रविश जी भी ऊब जाते हैं, जबकि वह देश के सर्वोत्तम न्यूज चैनल में हैं। मैं भी इन दिनों कुछ अधिक ही ऊब रहा हूं। मुंबई से नहीं बल्कि अपनी नौ से सात वाली नौकरी से। पत्रकारिता में कुछ करने के जूनून से आया था और यहां आकर ऊब रहा हूं। हर दिन बीतता जा रहा है। और ऐसे देखते देखते पूरे दो साल गुजर गए। पत्रकारिता में हर किसी को मैं ऊबते हुए देख रहा हूं, खासतौर पर मेरे जैसे युवा पत्रकारों को। जो कि पत्रकारिता को सिर्फ एक नौकरी नहीं बल्कि इससे बढ़कर मानते हैं। लेकिन सीधा सा मामला है कि यदि आप सिस्टम को नहीं बदल पाते हैं तो सिस्टम आपको बदल जाता है। अधिकतर पत्रकार सिस्टम के साथ बदल कर पत्रकारिता नहीं नौकरी कर रहे हैं। मैं भी शायद उन्हं के कदमों पर जा रहा हूं। लेकिन समय रहते नहीं चेता तो दिक्कत हो जाएगी। सुबह 7 बजकर 49 मिनट की विरार से चर्च गेट की लोकल पकड़ना और फिर दिनभर ऑफिस में वही रुटीन काम और शाम को फिर 7 बजकर 18 मिनट की चर्च गेट विरार लोकल में एक घंटे का सफर। कुछ भी नया नहीं है और ऊब बढ़ती जा रही है। अब आप ही बताएं इस ऊब से कैसे निपटा जाए।
आशीष महर्षि सतपुड़ा से लेकर रणथंभौर के जंगलों से बुरी खबर आ रही है। आखिर जिस बात का डर था, वही हुआ। इतिहास में पहली बार मानसून में भी बाघों के घरों में इंसान टूरिस्ट के रुप में दखल देंगे। ये सब सिर्फ ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने के लिए सरकारें कर रही हैं। मप्र से लेकर राजस्थान तक की भाजपा सरकार जंगलों से ज्यादा से ज्यादा कमाई करना चाहती है। इन्हें न तो जंगलों की चिंता है और न ही बाघ की। खबर है कि रणथंभौर के नेशनल पार्क को अब साल भर के लिए खोल दिया जाएगा। इसी तरह सतपुड़ा के जंगलों में स्थित मड़ई में मानसून में भी बफर जोन में टूरिस्ट जा सकेंगे। जब राजस्थान के ही सरिस्का से बाघों के पूरी तरह गायब होने की खबर आई थी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरिस्का पहुंच गए थे। लेकिन क्या आपको याद है कि देश के वजीरेआजम मोदी या राजस्थान की मुखिया वसुंधरा या फिर मप्र के सीएम शिवराज ने कभी भी बाघों के लिए दो शब्द भी बोला हो? लेकिन उनकी सरकारें लगातार एक के बाद एक ऐसे फैसले करती जा रही हैं, जिससे बाघों के अस्तिव के सामने खतरा मंडरा रहा है। चूंकि सरकारें आंकड़ों की बाजीगरी में उ...
Comments
फिलहाल तो रोजमर्रा के काम उत्साह से किये जा रहे है -- और ऊब से काफी राहत मिल जाती है.
आपकी उब बहुत कम हो जायेगी.
इस पर भी अगर कम ना हो तो शायर बाज़ार की तरफ़ रुख करले उब किस चिडिया का नाम है भूल जायेंगे.
आपकी उब बहुत कम हो जायेगी.
इस पर भी अगर कम ना हो तो शायर बाज़ार की तरफ़ रुख करले उब किस चिडिया का नाम है भूल जायेंगे.
सुमित सिंह
आजकल हम गूगल अर्थ में बम्बई को देखते हैं, क्योंकि एक हफ्ते के लिए आ रहे हैं. विरार से चर्च गेट मतलब एक कोने से दूसरे कोने पर आना...भई आप तो बहादुर हैं फिर रोज़ रोज़ ट्रेन में तो आपको तो नए नए विषय मिलने चाहिए लिखने के लिए.