Skip to main content

भड़ास, मोहल्‍ला और एक कविता

कल से हिंदी ब्‍लॉग पर मारामारी मची हुई है। जिसे देखो वही कमर के नीचे वार कर रहा है। सब मिलाकर नंगई चरम पर है। कई महीनों पहले कहीं यह कविता पढ़ी थी, शायद ऐसे माहौल में यह कविता हिंदी ब्‍लॉग के महारथियों को कोई दिशा दे पाए। और जनाब ब्‍लॉग के आगे भी जहां है। बस यह कविता गुनगुनाएं और खुदा से दुआ करें कि देश में, मोहल्‍ले में, यहां तक की अपनी भड़ास में भी हम किसी का दिल न दुखाएं।

परिवर्तन में ही है नींव
क्रांति की,
पर क्रांति अलसायी सी नहीं आती,
उसके प्रवाह में स्‍थापित मूल्‍यों के घरौंदे ढह जाते हैं,
उन्‍मूलन तो हो जाता है खंडहरों की परंपरा का
पर, यदि नव निर्माण न हो तो,
क्रांति का च्रकवात नूतनता की रेत
उछालता रह जाता है
परिवर्तन की उस मरीचिका में,
क्रांति को परिवर्तन के पड़ाव के लिए चाहिए
किसी युग पुरुष का समर्थन
और जन जन की कोटि कोटि
भुजाओं का पौरुष

Comments

कविता बहुत ही अच्छी है । लेखक का नाम भी साथ देते तो और अच्छा था।
आशीष said…
अनुराधा जी नाम खोजा लेकिन मुझे नहीं मिल पा रहा है, लेकिन जहां तक मुझे याद है इलाहाबाद की कोई महिला लेखक है जिन्‍होंने यह कविता लिखी है
चौराहा said…
इन चार लाइनों और एक कविता के सहारे बहुतों की भावनाओं को अभिव्यक्ति दी आशीष तुमने।
mamta said…
आशीष शायद आपकी इस कविता का कुछ असर हो।
Udan Tashtari said…
बहुत उम्दा कविता लाये हैं.

Popular posts from this blog

हम जी रहे हैं। क्यों जी रहे हैं?

हम जी रहे हैं। क्यों जी रहे हैं? इसका जवाब कोई नहीं ढूंढना चाहता। दिल और दुनिया के बीच हर इंसान कहीं न कहीं फंसा हुआ है। मौत आपको आकर चूम लेती और हम दिल और दुनिया के बीच में फंसे रहते हैं। बहुत से लोगों को इसका अहसास तक नहीं होता है कि वो क्या करना चाहते थे और क्या कर रहे हैं। बचपन से लेकर जवानी की शुरूअात तक हर कोई एक सपना देखता है। लेकिन पूरी दुनिया आपके इस सपने के साथ खेलती है और ए‍क दिन हम सब दुनिया के बहाव में बहने लगते हैं। जिस दुनिया में हम अपने हिसाब से जीना चाहते हैं, वहां दुनिया के हिसाब से जीने लगते हैं। यह समाज, यह दुनिया आपके अंदर के उस शख्स को मारने के लिए जी जान से लगी रहती है। बहुत कम लोग होते हैं जो अपने हिसाब से, अपनी खुशी के लिए जीते हैं। हर कोई कहीं न कहीं दिल और दुनिया के बीच में फंसा हुआ है। मैं भी फंसा हुअा हूं और आप भी।

दोस्ती और विश्वासघात में अन्तर होता है

दोस्ती और विश्वासघात में अन्तर होता है
यह तो सब जानते हैं
मैं भी और आप भी
लेकिन इसे क्या कहेंगे आप
जब आपका सबसे प्यारा दोस्त
आपके साथ वो करे
जो दुश्मन भी नहीं करता है
जी हाँ मैं अपने सबसे प्यारे दोस्त की बात कर रहा हूँ
मैंने उसकी दोस्ती को इबारत समझा
और उसने हर मोड़ पर मुझे ठगा
मैं आज भी उसपर विश्वास करना चाहता हूँ
लेकिन करूँ या नहीं करूँ
अजीब सी उलझन है

सेक्‍स बनाम सेक्‍स शिक्षा

बहस जारी है सेक्स शिक्षा पर। कुछ लोग साथ हैं तो कुछ लोग विरोध में खड़े हैं। सामने खड़े लोगों का कहना है कि इससे हमारी संस्‍कृति को खतरा है। युवा पीढ़ी अपने राह से भटक सकती है। मैं भी एक युवा हूं, उम्र चौब्‍बीस साल की है। लेकिन मुझे नहीं लगता है कि सेक्‍स शिक्षा से हम अपनी राह से भटक सकते हैं। तो वो कौन होते हैं जो हमारे जैसे और हमारे बाद की पीढि़यों के लिए यह निर्धारित करेंगे कि हम क्‍या पढ़े और क्‍या नहीं। रवीश जी ने अपने लेख में सही ही लिखा है कि सेक्स शिक्षा से हम हर दिन दो चार होते रहते हैं । चौराहे पर लगे और टीवी में दिखाये जाने वाले एड्स विरोधी विज्ञापन किसी न किसी रूप में सेक्स शिक्षा ही तो दे रहे हैं । फिर विरोध कैसा । सेक्स संकट में है । देश नहीं है । समाज नहीं है । इसके लिए शिक्षा ज़रुरी है ।

लेकिन यह हमारा दोगलापन ही है कि हम घर की छतों और तकियों के नीचे बाबा मस्‍तराम और प्‍ले बाय जैसी किताबें रख सकते हैं लेकिन जब इस पर बात करने की आएगी तो हमारी जुबां बंद हो जाती है। हम दुनियाभर की बात कर सकते हैं, नेट से लेकर दरियागंज तक के फुटपाथ पर वो साहित्‍य तलाश सकते हैं जिसे हमारा सम…