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तुम

कल रात की बारिश ने उसे पूरी तरह भिगो दिया था। बूंदे उसे तेजाब की तरह जला रही थीं। उसके अंदर बहुत तेजी से बहुत कुछ बदल रहा था। दिल की धड़कन फूल स्पीड में थीं। पसीने और बारिश बूंदों ने उसे पूरी तरह भिगो दिया था। उसने तय किया कि अगली सुबह वह उससे फिर से आंखों में आंख डालकर बात करेगा। लेकिन सुबह से पहले एक काली रात से भी उसे गुजरना था। अचानक वह अतीत में लौट जाता है..

वह दूर तक उसे ताकता रहता था, जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो जाती थी। तपती दोपहर भी उसे ठंडक देती थी। वह जब भी उसकी आंखों में झांकता था, खुद को पूरी तरह उसमें खोया हुआ पाता था। उसकी आंखों में पूरी आकाश गंगा समा सकती थी। उसकी तिरछी नजरों में कुछ अजीब सा था। सागर उसे नर्म पैरों को छूकर जब बहता था तो खुद को धन्य मानता था। दूर तक बिखरी काली रात खुद बड़ी नजाकत से उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में काजल लगाती थी।

हिरणियां उससे नजरें नहीं मिलाने में शर्माती थी। उसकी आंखे खूबसूरती के सभी पैमाने को तोड़ती थी। वह जिधर से भी गुजरती थी, खिदमत के लिए फरिश्ते उसके पास खड़े रहते थे। उसकी एक दस्तक से पूरी कायनात में बसंत छा जाता था।

(मेरी एक कहानी के बीच का अंश)

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