाह के सिलसिले मे आठ दस दिन रहे। मजा आ गया था। सुबह से उठ कर गंगा स्नान और फ़िर सारा दिन पैदल ही शहर भटकना। शाम में शिव जी के प्रसाद से गला तर करना और फ़िर बनारसी पान मे भी प्रसाद मिलाकर लेना और फ़िर घर आकर ठूंस ठूंस के खाना।
वहां के हाथरिक्शे की सवारी जिस पे दो लोग मुश्किल से बैठें उसमें पांच लोग हम जाते थे कई बार।

लोहटिया से लेकर नाटी इमली, गदौलिया, लंका।
सब याद दिला दिया आपने।


अल्टीमेट शहर!!
अफलातून जी आपने सही कहा कि मुझे मानमंदिर और भारत माता के मंदिर का भी जिक्र करना चाहिए। मानमंदिर में तो मैं बड़ा हुआ हूं। खैर अगली बार इस बातों को पूरा ध्‍यान रखूंगा। वैसे बनारस के बारें में कई बातें छूट गई हैं। और संजीत जी मेरे लेख से आपके पुराने दिन लौंट आएं यानि मेरा तो लेखन ही सफल हो गया। राजीव तेरी प्रकिया के लिए भी शुक्रिया
बनारस गये काफी समय गुजर गया । अक्सर रात में घर लौटने पर रात में सोचता कि अगले सप्ताह बनारस चला जायेगा और ख़ुब बनारसी अन्‍दाज़ में चहलकदमी की जायेगी बाबा की बूटी के साथ चकल्लस चलेगी । सुनारपुरा से हनुमान घाट से पैदल चलकर बाबा के दर्शन कर गौदोलिया से मदनपुरा होते हुये वापस आया जायेगा । लेकिन यह सोच़ मे ही रह जाता है आपके इस लेख ने मृग तृष्‍णा को फिर से जगा दिया है । शायद अबकी बाबा विश्वनाथ जी अपने दर्शन हेतु बुला ले ।
लगभग 20 वर्ष पहले कामकाज के सिलसिले में महीने में दो बार बनारस जाना होता था. उन्ही दिनों 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान'( अब यह पत्रिका बन्द हो चुकी है) के लिये बनारस के पण्डों पर आमुख कथा लिखी थी.
अभी कुछ दिन पहले टीवी चैनल 'ईटीवी उर्दू' पर बनारस के बेनिया बाग में सम्पन्न एक मुशाइरा के मुख्य अंश देखे थे. एक शायरा ने पढा :
कोइ बताये इस ख्वाब की ताबीर है क्या
क्यों मुझे ख्वाब में आते हैं बनारस वाले ?


बाद में जब शायर डा. राहत इन्दोरी की बारी आई तो उन्होने इसी ज़मीन पर पूरी गज़ल ही सुना दी:


अपना किर्दार बनाने में जुटे रहते हैं
यूं तो साडी भी बना ते है बनारस वाले.
बाग की सैर तो बहाना है
तितलियां देखने जाते हैं बनारस वाले
दिन में कहते हैं सुधर जाओ मियां
रात में आके पिलाते हैं बनारस वाले
आसमां नाचता है और ज़मीं झूमती है
ऐसी शहनाई बजाते हैं बनारस वाले.

लेख अच्छा है. लिखते रहिये. शुभकामनायें.
http://bhaarateeyam.blogspot.com
Akhilesh Kumar said…
आनंद आ गया आपकी रचना पढ़ के.
जब तक बनारस मी रहा 'घर की मुर्गी' ..... वाली स्थिति रही .......अब जब भी बनारस का ज़िक्र आता है या कही देखने सुनने को मिलता है होम सिकनेस से जकड जाता हूँ.
छोटी सी ज़िंदगी का अनुभव यही कहता है की जीवन के हर आयाम से बनारस जैसा शहर और कोई नही हो सकता.
साधुवाद
लिखते रहिये
Siddharth Bhardwaj said…
बनारस का जिस तरह से आपने वर्णन किया वो वाकई काबिलेतारीफ है.
मुझे तो अस्सी घाट पर घूमना याद आ गया और अपने BHU के दिन
पर आशीष आपने कही भी BHU की चर्चा नही की
शायद करनी चाहिए

खैर बहुत अच्छा लगा

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