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मैं कौन हूँ मुझे नहीं पता

मैं कौन हूँ मुझे नहीं पता
कोई तो मुझे मेरी पहचान बता दो
दर दर ठोकरें खाते हुए अब मैं तुम्हारे सामने हूँ
लेकिन यह क्या
तुम भी मेरी तरह बिना पहचान के हो
आह! मैं फिर ग़लत राहों पर हूँ
जहाँ से चला था, वहीं आ गया हूँ
आखिर क्यों भटक रहा हूँ
मैं अपनी पहचान के लिए
कौन सी पहचान ?
जो मुझे तुम दोगे नहीं
मुझे नहीं चाहिए अपनी पहचान
हाँ मुझे नहीं चाहिए अपनी पहचान
हाँ मैं किसी एक पहचान में
नहीं बंधना चाहता हूँ
जैसे तुम बंध चुके हो.

Comments

Mired Mirage said…
बहुत अच्छी कविता है । पहचान चाहिये भी और नहीं भी । हाँ पहचान भी एक बंधन ही है ।
घुघूती बासूती
भावपूर्ण कविता ... अपनी पहचान , अपने वजूद की तलाश --मानव के जीवन मे यह मृग तृष्णा रहती ही है
तुम्हारी बात से सहमत हूँ......पहचान भी बंधक बनाती है
Udan Tashtari said…
बहुत अच्छा. मुक्त और स्वछंद रहो. पहचान अपने साथ सीमायें लाती है जो अक्सर बाधक का ही कार्य करती हैं. अच्छी रचना.
Sanjeeva Tiwari said…
स्‍वागत है उन्‍मुक्‍त आकाश में

'आरंभ' छत्‍तीसगढ की धडकन

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और उसने हर मोड़ पर मुझे ठगा
मैं आज भी उसपर विश्वास करना चाहता हूँ
लेकिन करूँ या नहीं करूँ
अजीब सी उलझन है