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ब्लॉग की दुनिया में आपका स्वागत है नियति

चलिए ब्लॉग की दुनिया में एक और ब्लॉग का स्वागत करने के लिए तैयार ही जाइये. जी हाँ...हमारी एक दोस्त भी अब ब्लॉग की दुनिया में कूद चुकी हैं और इसी के साथ ब्लॉग की दुनिया में एक और महिला का आगमन हो गया है. नियति मूलत बिहार के पटना की रहने वाली हैं. और इन दिनों जयपुर में एक दैनिक समाचार पत्र में कार्य कर रहीं हैं. उम्मीद हैं कि आप सभी लोग उसका स्वागत करेंगे. नियति और मैंने भोपाल से एक साथ पत्रकारिता की पढ़ाई की है..नियति का हिन्दी पर बहुत ही अच्छी पकड़ है. कम से कम मुझे नियति के ब्लॉग के माध्यम से कुछ न कुछ सिखने को ही मिलेगा. नियति स्वागत है आपका..बस लिखना जारी रखें..

Comments

Shrish said…
हमारी ओर से भी नियति जी का हार्दिक स्वागत। ब्लॉग जीवन हेतु शुभकामनाएँ।
नियति जी का हार्दिक स्वागत। शुभकामनाएँ।
Udan Tashtari said…
नियति जी का हार्दिक स्वागत।
नियति का हार्दिक स्वागत है....कुछ अच्छ करो....हम पढ़ेंगे....।
आशीष आपको भी धन्यवाद....
अतुल said…
हार्दिक स्वागत और बधाई भी

अतुल मैत्री

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दोस्ती और विश्वासघात में अन्तर होता है

दोस्ती और विश्वासघात में अन्तर होता है
यह तो सब जानते हैं
मैं भी और आप भी
लेकिन इसे क्या कहेंगे आप
जब आपका सबसे प्यारा दोस्त
आपके साथ वो करे
जो दुश्मन भी नहीं करता है
जी हाँ मैं अपने सबसे प्यारे दोस्त की बात कर रहा हूँ
मैंने उसकी दोस्ती को इबारत समझा
और उसने हर मोड़ पर मुझे ठगा
मैं आज भी उसपर विश्वास करना चाहता हूँ
लेकिन करूँ या नहीं करूँ
अजीब सी उलझन है

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हम जी रहे हैं। क्यों जी रहे हैं? इसका जवाब कोई नहीं ढूंढना चाहता। दिल और दुनिया के बीच हर इंसान कहीं न कहीं फंसा हुआ है। मौत आपको आकर चूम लेती और हम दिल और दुनिया के बीच में फंसे रहते हैं। बहुत से लोगों को इसका अहसास तक नहीं होता है कि वो क्या करना चाहते थे और क्या कर रहे हैं। बचपन से लेकर जवानी की शुरूअात तक हर कोई एक सपना देखता है। लेकिन पूरी दुनिया आपके इस सपने के साथ खेलती है और ए‍क दिन हम सब दुनिया के बहाव में बहने लगते हैं। जिस दुनिया में हम अपने हिसाब से जीना चाहते हैं, वहां दुनिया के हिसाब से जीने लगते हैं। यह समाज, यह दुनिया आपके अंदर के उस शख्स को मारने के लिए जी जान से लगी रहती है। बहुत कम लोग होते हैं जो अपने हिसाब से, अपनी खुशी के लिए जीते हैं। हर कोई कहीं न कहीं दिल और दुनिया के बीच में फंसा हुआ है। मैं भी फंसा हुअा हूं और आप भी।

सेक्‍स बनाम सेक्‍स शिक्षा

बहस जारी है सेक्स शिक्षा पर। कुछ लोग साथ हैं तो कुछ लोग विरोध में खड़े हैं। सामने खड़े लोगों का कहना है कि इससे हमारी संस्‍कृति को खतरा है। युवा पीढ़ी अपने राह से भटक सकती है। मैं भी एक युवा हूं, उम्र चौब्‍बीस साल की है। लेकिन मुझे नहीं लगता है कि सेक्‍स शिक्षा से हम अपनी राह से भटक सकते हैं। तो वो कौन होते हैं जो हमारे जैसे और हमारे बाद की पीढि़यों के लिए यह निर्धारित करेंगे कि हम क्‍या पढ़े और क्‍या नहीं। रवीश जी ने अपने लेख में सही ही लिखा है कि सेक्स शिक्षा से हम हर दिन दो चार होते रहते हैं । चौराहे पर लगे और टीवी में दिखाये जाने वाले एड्स विरोधी विज्ञापन किसी न किसी रूप में सेक्स शिक्षा ही तो दे रहे हैं । फिर विरोध कैसा । सेक्स संकट में है । देश नहीं है । समाज नहीं है । इसके लिए शिक्षा ज़रुरी है ।

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