Skip to main content

इसे मोहब्‍बत कहें या मुंबई

यह लेख राजस्‍थान पत्रिका समूह के डेली न्‍यूज समाचार पत्र में रविवार को प्रकाशित हुआ है। अब आप इसे पढ़कर अपनी राय जरुर दें ताकि यदि कुछ गलती हो तो सुधारा जाए। हालांकि मैने भरसक प्रयास किया है कि इस लेख को दिल से लिख सकूं
कभी कभी कुछ चीजों को शब्‍दों में नहीं बांधा जा सकता है। इन्‍हें केवल महसूस किया जा सकता है। इश्‍क भी उन्‍हीं चीजों में शुमार है जिसे शब्‍दों में बांधना कोई आसान काम नहीं है और जब बात मुंबई के प्‍यार की हो तो मामला थोड़ा और पेचिदा हो जाता है। हिंदुस्‍तान की अधिकतर फिल्‍मों की शुरुआत प्‍यार से शुरु होती मुंबई डायरी, डेली न्‍यूज, लेखहै और प्‍यार पर ही खत्‍म हो जाती है। जाहिर है ऐसे में फिल्‍मों के शहर मुंबई का प्‍यार तो खास होगा ही। मुंबई में प्रेमी अपने प्‍यार के इजहार के लिए किसी खास दिन का इंतजार नहीं करते हैं लेकिन फिर भी 14 फरवरी या वैलेंटाइन डे का दिन मुंबईकर, खासतौर पर यहां के युवाओं के लिए खास मायने रखता है। इस दिन पूरे मुंबई पर एक ही रंग होता है और वो रंग होता है इश्‍क का। मुंबई के हाइवे से लेकर समुंद्र तट तक, चारों और सिर्फ और सिर्फ इश्‍क का रंग होता है। मुंबईकर इश्‍क के मायने में देश के अन्‍य शहरों की तुलना में थोड़े अधिक उन्‍मुक्‍त होते हैं।
फरवरी महीने में जब वैलेंटाइन डे की दस्‍तक शुरु होती है तो गुलाबी ठंड शहर के मिजाज को थोड़ा और रंगीन बना देती है। मुंबई की लोकल ट्रेन से लेकर चौपटी तक पर इस एक ओर जहां इस बसंत पर्व का जूनून होता है तो दूसरी ओर ठंड का असर। इसी वक्‍त एक दूसरे के हाथों में हाथ डाले मुंबई के नौजवान इस ठंड के साथ जिंदगी का भरपूर मजा उठाते हैं। लेकिन यह बात केवल इस शहर के युवाओं पर ही लागू नहीं होती है। जीवन के अंतिम पड़ाव पर खड़े बुर्जुगों का भी यही हाल रहता है। समुंद किनारे इनकी संख्‍या भी कम नहीं है। पूरे बिंदास और नई ताजगी के संग इन बुर्जुगों को जिंदगी का मजा लेते अच्‍छे अच्‍छे युवा चकरा जाएं। देश भर में वैलेंटाइन डे की दस्‍तक सबसे पहले इसी शहर में सुनाई देखी है। गुलाबी ठंड ने पूरे शहर को अपनी आगोश में लिया हुआ है। और इसी बीच मुंबई के नौजवान युवक यु‍वतियों अपने कीमती समय में से कुछ समय निकाल कर इस प्रेम पव को मनाने की तैयारी में जुट गए हैं। भीड भाड़ से भरी मायानगरी मे नरीमन प्‍वाइंट से लेकर लोकल ट्रेन तक में प्रेमी अपने लिए थोड़ी सी जगह बना ही लेते हैं। और बनाए भी क्‍यों नहीं। आखिर मौका जो प्रेम पर्व का। मुंबई के प्रेमियों की बात हो और बांद्रा बैंड स्‍टैंर्ड की बात नहीं हो। यह कैसे हो सकता है। यह वही स्‍थान है जहां बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान और सलमान खान जैसे नायक रहते हैं। यदि आप मुंबई में डूबता सूरज अपने प्रेमी के गले में हाथ डालकर देखना चाहते हैं तो बांद्रा बैंड स्‍टैर्ड से बेहतर जगह कोई नहीं हो सकती। बांद्रा रेलवे स्‍टेशन से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह जगह मुंबई के प्रेमियों के लिए सबसे अधिक सु‍रक्षित सैरगाह है। जहां सुबह से लेकर देर रात तक कपल्‍स बाहों में बाहें डाले खुले सागर में अपने प्‍यार के साथ गोते खाते रहते हैं। यहां सिर्फ युवा ही नहीं बल्कि बुजुर्ग भी अपने साथी के साथ सकून की तलाश में भटकते दिख जाएं तो कोइ अचंभा नहीं है। एक ओर दूर दूर तक फैला अरब महासागर तो दूसरी ओर सिर्फ प्‍यार में डूबे लोग। ऐसा है मुंबई का बैंड स्‍टैंर्ड। पास में ही बांद्रा फोर्ट है जहां की दिवारे न जाने कितने प्रेमियों के प्रेम की गवाह रही है।

इसी तरह मुंबई की जुहू चौपाटी भी प्रेमियों के अलावा पर्यटकों का ध्‍यान बरबस्‍त अपनी ओर खींचती है। यहां भी प्रेमियों के प्रेम का गवाह अरब महासागर होता है। कपल्‍स सागर की कसम खाते हुए किसी न किसी कोने में बैठे अपने प्‍यार में मसगूल दिख ही जाएंगे। जब पहली बार इस स्‍थान पर जाना हुआ तो यह मुझे प्रेमियों का स्‍वर्ग नजर आ रहा था। सूरज धीरे धीरे अस्‍त होने वाला था और सागर की लहरें पूरे शबाब पर थी। लेकिन इन सबसे बेपरवाह प्रेमी जोड़े बस मन में कुछ हसरते पाले एक दूसरे की आंखों में डाले हसीन ख्‍वाब देख रहे थे। प्रेम डूबे जोड़ो के लिए जुहू चौपाटी पर मिलने वाली भेल पूड़ी का एक अलग क्रेज है। सागर किनारे अपने अपने प्‍यार के साथ नंगे पांव घूमते हुए भेलपूड़ी खाते जोड़ों को देखकर बस मन में एक ही ख्‍याल आता है कि मुंबई की भागमभाग की जिंदगी में कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनके लिए आज भी प्‍यार सभी चीजों व बातों से सर्वोपरि है। जुहू चौपाटी हो या शहर के अन्‍य समुंद्र किनारे के तट हर जगह हर राज प्रेमियों का रंग नजर आता है। लेकिन 14 फरवरी यानि वैलेंटाइन डे के दिन यह रंग सबसे अधिक गहरा हो जाता है। आखिर हो भी क्‍यों नहीं। लेकिन कुछ ऐसे युवा भी होते हैं जो जुहू से लेकर नरीमन प्‍वाइंट तक उन दिनों को याद करने के लिए आते हैं जो उन्‍होंने उनके साथ गुजारे थे जो कभी उनके लिए सबकुछ थे। जी जनाब हम बात कर रहे हैं इश्‍क में धोखा खाए लोगों की। यदि मुंबई की चौपाटी पर आपको कोई अकेले, गुमशुदा सा युवा सागर की लहरों को उदास आंखों से निहारता दिख जाए तो समझ लिजिए की उसने भी कभी यहां बहुत खूबसूरत दिन गुजार थे।

इसी तरह का नजारा हर रोज नरीमन प्‍वांइट पर तो आम है। दुनियादारी से बेखबर लोगों की एक अलग जमात नरीमन प्‍वांइट पर दिख जाती है । यहां भी बैंड स्‍टैंड और चौपाटी जैसा नजारा रहता है। सुबह के वक्‍त जहां नरीमन प्‍वांइट पर स्‍थानीय लोगों को जागिंग करते देखा जा सकता है लेकिन शाम शाम होते यह स्‍थान पूरी तरह प्‍यार के रंग में डूब जाता है। मुंबई आकर यदि आप यहां नहीं आए तो आपका आना बेकार है। कई हिंदी फिल्‍मों का गवाह बने नरीमन प्‍वांइट के फुटपाथ को खासतौर पर अब पयर्टकों के लिए तैयार किया गया है। पयर्टकों में भी खासतौर पर या तो नवविवाहित जोड़े या फिर वो कपल्‍स जो प्‍यार के बंधन में बंध चुके हैं। प्रेमियों को यहां एक दूसरे के की गोद में सिर रखकर जो सकून मिलता है, वो मुंबई की भीड़भाड में इस बात का अहसास कराता है कि मुंबई सिर्फ देश की आर्थिक राजधानी नहीं बल्कि प्‍यार करने वालो का स्‍वर्ग भी है। प्रेमियों के सकून और हसीन पल का पूरा फायदा यहां वो लोग उठाते हैं जो फुटपाथ पर खाने पीने की चीज से लेकर मेहंदी तक लगाते हैं। ये दुकानदार खासतौर पर उन युवाओं की मानसिकता को बड़ी अच्‍छी तरह समझते हैं जो अपनी प्रेमिका के सामने कुछ भी करने को हमेशा तैयार रहते हैं। तभी तो कभी चाय कॉफी वाले तो कभी भेलपूड़ी वाले आकर इन कपल्‍स के प्‍यार में अपने पेट भरने का रास्‍ता निकाल लेते हैं। और इसका खामियाजा बेचारे सकून की तलाश में आए युगलों को उठाना पड़ता है। कभी कभी तो कुछ बेचारे लड़के कुछ न कुछ खरीदकर उन्‍हें भगा देते हैं और कभी कभी इतना झुंझला जाते हैं कि उनकी शक्‍ल देखकर वो छोटे दुकानदार कन्‍नी काटने में ही अपनी भलाई समझते हैं। लेकिन एक जगह से कन्‍नी काटने के बाद ये दुकानदार दूसरे शिकार की तलाश में निकल जाते हैं और कुछ ही घंटे की मेहनत में प्रेमियों की जेब से इतना माल तो निकलवा ही लेते हैं कि अपना और अपने परिवार के लोगो का पेट भर सकते हैं।

मुंबई के सैकड़ों रेलवे स्‍टेशन भी हर रोज अनगिनत प्रेमियों के प्रेम के गवाह बनते हैं। चर्च गेट से लेकर बोरीवली तक के प्‍लेटफार्म पर खाली पड़ी चेयर पर लोग बेधड़क हो कर अपने लिए हसीन सपने बुनते हैं। इन्‍हें कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कौन आ रहा है और कौन नहीं। ये तो बस एक दूसरे की आंखों में आंख डालकर किसी और दुनिया में मशगूल रहते हैं। जब मैं पहली बार इस शहर में कदम रखा था तो यह सब मेरे लिए किसी अजूबे से कम नहीं था। क्‍योंकि मैं जिस शहर से आता हूं वहां खुल्‍लमखुला प्‍यार आज भी किसी अपराध से कम नहीं है। लेकिन मुंबई में ऐसा कुछ नहीं है। दोपहर में खाली दौड़ती लोकल भी प्रेमियों के लिए एक सबसे आरामदायक स्‍थान हैं। जब पूरा शहर अपने अपने कामों में मशगूल होता है तो स्‍कूल कालेज के युवाओं को यही लोकल सबसे अधिक भाती है। मुंबई में प्रेमियों में प्रेमियों के लिए कई ऐसे स्‍थान हैं कि यदि उनके बारें में लिखना शुरु किया तो फेहरिस्‍त काफी लंबी हो जाएगी। मुंबई का संजय गांधी नेशनल पार्क हो या फिर एलिफेंटा की आदि गुफाएं। गेट वे ऑफ इंडिया के सामने के होटल ताज से लेकर रेडियो क्‍लब तक की सड़क प्रेमियों की सड़क नजर आती है। ऐसे ही गिरगांव चौपाटी हो या फिर भीड भाड़ वाले रेस्‍टोरेंट। यह सब प्रेमियों की लिस्‍ट में शामिल है। लेकिन सबसे शानदार यदि कुछ हो सकता है तो वो है, गेट वे ऑफ इंडिया से एक पूरी बोट रिजर्व कराई जाए और अपने वैलेंटाइन के साथ एक खूबसूरत शाम उस बोट पर बिताई जाए। जहां आपके खूबसूरत और पाक मोहब्‍बत का गवाह दूर दूर तक फैला सागर या फिर आसमान से आपके प्रेम ताकता चांद। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी जो रंग में भंग डालने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते हैं। इनमें शिवसेना से लेकर वो लोग तक होते हैं जो सुनसान स्‍थानों पर जोड़ों को देखकर न सिर्फ उन्‍हें लूटने का प्रयास करते हैं बल्कि कई बार लड़कियों के साथ बदसलूकी पर भी उतर आते हैं। ऐसे में कहीं प्‍यार के इस पर्व के रंग में भंग न पड़ जाए, मुंबईकर सुनसान स्‍थानों पर जाने से बचते हैं।

वैलेंटाइन डे की बात हो और फूलों की बात नहीं हो। यह कैसे हो सकता है। फरवरी महीने में अचानक मुंबई की सड़कों के किनारे अनगिनत फूलों की दुकाने खुल जाती हैं। वैसे इन दुकानों में सभी फूल मिल जाते हैं लेकिन प्रेम का प्रतीक लाल गुलाब का अलग ही जलवा देखने को मिलता है। सामान्‍य दिनों में जो गुलाब पांच रुपए का मिलता है वो इस खास दिन में बढ़कर 20 से 25 रुपए हो जाता है। हांलाकि प्रेमियों के लिए पैसों का कोई महत्‍व नहीं होता है। लेकिन कुछ के लिए यह थोड़ा महंगा है। ऐसे में कुछ अपने प्‍यार को देने के लिए एक ही गुलाब से काम चला लेते हैं । जिनकी जेब में गरमी है वो पूरा का पूरा गुलदस्‍ता लाल गुलाब से बनवा कर खुद गुलाब की लाल हो जाते हैं।

Comments

anitakumar said…
वाह जनाब, लगता है मुंबई की रंगीनियां सर चढ़ कर बोल रही हैं। हां दूसरे शहरों के मुकाबले बम्बई ज्यादा स्वत्रंता देती है। तुम बेस्ट की डबल डेक्कर बस भूल गये, जोड़े वहां भी मिलेगें
Sunil Dogra said…
वाह! भाई क्या तीर मारा है ..... बहुत खूब

Popular posts from this blog

दोस्ती और विश्वासघात में अन्तर होता है

दोस्ती और विश्वासघात में अन्तर होता है
यह तो सब जानते हैं
मैं भी और आप भी
लेकिन इसे क्या कहेंगे आप
जब आपका सबसे प्यारा दोस्त
आपके साथ वो करे
जो दुश्मन भी नहीं करता है
जी हाँ मैं अपने सबसे प्यारे दोस्त की बात कर रहा हूँ
मैंने उसकी दोस्ती को इबारत समझा
और उसने हर मोड़ पर मुझे ठगा
मैं आज भी उसपर विश्वास करना चाहता हूँ
लेकिन करूँ या नहीं करूँ
अजीब सी उलझन है

#DigitalGyan : Sarahah के बारे में जानिए सबकुछ

'सराहा' दुनियाभर में तहलका मचाने के बाद अब हिंदुस्तान में छा गया है। जिसे देखिए, वो इसका दीवाना बन चुका है। सऊदी अरब में बनाए गए एप सराहा को दुनियाभर में यूजर्स काफी पसंद कर रहे हैं । करीब एक महीने पहले लॉन्च हुए इस एप को 50 लाख से ज्यादा बार डाउनलोड किया गया है। खास बात यह है कि एप बनाने वाली इस स्टार्टअप को सिर्फ तीन लोग चलाते हैं। इनमें 29 साल के जेन अल-अबीदीन तौफीक और उनके दो दोस्त शामिल हैं।  इस एप के जरिये यूजर अपनी प्रोफाइल से जुड़े किसी भी व्यक्ति को मैसेज भेज सकते हैं। लेकिन सबसे मजेदार यह है कि मैसेज पाने वाले को यह पता नहीं चलेगा कि ये मैसेज किसके पास से आया है। जाहिर है, इसका जवाब भी नहीं दिया जा सकता। और यही कारण है कि ये ऐप लोगों के बीच बहुत तेज़ी से लोकप्रिय होता जा रहा है। सराहा एक अरबी शब्द है, जिसका मतलब ‘ईमानदारी’ होता है। तौफिक ने बताया ‘एप बनाने का मकसद यह है कि इसके जरिये कोई कर्मचारी, बॉस या वरिष्ठ को बिना झिझक अपनी राय दे सके। यूजर किसी व्यक्ति से वो सब कह सकें जो उनके सामने आकर नहीं कह सकते। ऐसा हो सकता है कि वे जो कह रहे हैं उसे सुनना उन्हें अच्छा न ल…

चारों ओर कब्र, बीच में दुनिया का इकलौता शिव मंदिर

Ashish Maharishi
वाराणसी। दुनिया के सबसे पुराने शहरों में शुमार बनारस के बारे में मान्यता है कि यहां मरने वालों को महादेव तारक मंत्र देते हैं, जिससे मोक्ष लेने वाला कभी भी दोबारा गर्भ में नहीं पहुंचता। इसी बनारस में एक ऐसा मंदिर भी है जो कब्रिस्तान के बीचोंबीच है। ओंकारेश्वर महादेव मंदिर भले ही हजारों साल पुराना हो, लेकिन बनारस के स्थानीय लोगों को भी इसके बारे में बहुत कम जानकारी है।
मंदिर के पुजारी शिवदत्त पांडेया के अनुसार, "काशी खंड में ओंकारेश्वर महादेव का जिक्र है। ये मंदिर करीब पांच हजार साल पुराना है। यहां दर्शन से अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है, तीर्थ माना गया है लेकिन आज कभी कोई भूला-बिसरा यहां दर्शन करने आ जाता है। वरना ये मंदिर हमेशा सुनसान ही रहता है।"

स्कंद पुराण में ओंकारेश्वर महादेव का जिक्र है। इस पुराण के अनुसार, काशी में जब ब्रह्मा जी ने हजारों साल तक भगवान शिव की तपस्या की, तो शिव ने ओंकार रूप में प्रकट होकर वर दिया और इसी महालिंग में लीन हो गए।
ग्रंथों के मुताबिक, एक विशेष दिन सभी तीर्थ ओंकारेश्वर दर्शन के लिए आते हैं। लेकिन इस मंदिर से जिला प्रशासन और सरकार दोन…